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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 39-मृत्यु और न्याय

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    ईश्वर के न्याय और उसकी सूझबूझ व उसके तत्वज्ञान पर आपत्ति करने वाले कुछ लोगों का यह कहना है कि यदि ईश्वर के तत्वज्ञान व सूझबूझ के अनुसार इस धरती पर मनुष्य का जीवन ईश्वर का उद्देश्य है तो फिर वह मनुष्य को मृत्यु क्यों देता है? अर्थात कुछ लोगों का कहना है कि यदि ईश्वरीय न्याय व तत्वज्ञान इस बात को आवश्यक बनाता था कि इस धरती पर मनुष्य जीवित रहे और इसी के अंतर्गत ईश्वर ने लोगों को जीवन दिया तो फिर यह कैसा न्याय है कि वह स्वंय ही उन्हें मृत्यु भी देता है। यदि ईश्वर का न्याय जीवन देना था तो फिर मृत्यु की रचना की नहीं करना चाहिए था। इस शंका का उत्तर कई प्रकार से दिया जा सकता है। सब से पहली बात तो यह कि यह किसने कहा है कि ईश्वर का उद्देश्य और न्याय की आवश्यकता धरती पर मनुष्य का जीवन है। यदि ऐसा कोई सोचता है तो यह सही नहीं है। अलबत्ता धरती पर मनुष्य का जीवन ईश्वरीय इच्छा व उद्देश्य का एक भाग और एक चरण है। और जीवन मृत्यु, बाक़ी रहना और ख़त्म हो जाना यह सब कुछ इस सृष्टि के नियमों और कारक तथा उसके प्रभाव के मूल सिद्धान्त के अंतर्गत इसी व्यवस्था का भाग और इसके विभिन्न चरण हैं और ईश्वर का उद्देश्य धरती पर मानव जीवन है तो इस उद्देश्य में मानव जीवन के समस्त चरण आंरभ से अंत तक अर्थात जन्म व मृत्यु दोनों ही शामिल हैं। इसके साथ ही यह बात भी है कि यदि जीवित प्राणी मरते नहीं तो उसके बाद आने वाले बहुत से प्राणियों का जन्म ही न होता और इसी प्रकार उदाहरण स्वरूप कल्पना करें कि यदि सारे मनुष्य जीवित ही रहते और कोई मरता न तो बड़ी जल्दी यह धरती मनुष्य के लिए छोटी पड़ जाती और मानव जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो जाता और लोग भूख व समस्याओं से परेशान होकर मृत्यु की कामना करते। इस प्रकार हम देखते हैं कि सृष्टि का यह आयाम अर्थात मृत्यु भी इस पूरी ईश्वरीय रचना की व्यवस्था के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसी प्रकार यह बात भी स्पष्ट है कि मनुष्य की रचना का मूल लक्ष्य धरती पर उसका जीवन नहीं है बल्कि अनन्त सफलता व कल्याण या मोक्ष तक पहुंचना है और यह तो स्पष्ट है कि मनुष्य जब तक मृत्यु द्वारा इस संसार से नहीं जाएगा उसका कल्याण तथा उसकी सफलता संभव नहीं है। क्योंकि ईश्वर ने अपने दूतों को भेजकर कर यह स्पष्ट कर दिया है कि मनुष्य के लिए यह धरती और यह जीवन अस्थाई है और उसका मुख्य जीवन परलोक में होगा। इस लिए मृत्यु वास्तव में अंत नहीं है बल्कि स्थानान्तरण का एक साधन है। अर्थात लोक व परलोक के मध्य मृत्यु नाम की एक अंधकारमय सुरंग है जिसे पार करके ही लोकवासी परलोक तक जा और अपने कर्मों का फल प्राप्त कर सकते हैं। इस लिए मृत्यु किसी भी रूप में ईश्वरीय उद्देश्य से विरोधाभास नहीं रखती बल्कि इस सृष्टि के रचयिता और महान तत्वज्ञानी ईश्वर की व्यवस्था का भाग और एक आवश्यक चरण है। इस प्रकार से मृत्यु को ईश्वर का अन्याय किसी भी प्रकार से नहीं कहा जा सकता। वास्तव में जो लोग यह शंका करते हैं उनके मन में मृत्यु के वास्तविक अर्थ नहीं होते। चूंकि यदि ध्यान दिया जाए तो मृत्यु एक ऐसी चीज़ है जिसके अधिकांश आयाम मनुष्य के लिए अज्ञात हैं बल्कि मृत्यु की वास्तविकता संभवतः किसी पर स्पष्ट नहीं है मृत्यु के नाम पर हम जो कुछ देखते और अनुभव करते हैं वह वास्तव में मृत्यु का प्रभाव होता है। अर्थात जब किसी मनुष्य की हृदय गति का रुक जाना, सांस बंद हो जाना, शरीर ठडां पड़ जाना तथा इस प्रकार की अन्य दशाएं वास्तव में इस बात का चिन्ह व लक्ष्य हैं कि शरीर मृत हो गया है, मृत्यु की वास्तविकता या अर्थ नहीं और यह दशा जीवन व प्राण की दशा की ही भांति है अर्थात सांस लेना, दिल का धड़कना, चलना- फिरना आदि शरीर के जीवित होने के लक्षण हैं, प्राण की वास्तविकता नहीं किंतु चूंकि इसके परिणाम में कोई कुछ खोता नहीं इस लिए लोग प्राण की दशा से प्रसन्न होते हैं और चूंकि मृत्यु की दशा में लोग कुछ खो देते हैं इस लिए अधिकांश लोग उससे डरते हैं किंतु यह इस डर व भय को प्रमाण बना कर यह नहीं कहा जा सकता कि मृत्यु भयानक वस्तु है और ईश्वर ने मनुष्य को मृत्यु देकर उस पर अन्याय किया है। क्योंकि वास्तव में मृत्यु, मानवजीवन की एक दशा है।