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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म 40- ईश्वर का न्याय और प्राकृतिक आपदायें

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    कुछ लोगों का यह कहना है कि मानव जीवन में इतने दुखों के बावजूद और बाढ़, भूकंप तथा युद्ध जैसी प्राकृतिक व मानवीय समस्याओं के होते हुए किस प्रकार संभव है कि कोई ईश्वर को पूर्ण रूप से न्यायी माने? अर्थात शंका करने वालों का यह कहना है कि जब बाढ़ आती है तो हज़ारों लोग मारे जाते और विस्थापित होते हैं या जब युद्ध होता है तो भी बहुत से ऐसे लोग मारे जाते हैं जिनका युद्ध से कोई लेना- देना नहीं है तो यदि ईश्वर न्यायी है तो फिर बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं क्यों? यदि वह न्यायी है तो फिर युद्धों में निर्दोषों की हत्या को क्यों नहीं रोकता?

    इस शंका का कई आयामों से निवारण किया जा सकता है। सबसे पहली बात तो यह है कि प्राकृतिक आपदाएं भौतिक कारणों से होती हैं। विज्ञान में प्रगति के बाद अब यह सिद्ध हो चुका है कि प्राकृतिक आपदाएं जैसाकि प्राचीन काल में लोग समझते थे, ईश्वर के प्रकोप के कारण नहीं होती थी बल्कि इस प्रकार की आपदाओं में भौतिक कारकों की भूमिका अधिक होती है और चूंकि इस प्रकार की आपदाएं भौतिक कारकों से होती हैं इसलिए अब यह देखना होगा कि भौतिक कारण क्या हैं, यदि कारक प्राकृतिक हो तो यह भी निश्चित है कि उसमें लाभ का पहलु अधिक होगा। अर्थात यदि कोई आपदा आती है तो भले ही विदित रूप से उससे कई हज़ार लोगों के प्राण चले जाते हों किंतु यदि उसके कारकों पर ध्यान दिया जाए तो या तो उसमें कोई हित नज़र आएगा या फिर लाखों लोगों की जीवन रक्षा का विषय निहित होगा। अर्थात प्राकृतिक आपदाएं यदि कभी- कभी कुछ हज़ार लोगों की बलि लेकर, कुछ लाख लोगों की जीवन रक्षा का कारण बनती हैं तो इस प्रकार उसमें निहित हित उसकी हानि से अधिक होते हैं और जिस प्रक्रिया के हित उसकी हानियों से अधिक हों वह प्रक्रिया अन्याय पूर्ण नहीं हो सकती। इसी प्रकार वह समस्याएं जिनका कारक स्वंय मनुष्य होता है यदि उन्हें ईश्वर नहीं रोकता तो भी यह अन्याय नहीं होगा। उदारहण स्वरूप युद्ध होता है उसमें हज़ारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं और यदि ईश्वर इसे रोकेगा तो मनुष्य को प्राप्त अधिकार का हनन होगा जो मनुष्य पर सब से बड़ा अत्याचार होगा। हम चर्चा कर चुके हैं कि मनुष्य काम करने में स्वतंत्र होता है वह चाहे तो अच्छा काम करे और चाहे तो बुरा काम करे और यह अधिकार एवं स्वाधीनता व स्वतंत्रता ईश्वर ने भी उसे प्रदान की है अब यदि ईश्वर स्वंय ही उसमें बाधा डालेगा तो वास्तव में यह अन्याय होगा। यदि कोई अत्याचारी, कुछ निर्दोषों की हत्या करना चाहता हो और ईश्वर अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए उसे ऐसा न करने दे तो फिर उस अत्याचारी को एक मनुष्य होने के नाते, जो स्वाधीनता व स्वतंत्रता उसे प्राप्त है जो भले या बुरे मार्ग के चयन का उसे अधिकार मिला है वह अर्थहीन हो जाएगा और जब अधिकार अर्थहीन होगा तो फिर दंड या इनाम भी अर्थहीन हो जाएगा। ईश्वर ने निर्दोषों की हत्या रोकने के लिए, हत्या को महापाप और हत्यारों को सदैव के लिए नरक में डाले रहने का वचन दिया है। इसके साथ ही उसके समस्त दूतों ने हत्या तथा इस प्रकार के अन्य अपराधों और अन्य लोगों के अधिकारों के हनन से लोगों को रोकने का प्रयास किया है और इन सब बुराईयों से दूर रहने वालों के लिए स्वर्ग का वचन दिया है। अब यदि कोई मनुष्य ईश्वर के इस प्रकार के समस्त आदेशों की अनदेखी करे और अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए दूसरों पर अत्याचार करे तो यह अत्याचार स्वंय उसका पाप होगा और इसे केवल इसलिए कि ईश्वर ने अत्याचारी को अत्याचार से रोका नहीं, ईश्वर का अन्याय नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यदि ईश्वर बुरे लोगों को बुराई करने से रोकने लगेगा तो सब से पहले तो यह उस अधिकार का हनन होगा जो ईश्नर ने उसे दिया है और उसके बाद यह बात भी है कि इस प्रकार से विश्व में कोई बुरा काम कर ही नहीं पाएगा तो फिर सारे लोग अच्छे ही होगें और परीक्षा का विषय ही समाप्त हो जाएगा। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार परीक्षा कक्ष में बैठा एक छात्र यदि नक़ल कर रहा हो तो उसे नक़ल से न रोकना अन्याय नहीं है, नक़ल के बावजूद उसे नकल न करने वाले छात्र के इतना नंबर देना अन्याय है। इसी प्रकार आप चाहें जिस प्रतियोगिता या परीक्षा की कल्पना कर लें। किसी भी प्रतियोगिता या परीक्षा के दौरान गलती पर रोका- टोका नहीं जाता। परीक्षा के बाद ही संबंधित लोग हस्तक्षेप करते हैं। बाढ़ या युद्ध जैसी प्राकृतिक व समाजिक समस्यांए भौतिक कारकों के अंतर्गत होती हैं और प्राकृतिक आपदाओं के हित अधिक और लाभ कम होते हैं इस लिए उसे ईश्वर नहीं रोकता और समाजिक समस्याओं मनुष्य को प्रदान की गयी स्वतंत्रता का परिणाम होती हैं और यदि अपराधी को अपराध करने से रोका जाएगा तो उसे जो स्वतंत्रता प्रदान की गयी है वह उससे छिन जाएगी।

    यदि ईश्वर किसी को बुराई से नहीं रोकता तो यह अन्याय कदापि नहीं है क्योंकि स्वंय उसी ने मनुष्य को स्वतंत्रता प्रदान की है अलबत्ता ईश्वर ने लोगों को बुराइयों से रोकने के लिए दूसरी बहुत सी व्यवस्थाएं की हैं जिनमें सब से मुख्य व्यवस्था यह है कि ईश्वर ने विभिन्न कालों में अपने दूत भेजे जो लोगों को बुराइयों से रोकते और अच्छाओं का निमंत्रण देते थे अब इसके बाद भी यदि कोई अपराध करता है और उसके अपराध के परिणाम स्वरूप कुछ लोगों के साथ अन्याय होता है तो इसकी ज़िम्मेदारी मनुष्य पर है ईश्वर पर नहीं। श्रोताओं ईश्वरीय न्याय पर हमारी चर्चा यहीं पर समाप्त होती है तथा इसके साथ ही ईश्वर और उसके गुणों से सबंधित हमारी चर्चा भी समाप्त होती है अगली कड़ी में हम ईश्वरीय दूतों के बारे में चर्चा आरंभ करेंगें।