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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-3 जिज्ञासा

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    मनुष्य में स्वाभाविक रूप से वास्तविकता की खोज और सत्य तक पहुंचने की इच्छा होती है जो बालावस्था से ही उसमें प्रकट होने लगती है। यही भावना जिसे जिज्ञासा भी कहा जाता है मनुष्य को उन विषयों के बारे में भी विचार व अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है जो धर्म के रूप और नाम से उसके सामने पेश किए जाते हैं। उदाहरण स्वरूप इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए मनुष्य विचार व अध्ययन करने पर प्रोत्साहित हो सकता है जैसेः क्या किसी ऐसी शक्ति का अस्तित्व है जिसका आभास नहीं किया जा सकता और जो भौतिक विशेषताओं से परे है?क्या लोक-परलोक के मध्य कोई संबंध है?यदि कोई संबंध है तो क्या कोई शक्ति ऐसी भी है जिसे इंद्रियों से न समझा जा सकता हो किंतु उसीने इस ब्रह्मांड की रचना की है?क्या मनुष्य का अस्तित्व इसी भौतिक शरीर तक और उसका जीवन इसी सांसारिक जीवन तक सीमित है या फिर कोई अन्य जीवन भी है?यदि कोई अन्य जीवन है तो क्या उस जीवन और सांसारिक जीवन के मध्य कोई संबंध है?यदि कोई संबंध है तो फिर किस प्रकार के सांसारिक काम परलोक और दूसरे जीवन में लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं?जीवनयापन के सही नियम और शैली की पहचान के लिए कौन सा मार्ग अपनाया जाए कि जिससे मनुष्य लोक-परलोक दोनों में सफलता तक पहुंचे?वह कार्यक्रम क्या है जो किसी मनुष्य को दोनों लोकों में सफल बना सकता है?इस प्रकार मनुष्य के भीतर वास्तविकता को जानने की जो स्वाभाविक जिज्ञासा होती है। वह उसे हर प्रकार की वास्तविकता जान लेने और उसके बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करती है। धर्म के बारे में जानकारी भी इससे अपवाद नहीं है। मनुष्य में स्वाभाविक रूप से सत्य व वास्तविकता की खोज की जो भावना होती है, उसके अतिरिक्त भी बहुत से कारक होते हैं जो मनुष्य को अध्ययन व वास्तविकता की खोज के लिए प्रेरित करते हैं। वास्तविकता की खोज के अपने सिद्धांत होते हैं। सबसे पहले तो जिस विषय के बारे में जानकारी प्राप्त करनी होती है उससे संबंधित कई ऐसे विषय होते हैं जिनकी जानकारी आवश्यक होती है। क्योंकि बहुत सी चीज़ें ऐसी होती हैं जो किसी विशेष जानकारी पर ही निर्भर होती हैं। उदाहरणस्वरूप विभिन्न प्रकार की भौतिक व सांसारिक सुविधाओं के लिए वैज्ञानिक शोध आवश्यक होते हैं। आज विभिन्न प्रकार की सुविधाएं जो इस युग में हमें उपलब्ध हैं वो इसी प्रकार के वैज्ञानिक प्रयास का परिणाम हैं। दूसरे शब्दों में मनुष्य जिस वस्तु को आवश्यक समझता है उस तक पहुंचने के लिए प्रयास करता है और इस मार्ग में आवश्यक साधन भी जुटाता है तो फिर यदि यह विश्वास कर लिया जाए कि धर्म भी मनुष्य के हितों की रक्षा कर सकता है और उसे बहुत से ख़तरों से बचा सकता है तो मनुष्य में अपने हितों की रक्षा और ख़तरों से बचने की जो भावना होती है वह उसे धर्म के बारे में अध्ययन व शोध पर प्रेरित करेगी। इस प्रकार यह भावना धर्म के बारे में अध्ययन का एक कारक मानी जाती है। अर्थात यदि कोई सही अर्थ में यह समझने लगे कि धर्म भी एक ऐसी चीज़ है जो उसे लाभ पहुंचा सकता है और यदि उसे छोड़ दिया जाए तो उसे हानि हो सकती है तो फिर स्वाभाविक रूप से उसे धर्म के बारे में जानकारी जुटानी चाहिए। क्योंकि हितों की रक्षाऔर हानियों से बचना मनुष्य के स्वभाव व प्रवृत्ति का भाग है। किंतु जानकारियों के इतने बड़े समूह में लोगों के पास मौजूद कम समय के कारण ऐसा हो सकता है कि बहुत से लोग अध्ययन के लिए ऐसे विषयों का चयन करें जिनका परिणाम सरलता और शीघ्रता से सामने आ जाए और धर्म के बारे में यह सोचकर की इस संदर्भ में अध्ययन कठिन भोगा और उसके परिणाम महत्वहीन होंगे लोग धर्म के बारे में अध्ययन न करें। इस दृष्टि से यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि धर्म का बहुत अधिक महत्व है और यह कि धर्म के बारे में अध्ययन से अधक महत्व किसी और अध्ययन का नहीं है। यहां पर हम यह भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ईश्वर में विश्वास एक स्वाभाविक इच्छा है जो किसी अन्य इच्छा से संबंधित नहीं है। इस रुजहान को धर्म-बोध कहा जाता है और इसे जिज्ञासा, भलाई और सुंदरता जैसे बोधों के साथ मानव आत्मा का चौथा पहलू समझा जाता है। बुद्धिजीवी ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर कहते हैं कि ईश्वर की उपासना सदैव ही किसी न किसी रूप में मानव समाज में मौजूद रही है और यही तथ्य धर्म के स्वाभाविक व सदैव से होने का ठोस प्रमाण है। (जारी है)