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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-5 स्वाभाविक भावना

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    यह जो कहा जाता है कि धर्म के प्रति जिज्ञासा एक स्वाभाविक बात है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि यह भावना सदैव सब लोगों में समान रूप से पायी जाती है बल्कि संभव है कि बहुत से लोगों में यह भावना विशेष परिस्थितियों और ग़लत प्रशिक्षण के कारण निष्क्रिय रूप में दबी पड़ी हो या अपने स्वाभाविक मार्ग से विचलित हो गई हो। मनुष्य की दूसरी स्वाभाविक भावनाओं से साथ भी ऐसा होना संभव है। उदाहरण स्वरूप खाने की इच्छा मनुष्य में स्वाभाविक रूप से भूख की दशा में उत्पन्न होती है किंतु यह आवश्यक नहीं है कि यह इच्छा सब लोगों में समान रूप से पायी जाए। उदाहरण स्वरूप कुछ लोगों को किसी रोग के कारण भूख नहीं लगती, हालांकि उनके शरीर को खाने की आवश्यकता होती है या फिर कुछ लोग भूख मिटाने वाली दवा खाकर इस इच्छा को दबाते हैं किंतु इससे इस वास्तविकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि भूख एक स्वाभाविक इच्छा है। यही स्थिति धार्मिक भावना की भी है। यदि कुछ लोग अपने परिवार या आसपास के वातावरण के कारण इस ओर आकृष्ट नहीं होते तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि उनमें यह भावना मौजूद नहीं है।यह बात तो स्पष्ट हो चुकी है कि वास्तविकता की खोज और अपने हितों की रक्षा जैसी स्वाभाविक भावनाएं अध्ययन व चिंतन तथा ज्ञान प्राप्ति के लिए शक्तिशाली कारक होती हैं। इस आधार पर जब किसी को यह पता चले कि पूरे इतिहास में कुछ ऐसे लोग रहे हैं जो दावा करते थे कि हम इस सृष्टि के रचयिता की ओर से मानवजाति के मार्गदर्शन के लिए चुने गए हैं और हमारा ईश्वरीय कर्तव्य है कि हम लोगों के लोक-परलोक को संवारें। इसके साथ ही यह भी पता चले कि इन लोगों ने अपने इस अभियान के लिए बड़ी कठिनाइयां झेलें और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी बात पर अडिग रहे यहां तक कि इस प्रकार के बहुत से लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा तो फिर स्वाभाविक रूप से मनुष्य के भीतर इस प्रकार के लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की भावना उत्पन्न होगी। वह अवश्य यह जानना चाहेगा कि क्या इन ईश्वरीय दूतों के दावे सही थे और उनके पास ठोस प्रमाण थे? विशेषकर जब उसे यह पता चलेगा कि इन ईश्वरीय दूतों ने मनुष्य के कल्याण व लोक-परलोक में सफलता दिलाने का वचन दिया है और कहा है कि उनका मार्ग न अपनाने की स्थिति में मनुष्य को ऐसा दंड मिलेगा जो कभी भी समाप्त नहीं होगा। अर्थात उनका यह कहना है कि यदि उनकी बात मान ली जाए तो मनुष्य को अत्यधिक लाभ पहुंचेगा और विरोध की स्थिति में बहुत बड़े नुक़सान उठाने पड़ेंगे। इस बात को जान लेने क बाद कोई भी जानकार और समझदार व्यक्ति अपने आपको इन ईश्वरीय दूतों और उनके लाए हुए संदेशों के बारे में अध्ययन व जानकारी इकट्ठा करने से कैसे रोक सकता है?हां यह भी हो सकता है कि कुछ लोग आलस्य के कारण अध्ययन व जानकारी प्राप्त करने का कष्ट न उठाना चाहें या फिर यह सोचकर कि धर्म ग्रहण करने के बाद उन पर कुछ प्रतिबंध लग जाएंगे और उन्हें बहुत से कामों से रोक दिया जाएगा, इस संदर्भ में अध्ययन न करें। किंतु ऐसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि कहीं उनका यह आलस्य उनके लिए सदैव रहने वाले दंड और प्रकोप का कारण न बन जाए। ऐसे लोगों की दशा उस नादान रोगी बच्चे से अधक बुरी है जो कड़वी दवा के डर से डाक्टर के पास जाने से बचता है और अपनी निश्चित मृत्यु की भूमिका प्रशस्त करता है क्योंकि इस प्रकार के बच्चे की बुद्धि पूर्ण रूप से विकसित नहीं होती जिसके कारण वह अपने हितों और ख़तरों को भलीभांति समझ नहीं सकता। डाक्टर के सुझाव का पालन न करने से मनुष्य इस संसार में कुछ दिनों के जीवन से ही वंचित होगा। जानकार मनुष्य जो परलोक में सदैव रहने वाले दंड के बारे में सोचने व चिंतन करने की क्षमता रखता है उसको सांसारिक सुखों और परलोक के दंडों और सुखों की एक दूसरे से तुलना करनी चाहिए। संभव है कि कुछ लोग यह बहाना बनाएं कि किसी समस्या का समाधान खोजना उस समय सही होता है जब मनुष्य को उसके समाधान तक पहुंचने की आशा होती है किंतु हमें धर्म के बारे में चिंतन व अध्ययन से किसी परिणाम की आशा ही नहीं है। इस लिए हम समझते हैं कि ईश्वर ने हमें जो योग्यताएं, क्षमताएं और शक्ति दी है उसे हम उन कामों के लिए प्रयोग करें जिनके परिणाम व प्रतिफल हमें सरलता से मिल जाएं और जिनके परिणामों की हमें अधिक आशा हो। ऐसे लोगों के उत्तर में यही कहना चाहिए कि पहली बात तो यह है कि धर्म संबंधी समस्याओं के समाधान की आशा अन्य विषयों से किसी भी प्रकार कम नहीं है और हमें पता है कि विज्ञान की बहुत सी समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने दसियों वर्षों तक अनथक प्रयास किए हैं। दूसरी बात यह है कि समाधान की आशा के प्रतिशत पर ही नज़र नहीं रखनी चाहिए बल्कि उसके बाद मिलने वाले लाभ की मात्रा को भी दृष्टिगत रखना चाहिए। उदाहरण स्वरूप यदि किसी व्यापार में लाभ प्राप्त होने की आशा पांच प्रतिशत हो और दूसरे किसी व्यापारिक कार्य में लाभ प्राप्त होने की आशा दस प्रतिशत हो किंतु पहले वाले काम में अर्थात जिसमें लाभ मिलने की आशा पांच प्रतिशत हो लाभ की मात्रा एक हज़ार रूपए हो और दूसरे काम में अर्थात जिसमें लाभ प्राप्त होने की आशा दस प्रतिशत है किंतु लाभ की मात्रा सौ रूपए हो तो पहला काम दूसरे काम से दस गुना अधिक लाभदायक होगा। उदाहरण स्वरूप यदि किसी व्यक्ति को दो स्थान बताए जाएं और उससे कहा जाए कि पहले स्थान पर दस ग्राम सोना गड़ा है किंतु इस बात की संभावना कि वहां सोना गड़ा हो पचास प्रतिशत है जबकि दूसरे स्थान पर दस किलोग्राम सोना गड़े होने की संभावना है किंतु सोना गड़ा है कि नहीं इसकी संभावना बीस प्रतिशत है और उस व्यक्ति को एक ही स्थान पर खुदाई करने का अधिकार हो तो बुद्धिमान व्यक्ति वही काम करेगा जिसमें संभावित लाभ अधिक हो क्योंकि निश्चित लाभ किसी स्थान पर भी खुदाई से नहीं है तो फिर खुदाई वहीं करेगा जहां अनुमान सही होने की स्थिति में अधिक लाभ की संभावना है।अब चूंकि धर्म के बारे में अध्ययन और उसमें चिंतन व खोज का संभावित लाभ, किसी भी अन्य क्षेत्र में अध्ययन व खोज से अधिक होगा, भले ही खोज का लाभ प्राप्त होने की संभावना कम हो, क्योंकि किसी भी अन्य क्षेत्र में खोज का लाभ चाहे जितना अधिक हो, सीमित ही होगा परंतु धर्म के बारे में खोज के बाद जो लाभ प्राप्त होगा वह मनुष्य के लिए अनंत व असीमित होगा। तार्किक रूप से धर्म के बारे में खोज न करने का औचित्य केवल उसी दशा में सही हो सकता है जब मनुष्य को धर्म और उससे संबंधित विषयों के ग़लत होने का विश्वास हो जाए। किंतु यह विश्वास भी अध्ययन व खोज के बिना कैसे होगा?चर्चा के सार बिंदु इस प्रकार हैःधर्म की खोज एक स्वाभाविक होने के बावजूद आवश्यक नहीं है कि सारे लोगों में समान रूप से हो क्योंकि अन्य स्वाभाविक भावनाओं की भांति इस इच्छा पर भी वातावरण व घर परिवार का प्रभाव पड़ता है।यदि किसी मनुष्य को इतिहास में कुछ ऐसे लोगों के बारे में ज्ञात हो जो ईश्वरीय दूत होने का दावा करते थे और कहते थे कि उनके लाए हुए धर्म को स्वीकार करने की दशा में दोनों लोकों में सफलताएं मिलेंगी और इंकार की स्थिति में सदैव के लिए नर्क में रहना होगा तो एक बुद्धिमान मनुष्य के लिए आवश्यक है कि उनके बारे में कुछ जानकारियां जुटाए और देखे कि वे लोग क्या कहते थे और अपने कथनों के लिए उनके पास क्या प्रमाण थे? (जारी है)