islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सृष्टि ईश्वर और धर्म 52 : ईश्वरीय दूतों का पापों से दूर रहना

    सृष्टि ईश्वर और धर्म 52 : ईश्वरीय दूतों का पापों से दूर रहना

    Rate this post

    ईश्वरीय दूत ईश्वरीय संदेश प्राप्त करते हैं क्योंकि उनमें कुछ एसी विशेषताएं व क्षमताएं होती हैं जो हर मनुष्य में नहीं हो सकती और यही विशेषताएं व क्षमताएं उन्हें पापों से भी रोकती हैं।

    ग़लती, अपराध व पाप, वास्तव में ज्ञान व जानकारी में कमी के कारण होता है और यदि अपराधी को अपने अपराध की बुराई, परिणाम और प्रभाव का पूर्ण रूप से ज्ञान हो जाए तो वह अपराध नहीं करता। पिछली कुछ कड़ियों में यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि ईश्वरीय दूत पापों से क्यों दूर रहते है इसके साथ यह भी बताया कि उनका पापों से दूर रहना क्यों आवश्यक है किन्तु ईश्वरीय दूतों के पापों से दूर रहने की बात पर कई शंकाएं की जाती हैं जिनमें से कुछ शंकाओं और उनके निवारण का हम वर्णन कर रहे हैं।

    कुछ लोगों का यह कहना है कि यदि ईश्वर ने अपने दूतों को पापों से दूर रखा है और उनकी यह पवित्रता उनके कर्तव्यों के सही रूप से निर्वाह के लिए आवश्यक भी है तो इस स्थिति में अधिकार व चयन व अपनी इच्छा की विशेषता उन में बाकी नहीं रहेगी तो इस दशा में उनके अच्छे कामों ईश्वर उन्हें फल भी नहीं दे सकता क्योंकि यदि उन्होंने अच्छा काम किया है तो इस लिए किया है क्योंकि ईश्वर ने उन्हें पापों से दूर रखा और ईश्वर जिसे भी इस प्रकार से पापों से दूर रखेगा वह अच्छा काम ही करेगा।

    इस शंका का निवारण किसी सीमा तक पिछली कड़ी में हो चुका है जिसका सार यह है कि पवित्र होने का अर्थ विवश होना नहीं है और पापों से दूरी वास्तव में उनकी स्वेच्छा से होती है इस अंतर के साथ कि उन पर ईश्वर की विशेष कृपा होती है किंतु पवित्र लोगों और ईश्वरीय दूतों पर ईश्वर की विशेष कृपा, विशिष्ट लोगों को प्राप्त सुविधाओं की भांति होती है। अतिरिक्त सुविधा, अतिरिक्त दायित्व और अतिरिक्त संवेदनशीलता का कारण होती है।

    हम अपनी इस बात को एक उदाहरण से स्पष्ट करते हैं। एक कंपनी में बहुत से कर्मचारी विभिन्न प्रकार के काम करते हैं और सब का उद्देश्य कंपनी को लाभ पहुंचाना होता है और सब एक निर्धारित समय पर कंपनी में आते और निर्धारित समय पर जाते हैं किंतु यदि हम वेतन और सुविधाओं पर नज़र डालें तो बहुत अधिक अंतर नज़र आता है। उदाहरण स्वरूप गेट पर बैठे हुए दरबान और कपंनी के एक निदेशक को प्राप्त सुविधाओं और वेतन में बहुत अंतर होता है। दरबान कंपनी की रखवाली करता है और निदेशक व्यापारिक मामलों की देखभाल करता है। किंतु क्या दरबान यह कह सकता है कि यदि मुझे भी निदेशक को प्राप्त होने वाला वेतन और सुविधाएं मिल जाएं तो मैं भी व्यापारिक मामले देख सकता हूं कदापि नहीं क्योंकि उसे ज्ञात है कि निदेशक कंपनी के महत्वपूर्ण और व्यापारिक मामले देखता है इस लिए उसे वेतन और सुविधाएं मिली हैं न यह कि चूंकि उसे सुविधा और भारी वेतन मिलता है इस लिए वह व्यापारिक मामले देखने की दक्षता प्राप्त कर लेता है। स्पष्ट है कि उस उसकी दक्षता व शिक्षा व विशेषताओं के कारण निदेशक बनाया गया और व्यापारिक मामलों को देखने का काम सौंपा गया जिसके बाद उसे भारी वेतन और सुविधाएं दी गयीं। इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि ग़लती होने पर जैसा दंड निदेशक को मिलेगा वैसा दरबान को नहीं मिलेगा।

    ठीक यही स्थित ईश्वरीय दूतों की होती है। उनमें विशेष प्रकार की दक्षता व विशेषताएं होती हैं जिसके कारण उन्हें ईश्वरीय दूत बनाया जाता है और चूंकि इतना महत्वपूर्ण काम उन्हें सौंपा जाता है इस लिए उन पर ईश्वर की विशेष कृपा भी होती है जो उसकी पापों से दूर रहने में सहायता करती है। किंतु इस के साथ यह भी स्पष्ट है कि उनके अच्छे कर्म का जिस प्रकार से प्रतिफल अधिक होता है उसी प्रकार उनकी गलतियों का दंड भी साधारण लोगों से अधिक कड़ा होता है जिस से संतुलन स्थापित हो जाता है। यह अलग बात है कि हम यह सिद्ध कर चुके हैं कि विभिन्न कारणों से यह निश्चित है कि ईश्वरीय दूत और ईश्वर के विशेष दास गलती और पाप नहीं करते किंतु बौद्धिक रूप से यह संभव है।

    ईश्वरीय दूत और उसके विशेष दासों की पापों से पवित्रता की बात पर यह भी कुछ लोग कहते हैं कि पैग़म्बरों और इमामों तथा ईश्ववरीय दूतों की प्रार्थनाओं का इतिहास में उल्लेख है और उन्होंने अपनी इन प्रार्थनाओं में स्वंय ही ईश्वर से अपनी पापों को क्षमा कर देने की गुहार की है तो फिर जब वे स्वयं ही अपने पापों को स्वीकार कर रहे हैं तो हम कैसे यह कह सकते हैं कि वे पापों से पवित्र होते हैं।

    इस शंका का उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है कि ईश्वरीय दूत थोड़े बहुत अंतर के साथ आध्यात्म की परिपूर्णता व चरम सीमा पर होते थे और अपने पद की संवेदनशीलता और आध्यात्मिक स्थान के कारण स्वंय को ईश्वर के अधिक निकट समझते थे इस लिए वे आम लोगों के लिए अत्याधिक साधारण ग़लती और धार्मिक दृष्टि से पाप के दायरे में न आने वाले कामों को भी पाप समझते थे इस लिए यदि इस प्रकार का कोई काम कर लेते थे तो ईश्वर से उसके लिए क्षमा मांगते थे।

    हम एक उदाहरण से अपनी बात अधिक स्पष्ट करना चाहेंगे आप। किसी देश के अत्यन्त सम्मानीय बुद्धिजीवी या उदाहरण स्वरूप प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की कल्पना करें जो एक सड़क पर ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगाता हुआ अपने मित्रों के साथ चल रहा हो कभी कभी मज़ाक में दो चार धौल भी अपने मित्र को लगा देता हो। आप की दृष्टि में यह काम क्या है?

    निश्चित रूप से आप कहेंगे कि उसे एसा नहीं करना चाहिए अब बाद में वह बुद्धिजीवी या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति टीवी पर आकर लोगों से क्षमा मांगे और यह कहे कि मुझ से गलती हो गयी आशा है कि जनता मुझे माफ करेगी तो क्या पुलिस उसके इस स्वीकारोक्ति कारण गिरफतार कर सकती है और यह कह सकती है कि उसने स्वंय अपनी गलती मानी है? या यह कि उसने अपने पद की मर्यादा नहीं रखी जबकि उसने शपथ ग्रहण की थी? कदापि नहीं । क्योंकि उसने जो काम किया है वह ग़लती है किंतु एसी गलती नहीं है जो गैर क़ानूनी काम हो या उसने जो शपथ ग्रहण की थी उसके विपरीत हो बल्कि उसका काम, स्वंय उसकी विशेषताओं के कारण , गलत था किंतु गलत होने के बावजूद न तो अपराध के दायरे में आता है और न ही पद की मर्यादा तोड़ना है।

    ठीक यही दशा ईश्वरीय दूतों की है बहुत से ऐसे काम हैं जो उन की अपनी विशेषताओं व स्थान के कारण स्वंय उनकी दृष्टि में उचित नहीं होते और वे उस काम को अपने लिए गलत समझते हैं इस लिए यदि इस प्रकार का कोई काम कर लेते हैं तो उसके लिए भी ईश्वर से क्षमा मांगते हैं किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने जो अपनी गलती या पाप के लिए ईश्वर से क्षमा मांगी है वह गलती और पाप वास्तव में धार्मिक रूप से भी पाप था क्योंकि हर पाप ग़लती है किंतु हर ग़लती पाप नहीं जैसे हर साधारण व्यक्ति के लिए हर अपराध गलती है किंतु हर गलती अपराध नहीं।

    इसके अतिरिक्त यह भी कहा जा सकता है कि ईश्वरीय दूतों का कर्तव्य मनुष्य का मार्गदर्शन था और मानव जाति का मार्गदर्शन करने की ज़िम्मेदारी, मानव जीवन के सभी आयामों के लिए एक सर्वव्यापी कर्तव्य था। यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों ने हर दृष्टि से मानव जाति का मार्गदर्शन किया तो फिर यह कैसे हो सकता था कि प्रार्थना जैसे विषय में जिसपर ईश्वर ने भी अत्याधिक बल दिया है वह मनुष्य का मार्गदर्शन न करते। इसी लिए उन्होंने साधारण मनुष्य द्वारा की जाने वाली प्रार्थना के व्यवहारिक नमूना पेश करने के लिए भी इस प्रकार की प्रार्थनाएं करके मनुष्य को व्यवहारिक रूप से यह सिखाना चाहा है कि ईश्वर से अपने पापों को क्षमा करने की प्रार्थना किस प्रकार की जाए।

    आज की कड़ी के मुख्य बिन्दु

    • ईश्वरीय दूत ईश्वर की विशेष कृपा के कारण पापों से अपनी स्वेच्छा से दूर रहते हैं और ईश्वर की विशेष कृपा के कारण उन पर विशेष प्रकार की ज़िम्मेदारियां भी होती हैं • ईश्वरीय दूतों द्वारा अपनी प्रार्थनाओं में ईश्वर से पापों को क्षमा करने की बात का यह अर्थ नहीं होता कि उन्होंने स्वंय पाप करनी बात स्वीकार की है बल्कि उनके निकट पाप की परिभाषा साधारण मनुष्य की तुलना में अधिक विस्तृत होती है। • ईश्वरीय दूतों ने मनुष्य के मार्गदर्शन और उसके सामने व्यवहारिक उदाहरण पेश करने के लिए भी साधारण मनुष्य की भांति प्रार्थनाएं की हैं। (जारी है)