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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-17 कैसा है ईश्वर का जीवन?

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    ईश्वर के व्यक्तिगत गुणों में से एक जीवन है। हम इसी विषय की समीक्षा करेंगे। इस विश्व और ब्रह्मांड में बहुत सी चीज़े जीवित हैं किंतु उन में बहुत अंतर है। जीवन में भी अंतर होता है। जब हम यह कहते हैं कि ईश्वर जीवित है तो यह प्रश्न उठता है कि वह किस प्रकार जीवित है? और उसका जीवन किस प्रकार का है? जीवन का अर्थ जीवित रहना है और यह ईश्वर की रचनाओं में से दो प्रकार की रचनाओं के बारे में कहा जा सकता है। एक पेड़-पौधों के बारे में जो फलते-फूलते हैं और दूसरे, प्राणियो और मनुष्यों के बारे में जो बोध व इरादा रखते हैं। पेड़-पौधों के बारे में हम जब जीवन की बात करते हैं तो उन में एक कमी का पता चलता है। पेड़-पौधे फलते-फूलते हैं और फलना-फूलना यह दर्शाता है कि जो बढ़ रहा है या फल-फूल रहा है वह इससे पूर्व परिपूर्ण नहीं हो सकता और उसमें कमी है जिसे वह बढ़ कर या फल-फूल कर पूरी करता है। अर्थात पेड़-पौधों की परिपूर्णता उन के बढ़ने और फलने-फूलने पर निर्भर होती है और उन का फलना-फूलना और बढ़ना कुछ बाहरी तत्वों पर निर्भर होता है। अर्थात उनकी परिपूर्णता की प्रक्रिया कुछ बाहरी कारकों पर निर्भर होती है जिन के आधार पर धीरे-धीरे उनमें परिवर्तन आता है और वह धीरे-धीरे अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। यह भी जीवित होना और जीवन है किंतु इस प्रकार के जीवन की ईश्वर के लिए कल्पना भी नहीं की जा सकती । जीवन का दूसरा अर्थ जो प्राणियों और विशेषकर मनुष्यों में चरितार्थ होता है वह वास्तव में परिपूर्णता का ही एक अर्थ है। यद्यपि जिन रचनाओं पर यह अर्थ चरितार्थ होता है उन में कमियां और अवगुण भी पाए जाते हैं किंतु इस के लिए हम मनुष्य के अंतिम और उस चरण की कल्पना कर सकते हैं जिसमें वह परिपूर्णता तक पहुंच चुका हो और उसमें कोई कमी न रह गयी हो।

    अब प्रश्न यह है कि ईश्वर के जीवन का क्या अर्थ है? इसके लिए यह जानना आवश्यक होगा कि जीवन का क्या अर्थ है। उस अर्थ में जीवन जिस के लिए ज्ञान व शक्ति अनिवार्य हों वास्तव में शरीर की नहीं बल्कि आत्मा की विशेषता होता है। अर्थात प्राण वास्तव में शरीर की विशेषता नहीं है बल्कि आत्मा की अनिवार्य विशेषता और और चूंकि शरीर का आत्मा से संबंध होता है इस लिए जिस शरीर में प्राण होता है उसे प्राणी कहा जाता है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि जीवन वास्तव में पराभौतिक वस्तु की विशेषता है अर्थात जीवन भौतिकता की विशेषता नहीं है बल्कि ऐसे अस्तित्व का गुण है जो भौतिकता से दूर होता है। अर्थात जिस प्रकार लंबाई-चौड़ाई, व्यास, घनत्व आदि भौतिक वस्तु की विशेषता होती है उसी प्रकार जीवन भौतिकता से परे वस्तु की विशेषता होता है। भौतिकता से दूर हर वस्तु जीवन रखती है और यह हम बता चुके हैं कि ईश्वर भौतिकता से दूर है तो फिर वह जीवन रखता है। इसके साथ ही यह सिद्धान्त भी है कि हर सक्षम व ज्ञानी अस्तित्व, अपरिहार्य रूप से जीवित होता है और ईश्वर सक्षम व ज्ञानी है।ईश्वर ज्ञानी है किंतु उसका ज्ञान कैसा है ? ज्ञानी होना ईश्वर की एक अति महत्वपूर्ण विशेषता है किंतु इस का अर्थ क्या है? ज्ञान का अर्थ अत्यधिक स्पष्ट विषयों में से है। यह सही है कि ज्ञान के अर्थ का ज्ञान लगभग सभी को है किंतु यह भी एक वास्तविकता है कि जिस प्रकार के ज्ञान का अर्थ लोगों को मालूम है और ज्ञान का जो अर्थ अत्यधिक स्पष्ट है उस अर्थ में जो ज्ञान होता है वह सीमित और अधूरा होता है। इसलिए ईश्वर इस प्रकार के ज्ञान का स्वामी नहीं हो सकता। हमारी बुद्धि किसी एक ऐसे अस्तित्व की कल्पना अवश्य कर सकती है जिसमें कोई कमी न हो और वह अस्तित्व साक्षात ज्ञान हो। ईश्वर वही है और उसका ज्ञान ऐसा ही है।इसके साथ ही ईश्वर के ज्ञान को सिद्ध करने का एक अन्य मार्ग भी है जो वास्तव में उसकी रचनाओं में चिंतन द्वारा संभव है। रचना जितनी अधिक सूक्ष्म होगी उसका रचयता उतना ही अधिक ज्ञानी होगा। जैसे यदि गूढ़ विषय पर लिखी गयी पुस्तक हम पढ़ते हैं तो पुस्तक में जितने अच्छे प्रकार से समीक्षा व विश्लेषण किया गया होगा हमें उसका लेखक उतना ही ज्ञानी लगेगा। इसी प्रकार जब हम दर्शनशास्त्र या उदाहरण स्वरूप विज्ञान के विषय पर लिखी गयी कोई किताब पढ़ते हैं तो हम यह नहीं सोच सकते कि इसका लिखने वाला अज्ञानी होगा। तो फिर यदि हम इस ब्रह्माण्ड के लिए किसी रचयिता को मानते हैं तो उसे अज्ञानी कदापि नहीं समझ सकते क्योंकि जिन रचयनाओं के बारे में जानकारी रखने वाले को हम ज्ञानी कहते हैं उनके रचयिता को अज्ञानी कैसे समझ सकते हैं। इस सदंर्भ में बहुत से विषयों और आयामों पर चर्चा की जा सकती है किंतु उसका यहां स्थान नहीं है। इस चर्चा के मुख्य विषय इस प्रकार थेः जीवन शरीर की नहीं बल्कि आत्मा की विशेषता है। भौतिकता से दूर हर वस्तु जीवन रखती है और यह हम बता चुके हैं कि ईश्वर भौतिकता से दूर है तो फिर वह जीवित है। प्रत्येक सक्षम व ज्ञानी के लिए जीवन आवश्यक होता है। ईश्वर ज्ञानी व सक्षम है इस लिए वह जीवित है।

    विश्व में ज्ञान, विभिन्न वस्तुओं के बारे में जानकारी को कहते हैं, तो जिन रचनाओं के बारे में जानकारी रखने वाले को हम ज्ञानी कहते हैं उनके रचयिता को अज्ञानी कैसे समझ सकते हैं?