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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-11 एवं 12 सरल तर्क

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    पिछली चर्चा में बताया गया कि ईश्वरीय दर्शनशास्त्रियों और धर्मगुरुओं ने ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए बहुत से तर्क और प्रमाण पेश किए हैं जिन्हें इस विषय से संबंधित पुस्तकों में देखा जा सकता है। हमने यहाँ पर एक ऐसे तर्क और प्रमाण को आप के लिए चुना है जिसके लिए अपेक्षाकृत कम भूमिकाओं की आवश्यकता है। इसके साथ ही उसे समझना भी सरल है किंतु यह याद रखना चाहिए कि यह तर्क ईश्वर को एक अनिवार्य अस्तित्व के रूप में प्रमाणित करता है। अर्थात ऐसे अस्तित्व के रूप में जिसका होना आवश्यक है और जिसे किसी जन्मदाता की आवश्यकता नहीं है और उस अनिवार्य अस्तित्व अर्थात ईश्वर के अन्य अपरिहार्य गुणों, जैसे ज्ञान, शक्ति तथा निराकार होने आदि को अन्य तर्कों से प्रमाणित करेंगे। बुद्धि के नियम के अनुसार प्रत्येक अस्तित्व या तो अनिवार्य होगा या फिर संभव। कोई भी अस्तित्व इन दो बौद्धिक दशाओं से हटकर नहीं हो सकता किंतु सारे अस्तित्व संभव व निर्भर की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते क्योंकि संभव व निर्भर अस्तित्व को अपने अस्तित्व के लिए किसी जन्मदाता की आवश्यकता होती है और यदि सारे जन्म दाताओं के अस्तित्व संभव व निर्भर अस्तित्व की श्रेणी में आते हों तो फिर हर एक को एक कारक की आवश्यकता होगी और इस प्रकार यह क्रम न समाप्त होने वाला हो जाएगा। दूसरे शब्दों में कारकों का एक दूसरे पर निर्भर होना बुद्धि के अनुसार संभव नहीं है इस लिए इस प्रकार के सभी अस्तित्वों के लिए किसी एक ऐसे कारक और जन्मदाता की आवश्यकता है जो स्वयं किसी कारक या जन्मदाता पर निर्भर न हो और उसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक की आवश्यकता न हो। अर्थात उसका अस्तित्व अनिवार्य हो। यह ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने का सरलतम दार्शनिक मार्ग है जो कुछ बौद्धिक भूमिकाओं से बना हुआ है और इसे किसी अन्य भूमिका अर्थात प्रयोगात्मक भूमिका की आवश्यकता नहीं है किंतु चूँकि इस तर्क में दार्शनिक तर्कों व सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है इस लिए इन दार्शनिक नियमों और सूत्रों को स्पष्ट करने के लिए कुछ भूमिकाओं की आवश्यकता है।कोई बात चाहे जितनी सरल हो, कम से कम दो मूल विषयों पर आधारित होती हैः विषय और विशेषता। उदाहरण स्वरूप यह वाक्य कि सूर्य प्रकाश देता है, इस वाक्य में सूर्य के लिए प्रकाश को सिद्ध किया गया है यहाँ सूर्य विषय है और प्रकाश देना विशेषता है। विषय के लिए विशेषता सिद्ध करना केवल तीन दशाओं में सीमित है। या विषय के लिए वह विशेषता असंभव होगी। उदारहण स्वरूप यह कहा जाए कि तीन की संख्या चार से बड़ी है। या विषय के लिए वह विशेषता अनिवार्य होगी, जैसे यह कहा जाए कि दो की संख्या चार की आधी है। या फिर न असंभव हो और न अनिवार्य हो, जैसे यह कहा जाए कि सूर्य हमारे सिर के ऊपर है। तर्कशास्त्र के नियमों के अनुसार पहली दशा में विषय व विशेषता का संबंध असंभव है और दूसरी दशा में यह संबंध आवश्यक या अनिवार्य है और तीसरी दशा में संभव है अलबत्ता संभव के विशेष अर्थ के साथ।इस बात के दृष्टिगत कि दर्शनशास्त्र में अस्तित्व के बारे में चर्चा की जाती है और जिस वस्तु का अस्तित्व असंभव हो उसका स्वाभाविक रूप से कोई अस्तित्व नहीं होता इस लिए दर्शनशास्त्रियों ने अस्तित्व को बौद्धिक रूप से वाजिबुल वुजूद अर्थात अनिवार्य अस्तित्व और मुमकेनुल वुजूद अर्थात संभव अस्तित्व जैसे दो प्रकारों में बाँटा है। वाजिबुल वुजूद या आवश्यक अस्तित्व उस अस्तित्व को कहते हैं जो स्वयं ही अस्तित्व में आया हो और उसे किसी अन्य अस्तित्व की आवश्यकता न हो। स्वाभाविक है कि इस प्रकार का अस्तित्व अनंत व निरंतर होगा क्योंकि किसी काम विशेष में किसी वस्तु का नष्ट हो जाना इस बात का चिन्ह होता है कि उसका अस्तित्व स्वयं उससे नहीं है। उसे अस्तित्व में आने के लिए किसी दूसरे अस्तित्व की आवश्यकता होती है जो उसका कारक होता है और उस विशेष कारक के अस्तित्व पर उसका अस्तित्व और कारक के न होने पर उसका न होना निर्भर होता है। मुमकिनुल वुजूद या संभव व निर्भर अस्तित्व उस अस्तित्व को कहते हैं जिसका अस्तित्व स्वयं उसके ऊपर टिका नहीं होता बल्कि उसके लिए किसी दूसरे कारक की आवश्यकता होती है। इस प्रकार की दशाओं को कल्पना के आधार पर वर्णित किया गया है। बौद्धिक दृष्टि से असंभव अस्तित्व का होना तो संभव नहीं है जैसे तीन की संख्या का चार से बड़ा होना संभव नहीं है किंतु कोई कारण नहीं है कि सृष्टि के अन्य अस्तित्वों में से अनिवार्य व संभव अस्तित्व की पहचान हो सके। दूसरे शब्दों में इसके लिए तीन दशाएँ हो सकती हैं। या यह कि जितने अस्तित्व हैं सबके सब आवश्यक और अनिवार्य हों, या यह कि सारे अस्तित्व संभव हों और तीसरे यह कि कुछ अस्तित्व संभव हों और कुछ अनिवार्य। पहली व तीसरी दशा के आधार पर अनिवार्य अस्तित्व का होना सिद्ध होता है। इस लिए अब इस दशा पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या यह संभव है कि सारे अस्तित्व संभव हों या नहीं? या फिर इस विचार को रद्द करने के बाद एक अनिवार्य अस्तित्व का होना सिद्ध होता है। भले ही उसके अन्य गुणों और विशेषताओं के लिए दूसरे तर्कों की आवश्यकता हो। इस आधार पर दूसरी दशा को ग़लत सिद्ध करने के लिए हमें एक अन्य भूमिका का वर्णन करना होगा। वह भूमिका यह है कि सारे अस्तित्व का मुमकेनुल वुजूद अर्थात संभव व निर्भर अस्तित्व होना बौद्धिक दृष्टि से असंभव है क्योंकि संभव अस्तित्व के लिए किसी कारक की आवश्यकता होती है। कारकों में कभी समाप्त न होने वाला क्रम बौद्धिक दृष्टि से अस्वीकार्य है तो फिर यह कारकों का क्रम किसी ऐसे अस्तित्व पर जाकर थम जाना चाहिए जो संभव अस्तित्व न हो और उसे अपने अस्तित्व के लिए किसी कारक की आवश्यकता न हो अर्थात वाजिबुल वुजूद या अनिवार्य अस्तित्व हो। जब चर्चा यहाँ तक पहुँचती है तो फिर दर्शनशास्त्र के कुछ दूसरे विषयों का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। यदि किसी अस्तित्व को दूसरे की आवश्यकता हो और उसका अस्तित्व एक प्रकार से दूसरे अस्तित्व पर टिका हो तो दर्शनशास्त्र में ज़रूरत रखने वाले अस्तित्व को परिणाम और दूसरे को कारक कहते हें किंतु कारक के लिए यह भी संभव है कि वह बिल्कुल आवश्यकता मुक्त न हो बल्कि स्वयं उसे भी किसी अन्य कारक की आवश्यकता हो किंतु यदि कोई ऐसा कारक हो जिसे किसी अन्य कारक की आवश्यकता न हो तो वह महाकारक होगा और उसे किसी भी अन्य अस्तित्व की आवश्यकता नहीं होगी। यहाँ तक तो आप कारक और परिणाम के आशय से परिचित हुए। अब यहाँ से आगे हमें इस बात को स्पष्ट करना है कि प्रत्येक संभव अस्तित्व के लिए एक कारक की आवश्यकता होती है। इस बात के दृष्टिगत कि संभव अस्तित्व स्वतः अस्तित्व में नहीं आता बल्कि उसका अस्तित्व किसी एक अस्तित्व या कई अस्तित्वों पर निर्भर होता है क्योंकि यह बात स्पष्ट है कि जो भी गुण किसी विषय के लिए दृष्टि में रखा जाएगा तो उसका प्रमाण या तो वह स्वयं होगा या फिर किसी अन्य के द्वारा प्रमाणित किया जाएगा। उदाहरण स्वरूप प्रत्येक वस्तु या तो स्वयं प्रकाशमय है या किसी अन्य के प्रकाश से प्रकाशमय हुई है, हर वस्तु या तो स्वयं तैलीय होती है या उसे दूसरी वस्तु अर्थात तेल द्वारा तैलीय किया जाता है। इस लिए यह संभव नहीं है कि कोई वस्तु न तो स्वयं प्रकाश व चिकनाई रखती हो और न ही किसी अन्य वस्तु ने उसे प्रकाश व चिकनाई प्रदान की हो किंतु फिर भी वह प्रकाशमय व चिकनी हो!अतः किसी वस्तु का अस्तित्व या तो स्वयं उस पर निर्भर होता है और या फिर उसे अस्तित्व देने वाला कोई दूसरा होता है। इस आधार पर हर संभव अस्तित्व जो स्वतः अस्तित्व में नहीं आया होता है वह किसी दूसरे अस्तित्व द्वारा अस्तित्व में आता है और उस कारक का परिणाम होता है। वास्तव में यह वही सिद्धांत है कि हर संभव अस्तित्व के लिए एक कारक की आवश्यकता होती है। कुछ लोगों ने यह समझ लिया है कि कारक के सिद्धांत का अर्थ यह है कि हर अस्तित्व को कारक की आवश्यकता होती है। अतः इस आधार पर उनका कहना है कि ईश्वर भी एक अस्तित्व है इस लिए उसका भी कोई कारक होना चाहिए! उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि कारक सिद्धांत में अस्तित्व के सभी प्रकारों की बात नहीं की गई है बल्कि इस सिद्धांत के अंतर्गत संभव व निर्भर अस्तित्व ही आते हैं जिन्हें किसी कारक की आवश्यकता होती है बल्कि दूसरे शब्दों में हर निर्भर व आवश्यकता रखने वाले अस्तित्व को कारक की आवश्यकता होती है न कि हर अस्तित्व को। इस विषय का भी स्पष्ट होना आवश्यक है कि कारकों की श्रंखला को एक ऐसे अस्तित्व पर जाकर समाप्त होना चाहिए जो किसी कारक का परिणाम न हो अर्थात अनंत तक कारकों की श्रंखला बौद्धिक रूप से संभव नहीं है। इस प्रकार अनिवार्य अस्तित्व की उपस्थिति जो स्वतः अस्तित्व में आया हो और जिसे किसी कारक की आवश्यकता न हो सिद्ध हो जाती है। दार्शनिकों ने कारकों में चक्रबद्ध निर्भरता को ग़लत सिद्ध करने के लिए बहुत से तर्क दिए हैं किंतु वास्तविकता यह है कि कारकों के संदर्भ में चक्रबद्ध निर्भरता का ग़लत होना लगभग एक स्पष्ट विषय है और थोड़े से विचार के बाद यह विषय स्पष्ट हो जाता है। अर्थात इस बात के दृष्टिगत कि परिणाम का अस्तित्व कारक की उपस्थिति पर निर्भर होता है, यदि हम यह मान लें कि यह स्थिति सारे अस्तित्वों के लिए है तो फिर कभी भी किसी अस्तित्व को सिद्ध करना संभव नहीं होगा क्योंकि ऐसे परिणामों के एक समूह की कल्पना, जो एक दूसरे के लिए कारक भी हों, बौद्धिक दृष्टि से संभव नहीं है। उदाहरण स्वरूप धावकों की एक टीम दौड़ने के लिए तैयार खड़ी है किंतु हर एक ने यह सोच रखा है कि जब तक दूसरा नहीं दौड़ेगा वह दौड़ना आरंभ नहीं करेगा तो यदि सारे धावक ऐसा ही सोच लें तो फिर उनमें से कोई भी दौड़ना आरंभ नहीं करेगा। इसी प्रकार यदि हर अस्तित्व की उपस्थिति किसी दूसरे अस्तित्व की उपस्थिति पर निर्भर हो तो कोई भी अस्तित्व होगा ही नहीं जबकि हम अपनी आँखों से इतने सारे अस्तित्वों को देख रहे हैं। अतः सिद्ध हुआ कि कोई एक ऐसा अस्तित्व है जो अन्य सभी अस्तित्वों से भिन्न है और उसे अपनी उपस्थिति के लिए किसी अन्य अस्तित्व की आवश्यकता नहीं है। अब इतनी सारी भूमिकाओं के बाद एक बार फिर हम ईश्वर के अनिवार्य अस्तित्व के लिए अपने तर्क पर विचार करेंगे। जिस वस्तु को भी अस्तित्व का नाम दिया जा सकता हो, उसके लिए दो ही दशाओं की कल्पना की जा सकती है। या अस्तित्व उसके लिए आवश्यक व अनिवार्य नहीं होगा अर्थात वह हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता। ऐसे अस्तित्व को संभव व निर्भर अस्तित्व कहा जाता है। विदित है कि किसी वस्तु का होना असंभव हो तो फिर उसके अस्तित्व का प्रश्न ही नहीं उठता और उसे किसी भी स्थिति में अस्तित्व का नाम नहीं दिया जा सकता। इस लिए हर उपस्थित वस्तु या तो अनिवार्य अस्तित्व है, या फिर संभव अस्तित्व। संभव व निर्भर अस्तित्व के अर्थ पर थोड़ा सा विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस वस्तु पर भी यह शब्द चरितार्थ होता है उसके लिए निश्चित रूप से किसी कारक की आवश्यकता होगी क्योंकि यदि कोई अस्तित्व स्वतः उपस्थित होने में सक्षम न हो तो फिर अनिवार्य रूप से उसे किसी कारक की आवश्यकता होगी। कारक व परिणाम के सिद्धांत का मूल अर्थ भी यही है कि हर संभव अस्तित्व अर्थात जो स्वयं अस्तित्व में आने में सक्षम न हो उसे किसी कारक की आवश्यकता होती है न कि हर अस्तित्व को कारक की आवश्यकता होती है। या फिर यह भी कहना सही नहीं होगा कि ईश्वर पर विश्वास कारक व परिणाम के सिद्धांत को तोड़ने के समान है। दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि यदि प्रत्येक अस्तित्व संभव अस्तित्व का स्वामी हो और सब को किसी कारक की आवश्यकता हो तो किसी भी अस्तित्व को सिद्ध करना संभव नहीं होगा। ठीक उसी प्रकार जैसे कुछ लोगों का एक समूह हो और उस समूह का हर व्यक्ति कुछ करने के लिए दूसरे की प्रतीक्षा करे तो निश्चित रूप से सारे के सारे लोग प्रतीक्षा ही करते रह जाएंगे। इस प्रकार इतने सारे अस्तित्वों की उपस्थिति इस बात को सिद्ध करती है कि एक ऐसा अस्तित्व भी है जिसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक की आवश्यकता नहीं है और उसका अस्तित्व अनिवार्य है, अर्थात वह वाजिबुल वुजूद है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि ईश्वर को अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक अस्तित्व की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आवश्यकता पड़ी तो वह आवश्यकता मुक्त नहीं रह जाएगा जबकि ईश्वर आवश्यकता मुक्त है। चर्चा के मूल बिंदु संक्षेप में इस प्रकार हैं कि अस्तित्व तीन प्रकार के होते हैं, अनिवार्य, संभव और असंभव। अनिवार्य अस्तिव को अपने के लिए किसी कारक की आवश्यकता नहीं होती जबकि संभव अर्थात निर्भर अस्तित्व को होती है। इस बात के दृष्टिगत कि परिणाम का अस्तित्व कारक के अस्तित्व पर निर्भर होता है, यदि हम यह मान लें कि यह स्थिति सारे अस्तित्वों के लिए हो तो फिर कभी भी किसी भी अस्तित्व को सिद्ध करना संभव नहीं होगा क्योंकि ऐसे परिणामों के एक समूह की कल्पना जो एक दूसरे के कारक ही हों बौद्धिक दृष्टि से संभव ही नहीं है। ब्रह्मांड में इतने सारे अस्तित्वों की उपस्थिति इस बात को सिद्ध करती है कि एक ऐसा अस्तित्व भी है जिसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक अस्तित्व की आवश्यकता नहीं है। (जारी है)