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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म-22 बात करने का ईश्वर का गुण

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    ईश्वर के लिए जिन कामों की कल्पना की जाती है उनमें से एक बोलना और बात करना भी है। ईश्वर का बोलना और उसका कथन प्राचीन काल से ही बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का विषय रहा है। यह विषय इतना महत्वपूर्ण बना कि ईश्वरीय गुणों में इस्लामी इतिहास में इसे सवार्धिक चर्चा का विषय कहा जाए तो ग़लत न होगा। यहां तक कि मूल सिद्धान्तों के बारे में चर्चा करने वाले ज्ञान को, कलाम अर्थात कथन के बारे में अत्यधिक चर्चा के कारण, इल्मे कलाम अर्थात कथनशास्त्र कहा जाता है।

    चर्चा इस विषय पर होती रही है कि ईश्वर में बोलने का गुण, व्यक्तिगत है या तुलनात्मक। एक मत में ईश्वर के कथन को व्यक्तिगत गुण जबकि दूसरे मत में तुलनात्मक गुण कहा गया यही कारण है कि क़ुराने मजीद के संदर्भ में यह चर्चा बहुत अधिक दिनों तक चली क्योंकि कुरआन ईश्वर का कथन है और बुद्धिजीवियों में इस बात पर मतभेद है कि कुरआन ईश्वरीय रचना है या नहीं क्योंकि ईश्वर का कथन यदि रचना है तो वह वाजिबुल वूजूद अर्थात आत्मभू ईश्वर का गुण कैसे हो सकता है और यदि रचना नहीं है तो फिर क्या है ? क्योंकि हर वस्तु या रचना होगी या रचयिता? अब यदि ईश्वर के कथन के बारे में यह माना जाए कि वह ईश्वर के साथ ही साथ था तो फिर इस से ईश्वर और उसके कथन में समकालीनता आवश्यक होगी जो संभव नहीं है क्योंकि ईश्वर का समकालीन कोई नहीं है, वह सदैव से है और सदैव रहेगा। वह उस समय से है जब कुछ भी नहीं था और उस समय तक रहेगा जब कुछ भी न रहेगा। इस से पूर्व ही हम स्पष्ट कर चुके हैं कि ईश्वर को समय या किसी भी सीमा से सीमित नहीं किया जा सकता। तो इस प्रकार से कथन, ईश्वर का समकालीन नहीं है तो यदि वह समकालीन नहीं है तो फिर बाद में उत्पन्न हुआ है तो फिर वह किस प्रकार ईश्वर का गुण हो सकता है? क्योंकि ईश्वर के लिए परिवर्तन की कल्पना नहीं की जा सकती। सारी चर्चा इस गुण के तुलनात्मक या व्यक्तिगत होने में है यदि ईश्वर के बोलने को उस का व्यक्तिगत गुण माना जाए तो यह सारे प्रश्न और दशाएं उत्पन्न होती हैं किंतु यदि हम उसके इस गुण को तुलनात्मक मानें तो फिर यह सारे चर्चा की समाप्त हो जाती है।

    इस चर्चा में हम गहन विषयों तक नहीं जाएंगे, बस यहां पर यह बताना चाहते हैं कि यदि ईश्वर के बोलने के गुण पर विचार किया जाए तो बड़ी सरलता से यह समझ में आ जाएगा कि यह गुण तुलनात्मक है क्योंकि जैसा कि हमने तुलनात्मक गुण की परिभाषा करते समय बताया था कि इस गुण के लिए दो पक्षों को दृष्टिगत रखना होता है। इसी लिए यदि ध्यान दिया जाए तो समझ में आ जाएगा कि बात करना तुलनात्मक गुण है क्योंकि इसके लिए उसकी भी आवश्यकता है जिससे बात की जाए।

    ईश्वर की सच्चाई भी चर्चा का एक विषय है अर्थात क्या ईश्वर सच्चा है और क्या वह किसी स्थिति में झूठ बोल सकता है या फिर यह है कि ईश्वर का कथन हर दशा में सत्य ही होता है?यहां पर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ईश्वरीय कथन जो आदेश के रूप में हैं उनके बारे में सच या झूठ कोई विषय नहीं हैं बल्कि यह आदेश मनुष्य का कर्तव्य होते हैं किंतु यदि ईश्वरीय कथन में किसी घटना की सूचना दी गयी है या भविष्यवाणी की गयी है तो इस संदर्भ में सच व झूठ की बात की जा सकती है किंतु हमारा यह मानना है कि ईश्वर के किसी भी कथन में झूठ की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस का प्रमाण यह है कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना की और उसे सही मार्ग तक पहुंचाने का दायित्व स्वयं लिया। इस प्रकार से वह यदि मनुष्य से कुछ कहता है तो वह वास्तव में उसके मार्गदर्शन के लिए होता है किंतु यदि उसके कथन में झूठ की संभावना होगी तो फिर उसके हर कथन के बारे में झूठ की शंका होगी और इस प्रकार से उस पर विश्वास नहीं होगा जिससे मनुष्य के मार्गदर्शन का मूल लक्ष्य ही ख़तरे में पड़ जाएगा और यह ईश्वर की तत्वदर्शिता के विपरीत होगा।

    यूं भी झूठ, प्रायः अपनी ग़लती छिपाने या किसी के भय से या फिर किसी को धोखा देने अथवा लोभ के कारण बोला जाता है और ईश्वर इन सबसे बहुत महान है इस लिए उसे झूठ बोलने की आवश्यकता ही नहीं है।

    इस चर्चा के मुख्य बिंदुः

    • ईश्वर में बोलने का गुण, उसके तुलनात्मक गुणों में से है क्योंकि इसके लिए दो पक्षों की आवश्यकता होती है। ईश्वर यदि बात करेगा तो इसके लिए किसी ऐसे की आवश्यकता है जिससे वह बात करे। इस प्रकार से यह गुण भी तुलनात्मक है और ईश्वर व मनुष्य के मध्य एक प्रकार के संबंध का सूचक है।

    • हमारा यह मानना है कि ईश्वर के किसी भी कथन में झूठ की कल्पना भी नहीं की जा सकती, इसका प्रमाण यह है कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना की और उसे सही मार्ग तक पहुंचाने का दायित्व स्वयं लिया। इस प्रकार से वह यदि मनुष्य से कुछ कहता है तो वह वास्तव में उसके मार्गदर्शन के लिए होता है किंतु यदि उसके कथन में झूठ की संभावना होगी तो फिर उसके हर कथन के बारे में झूठ की शंका होगी और इस प्रकार से उसपर से विश्वास उठ जाएगा।