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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-21 ईश्वर का इरादा

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-21 ईश्वर का इरादाईश्वर का एक महत्वपूर्ण गुण ईश्वर होना है। ईश्वर की ईश्वरीयता के बारे बहुत कुछ कहा जा चुका है और बहुत कुछ कहा जा सकता है किंतु यहां पर हम यही स्पष्ट करना चाहेंगे कि अरबी भाषा में इलाह का अर्थ होता है पूज्य। इलाह से ही अल्लाह बना है। इलाह होने का अर्थ वह अस्तित्व है जो उपासना योग्य हो अर्थात जिस की उपासना की जा सकती हो। इस आधार पर उपासना योग्य होना और पूज्य होना ऐसा गुण है जिसके लिए मनुष्य द्वारा उपासना को भी दृष्टिगत रखना होगा यद्यपि बहुत से लोग ग़लत वस्तुओं की उपासना करते हैं और उन्हें पूज्य मानते हैं किंतु वास्तव में जो उपासना योग्य है वह, वही है जिसने सब को पैदा किया है और सब का पालनहार है। इसी लिए धर्म पर विश्वास की कम से कम सीमा वही है जहां तक ईश्वर में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को पहुंचना चाहिए और यह कि इस विश्वास को साथ कि ईश्वर एक ऐसा अस्तित्व है जिसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य की कोई आवश्यकता नहीं है उसी ने सब की रचना की है और उसके के हाथ में सब कुछ है तो यह भी मानना आवश्यक है कि केवल वही उपासना योग्य है और इस्लाम में ला इलाहा इल्लल्लाह का अर्थ भी यही है अर्थात अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी ईश्वर और उपासना योग्य नहीं है।

    ईश्वर से संबधित ज्ञान में एक अत्यन्त जटिल विषय ईश्वर का इरादा है और इस संदर्भ में भांति भांति के प्रश्न हैं जिन पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है, जैसे ईश्वर का इरादा उसके तुलनात्मक गुणों में से है या व्यक्तिगत गुणों में से है? या यह कि ईश्वर का इरादा हमेशा से था और हमेशा रहने वाला है या फिर कभी ऐसा भी काल था जिसमें ईश्वर का इरादा नहीं था और बाद में हो गया और कभी ऐसा भी समय आएगा जब ईश्वर का इरादा नहीं रहेगा इस प्रकार से बहुत से प्रश्न हैं जिन के उत्तर के लिए जटिल दार्शनिक चर्चा की आवश्यकता होगी किंतु यहां पर हम इस संदर्भ में कुछ मूल बातों को ही स्पष्ट करेंगे।

    आम बोलचाल में इरादे के कम से कम दो अर्थ होते हैं पहला अर्थ चाहना है और दूसरा कोई काम करने का संकल्प।पहला अर्थ बहुत व्यापक है और इसमें वस्तुओं और अपने तथा दूसरों के कामों को चाहना आदि जैसे अर्थ शामिल होते हैं किंतु दूसरा अर्थ केवल स्वयं मनुष्य के अपने काम के लिए ही प्रयोग होता है। इरादे का पहला अर्थ अर्थात चाहना, यद्यपि मनुष्य के लिए एक प्रकार की मनोदशा है किंतु बुद्धि इस की कमियों को दूर करके एक ऐसा अर्थ निकाल सकती है जो भौतिकता से परे बल्कि ईश्वर के लिए भी प्रयोग किया जा सकता हो।

    ईश्वर का इरादा भी उसक बहुत से गुणों की भांति उसके अस्तित्व में है और कोई अलग वस्तु नहीं है, इसी प्रकार ईश्वर का इरादा, अन्य लोगों के इरादों से बहुत अलग होता है और ईश्वर के इरादे में चरण या भूमिकाएं नहीं होती बल्कि किसी की परिवर्तन व उत्पत्ति का मूल कारक उसका इरादा मात्र ही होता है। जैसा कि क़ुरआन मजीद के सूरए यासीन की आयत नंबर ८२ में आया है।उसका काम तो इस प्रकार है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो कहता है हो जा और वह चीज़ हो जाती है।

    ईश्वर के इरादे के बारे में जिन बातों की चर्चा हमने की है उनसे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर का इरादा असीमित रूप से किसी वस्तु को पैदा करने हेतु प्रयोग नहीं होता बल्कि मूल रूप से ईश्वर के इरादे से जो संबंध होता है वह पैदा होने वाली वस्तु की भलाई व हित का आयाम होता है और चूंकि भौतिक वस्तुओं के विभिन्न आयाम होते हैं और भौतिक वस्तुओं की अधिकता कुछ अन्य वस्तुओं के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है इस लिए ईश्वरीय कृपा के लिए यह आवश्यक होता है कि वह सारी वस्तुओं को कुछ इस प्रकार से पैदा करे कि उनके हानिकारक आयाम कम से कम दूसरी वस्तुओं को हानि पहुंचाएं और अधिक से अधिक लाभ का कारण हों। इस कृपा व संबंध को तत्वदर्शिता व हिकमत कहा जाता है। यह जो कहते हैं कि ईश्वर तत्वदर्शी है उसका यही अर्थ है अन्यथा तत्वदर्शिता, रचनाओं से भिन्न कोई वस्तु नहीं है और न ही ऐसी कोई वस्तु अथवा गुण है जो ईश्वरीय इरादे पर प्रभाव डाले।

    इस चर्चा के मुख्य बिन्दुः

    • ईश्वर में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को कम से कम यह विश्वास होना चाहिए कि एक ऐसा अस्तित्व है जिसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य की कोई आवश्यकता नहीं है, उसी ने सब की रचना की है और उसके के हाथ में सब कुछ है और वही उपासना योग्य है।

    • ईश्वर का इरादा भी उसक बहुत से गुणों की भांति उसके अस्तित्व में है और कोई अलग वस्तु नहीं है।

    • ईश्वर की तत्वदर्शिता का अर्थ यह है कि वह रचनाओं को ऐसा बनाता है जिससे उनके हानिकारक आयाम कम और लाभदायक आयाम अधिक हों।