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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 27 सबका पालनहार एक है

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    अब तक हमने जिस ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया है और उसके जो गुण बताए हैं वह कितने ईश्वर हैं? अर्थात ईश्वर एक है या कई? इस बारे में कि अनेकेश्वरवादी विचार धारा या कई ईश्वरों में विश्वास किस प्रकार से मनुष्य में पैदा हुआ, विभिन्न दृष्टिकोण पाए जाते हैं। यह सारे दृष्टिकोण समाज शास्त्रियों ने पेश किये हैं किंतु इसके लिए कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। शायद यह कहा जा सकता है कि अनेकेश्वरवाद की ओर झुकाव और कई ईश्ववरों में विश्वास का प्रथम कारण , आकाश व धरती में पायी जाने वाली वस्तुओं और प्राकृतिक प्रक्रियाओं में पायी जाने वाली विविधता रही है और यह विविधता इस बात का कारण बनी कि कुछ लोग यह समझनें लगें कि हर प्रक्रिया का एक विशेष ईश्वर है और उसी के नियंत्रण में वह प्रक्रिया चलती और आगे बढ़ती है। जैसा कि संसार के बहुत से लोगों का यह मानना है कि भलाइयों का ईश्वर अलग है और बुराईयों का ईश्वर अलग है। इस प्रकार के लोगों ने इस सृष्टि के लिए दो स्रोतों को मान लिया। इसी प्रकार सूर्य और चंद्रमा के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव और धरती में विभिन्न वस्तुओं व रचनाओं के विकास व अस्तित्व के लिए उनकी भूमिका के दृष्टिगत यह धारणा बनी कि यह सूर्य और चंद्रमा, मनुष्य के एक प्रकार से पालनहार हैं। इसी प्रकार देखे और महसूस किये जाने योग्य ईश्वर में मनुष्य की रूचि भी इस बात का कारण बनी कि लोग विभिन्न प्रकार की देखी और महसूस की जाने वाली वस्तुओं को ईश्वर के समान मानें और उनकी पूजा करें और फिर यह चलन इतना व्यापक हुआ कि अज्ञानी लोग, इन्हीं चिन्हों और वस्तुओं को ईश्वर समझ बैठे और इस प्रकार से उनकी कई पीढ़ियां गुज़र गयीं और धीरे- धीरे हर जाति व राष्ट्र ने अपनी धारणाओं व आस्थाओं के आधार पर अपने लिए विशेष प्रकार के देवता और विशेष प्रकार के संस्कार बना लिए ताकि इस प्रकार से एक ओर ईश्वर के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने की भावना शांत कर सकें और दूसरी ओर ईश्वर की सच्ची उपासना के कड़े नियमों से बचकर उसकी इस प्रकार से उपासना करने का अवसर भी प्राप्त कर लें जिससे उनकी आतंरिक इच्छाओं की पूर्ति भी हो सके और उसे पवित्रता व धार्मिक संस्कारों का नाम भी दिया जा सके। यही कारण है आज भी बहुत से धर्मों में नाच- गाना तथा शराब पीकर अश्लील कार्य धार्मिक संस्कारों का भाग समझा जाता है। अनेकेश्वरवाद का एक अन्य कारण यह भी है कि समाज पर अपना अधिकार और वर्चस्व जमाने का प्रयास करने वाले भी आम लोगों में इस प्रकार की विचार- धारा व धारणा के जन्म लेने का कारण बने हैं इसी लिए समाज पर अधिकार की इच्छा रखने वाले बहुत से लोगों ने आम लोगों के मध्य अनेकेश्वरवाद की धारणा पैदा की और स्वंय को पूज्य और देवता समान बना कर पेश किया ताकि धर्म का सहारा लेकर लोगों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकें। राजा- महाराजाओं की पूजा इसी भावना के अंतर्गत आंरभ हुई जो बाद की पीढ़ियों के लिए देवता बन गये जैसा कि हम प्राचीन चीन, भारत, ईरान और मिस्र में इसका उदाहरण देख सकते हैं। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि एक ईश्वर के स्थान पर एक साथ कई ईश्वरों की उपासना या अनेकेश्वरवाद के जन्म लेने के बहुत से कारण हैं अर्थात कभी अज्ञानता के कारण लोगों ने कई ईश्वरों में विश्वास किया तो कभी समाज के प्रभावी लोगों के षडयन्त्र के कारण तो कभी प्रकृति की विविधताओं से प्रभावित होकर इस सृष्टि के लिए कई पालनहार मान लिया। यदि इतिहास पर गहरी नज़र डाली जाए तो कई ईश्वर में विश्वास ने सदा ही समाज के विकास में बाधा उत्पन्न की है और यही कारण है कि हम देखते हैं कि ईश्वरीय दूतों के संघर्षों का बड़ा भाग, अनेकेश्वर वादियों के विरुद्ध लड़ाई से विशेष रहा है। क्योंकि ईश्वर के अतिरिक्त जो भी ईश्वर थे वे मानव निर्मित थे और चूंकि उन्हें बनाने वालों ने अपने व्यक्तिगत हितों को दृष्टिगत रखा था इस लिए यह प्रक्रिया किसी भी स्थिति में समाज के हित में नहीं हो सकती थी। इस प्रकार से अनेकेश्वरवादी मत में ईश्वर के अतिरिक्त एक या कई अन्य लोगों के पालनहार होने में भी विश्वास रखा जाता है यहां तक कि बहुत से अनकेश्वरवादी विश्व के लिए एक ही रचयिता होने में विश्वास रखते थे और वास्तव में वे विश्व की रचना के मामले में एकीश्वरवादी विचारधारा में आस्था रखते थे किंतु उसके बाद के चरणों में अर्थात दूसरी श्रेणी में देवताओं को मानते थे अर्थात यह कहते थे कि इस सृष्टि का रचनाकार एक ही है किंतु उसने अपने कामों में सहायता के लिए कुछ अन्य लोगों को पैदा किया है जो संसार के विभिन्न कामों में ईश्वर की सहायता करते हैं इन्हें विभिन्न लोगों अलग- अलग नामों से याद करते हैं। । पिछली चर्चाओं में हम विस्तार से यह बता चुके हैं कि वास्तिवक रचनाकर और पालनहार केवल एक ही हो सकता है और यह विशेषता केवल एक ही अस्तित्व की हो सकती है अर्थात रचयिता और पालनहार होना केवल एक ही अस्तित्व की विशेषता हो सकती है और यह दोनों गुण अर्थात रचयिता और पालनहार ऐसे गुण हैं जो एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते अर्थात यह संभव नहीं है कि विश्व का रचयिता कोई और हो और लोगों का पालनहार कोई अन्य और जो लोग इस प्रकार का विश्वास रखते हैं उन्होंने इसमें पाए जाने वाले विरोधाभास की ओर ध्यान नहीं दिया। ईश्वर के एक होने के बहुत से प्रमाण हैं जिनमें से कुछ का हम वर्णन करेंगें किंतु अगली चर्चा में।