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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 38- ईश्वर अपनी हर रचना से प्रेम करता है

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    ईश्वर न्यायी है यह लगभग सभी लोग मानते हैं किंतु बहुत लोग इस पर यह आपत्ति करते हैं कि ईश्वर की विभिन्न रचनाओं और स्वंय मनुष्य में पाई जाने वाली विविधता और विभिन्नता किस प्रकार से ईश्वर के न्याय के अनुरूप हो सकती है और न्यायी व तत्वदर्शी ईश्वर ने क्यों अपनी समस्त रचनाओं को समान नहीं बनाया? इस शंका व आपत्ति का उत्तर यह है कि रचना को अत्यधिक लाभ पहुंचाने के लिए विभिन्न प्राणियों, वस्तुओं और लोगों में भिन्नता आवश्यक है। क्योंकि एक बड़ी व्यवस्था के छोटे भाग उसी समय मिल कर उस पूरी व्यवस्था को लाभ पहुंचा सकते हैं जब उनमें ऐसी भिन्नता हो जो मिल कर उस पूरी व्यवस्था के लिए लाभदायक हो। यदि हम थोड़ा सा विचार करें तो इस आपत्ति का खोखलापन स्पष्ट हो जाएगा। उदारहण स्वरूप यदि हम यह मान लें कि ईश्वर को अपने न्याय के अनुसार सारी सृष्टि को समान बनाना चाहिए था अर्थात उदाहरण स्वरूप यदि सारे मनुष्य, पुरुष या महिला होते तो वंश आगे न बढ़ता और मनुष्य का अस्तित्व ही मिट जाता। महिला और पुरुष के मध्य जो भिन्नता है वह मानव पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए ईश्वर की तत्वदर्शिता का प्रमाण है अन्याय कदापि नहीं है। या यदि ईश्वर इस धरती पर केवल उदाहरण स्वरूप मनुष्य की ही रचना करता तो उसका आहार कहां से आता या यदि सृष्टि की समस्त वस्तुएं समान रंग- रूप की होतीं तो इतनी अधिक सुन्दरता कहां से आती। इस प्रकार से हम यह देखते हैं कि रचनाओं में भिन्नता इस सृष्टि के सामूहिक हितों की रक्षा करती है और यह आवश्यक है। बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए हम एक छोटे से समाज की कल्पना करते हैं। इस समाज में कुछ लोग व्यापार करते हैं, कुछ लोग उदाहरण स्वरूप कपड़ा बुनते हैं कुछ लोग जूते- चप्पल या मानव जीवन के लिए दूसरी आवश्यक वस्तुएं बनाते हैं कुछ लोग खेती करके अनाज पैदा करते हैं कुछ लोग उस अनाज को विभिन्न प्रकार की खाने- पीने की वस्तुओं में बदल देते हैं । यह सारी वस्तुएं किसी भी समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं और समाज के विभिन्न सदस्यों के कामों में भिन्नता अन्याय नहीं बल्कि आवश्यकता है। क्योंकि यदि सारे लोग उदारहण स्वरूप अनाज ही उगाने लगें तो फिर बाक़ी काम कौन करेगा। इसी उदाहरण को आप बड़ा करके पूरी सृष्टि को देखें। इस सृष्टि और मानव जीवन की रक्षा के लिए भिन्नता व विविधता एक आवश्यकता है और इसी लिए तत्व दर्शी ईश्वर ने विविधता के साथ अपनी रचनाओं को अस्तित्व दिया है और यदि इस सृष्टि में मौजूद किसी रचना को तुच्छ और किसी को महत्वपूर्ण समझा जाता है तो इसका कारण स्वंय मनुष्य के अपने विचार और समाज की परिस्थितियां होती हैं और उसका उनकी रचना करने वाले अर्थात ईश्वर से कोई संबंध नहीं है। इसीलिए हम देखते हैं कि विभिन्न समाजों में वस्तुओं और लोगों को तुच्छ समझने का मापदंड अलग- अलग होता है। कोई वस्तु किसी समाज में उसकी विशेष संस्कृति के अनुसार मूल्यवान और कोई अन्य वस्तु मूल्यहीन समझी जाती है। उदाहरण स्वरूप कुछ सौ वर्ष पूर्व तक अफ़्रीका के घने जंगलों में रहने वाले आदिवासी, पश्चिम से सोने की खोज में जाने वालों से लोहे के बदले सोना देते थे। शिकार आदि में प्रयोग के कारण उन आदिवासियों के लिए लोहा सोने से अधिक मूल्यवान था जब कि सभ्य विश्व वासियों के लिए सोना लोहे से कोई गुना अधिक मूल्यवान था। इस प्रकार से हम देते हैं कि चीज़ों का महत्व समाज, संस्कृति और परिस्थितियों और तथा लोगों की विचारधारा से होता है और वास्तव में सोना और लोहा, दोनों ही धातु हैं और इनके मध्य विविधता और उनकी महत्ता का उनके बनाने वाले अर्थात ईश्वर से संबंध नहीं है बल्कि विशेष परिस्थितियों से है। ईश्वर ने अपनी रचनाओं को विभिन्न रूप दिया है किंतु उसने किसी को किसी से तुच्छ नहीं बनाया है उसकी दृष्टि में विविधता विदित रूप में है और यह विविधता किसी भी प्रकार किसी की महानता या तुच्छता की प्रतीक नहीं है। उसकी दृष्टि में उसकी सभी रचनाएं प्रिय हैं और वह अपनी हर रचना से प्रेम करता है।