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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-18 ईश्वर की शक्ति व इरादा

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    हमारी चर्चा चल रही है ईश्वरीय गुणों और विशेषताओं के विषय पर पिछली चर्चा में ईश्वर के जीवन व ज्ञान के बारे में बात की गई इस चर्चा में ईश्वर के एक अन्य गुण “शक्ति” पर चर्चा कर रहे हैं। तो सब से पहले तो यह जानना आवश्यक है शक्ति क्या है? कोई शक्तिवान या समर्थ है इसका अर्थ यह होता है कि वह जो चाहे करे, जो चाहे न करे। अर्थात सामर्थ्य व शक्ति के लिए इरादे का होना आवश्यक है। वह कर्ता जो अपने काम, अपने इरादे से करता है उसके बारे में कहा जाता है कि वह जो कर रहा है उसमें उसकी शक्ति है । इस आधार पर शक्ति व सामर्थ्य का अर्थ होता है कर्ता में क्षमता के उस स्रोत का होना जिसके आधार पर वह कोई काम कर सकता है किंतु इसके साथ यह भी जानना आवश्यक है कि किसी काम को करने की शक्ति का अर्थ यह नहीं है कि निश्चित रूप से वह काम किया भी जाए बल्कि उस काम को करने या न करने की शक्ति ही शक्तिशाली व समर्थ होने को सिद्ध करती है।जो काम शक्ति से संबंधित होता है उसमें होने की क्षमता आवश्यक है। अर्थात जो काम अपने आप में असंभव हो वह शक्ति व क्षमता के दायरे में नहीं आता और ईश्वर में हर काम की शक्ति होने का अर्थ यह नहीं है कि वह ऐसे काम भी कर सकता है जो बौद्धिक रूप से असंभव हो जैसे यह कहा जाए कि ईश्वर हर काम कर सकता है इस लिए वह अपने जैसे दूसरे ईश्वर को भी जन्म दे सकता है, यह सही नहीं है क्योंकि यह संभव नहीं है कि ईश्वर अपने जैसे ईश्वर को बनाए क्योंकि जो बनाया गया होगा वह ईश्वर के समान नहीं हो सकता। या कोई यह कहे कि ईश्वर हर काम कर सकता है इस लिए वह दो की संख्या को दो ही रखे किंतु उसे बढ़ाकर तीन कर दे या किसी मनुष्य को संतान ही रखे किंतु उसे उसके पिता से पूर्व जन्म दे दे। सारांश यह है कि ईश्वर हर काम कर सकता है इस का अर्थ यह है कि वह हर वह काम कर सकता है जिसमें होने की योग्यता होगी। ईश्वर हर काम कर सकता है इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सारे काम करता भी है। नहीं, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वह चाहे तो हर काम कर सकता है किंतु वह वही काम करता है जो चाहता है और बहुत से ऐसे काम हैं जिन्हें यदि वह चाहे तो कर सकता है किंतु चाहता नहीं इस लिए नहीं करता। शक्ति की जो परिभाषा है उसमें अधिकार व इच्छा भी शामिल। अर्थात सही अर्थ में शक्तिशाली वही होता है जिसकी शक्ति इच्छा व अधिकार के नियत्रंण में होती है। ईश्वर के संदर्भ में हम यह कहते हैं कि जिस प्रकार ईश्वर में परम शक्ति होती है उसी प्रकार उसमें परम अधिकार भी होता है और कोई भी कारक उसे किसी काम पर विवश नहीं कर सकता अर्थात उसकी शक्ति पूर्ण रूप से उसके नियंत्रण में होती है। किसी भी प्रकार से न तो उस पर दबाव डाला जा सकता है और न ही उसे विवश किया जा सकता है क्योंकि सृष्टि में शक्ति जहां जहां भी है सब उसी की प्रदान की हुई है इस लिए वह अपनी ही प्रदान की हुई वस्तु से विवश नहीं हो सकता । ईश्वर की शक्ति के बारे में हमारा यह मानना है कि वह सर्व शक्तिमान है। उसकी शक्ति की, स्वयं उसकी भांति सीमा नहीं है और वह जो चाहे कर सकता है उसकी शक्ति उसके इरादे के नियत्रंण में है। वह जो भी करता है अपनी इच्छा और इरादे से करता है। यद्यपि उसकी इच्छा और इरादा हमारी इच्छा और इरादे से बहुत भिन्न होता है क्योंकि हमारी इच्छा, इरादे और फ़ैसलों या कुछ करने के निर्णयों पर बहुत से भीतरी व बाहरी तत्व प्रभाव डालते हैं। किंतु ईश्वर के बारे में ऐसा नहीं है।

    इस चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

    • ईश्वर सर्व शक्तिमान है और वह हर काम कर सकता है।

    • हर काम कर सकने का यह अर्थ नहीं है कि वह हर काम करता भी है बल्कि उसकी शक्ति उसके इरादे के अधीने है अर्थात ईश्वर जो चाहता है करता है और जो नहीं चाहता नहीं करता।

    • ईश्वर हर काम कर सकता है इसमें वह काम नहीं आते जो स्वयं ही बौद्धिक रूप से असंभव हों। जैसे दो को चार में बदलना बिना कोई संख्या बढ़ाए।

    • मनुष्य जब कोई काम करने का फैसला करता है तो इस फैसले में बहुत से भीतरी और बाहरी तत्व प्रभावशाली होते हैं किंतु ईश्वर के बारे में ऐसा नहीं है।