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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 53 : सच्चे ईश्वरीय दूतों की सत्यता और झूठे दावे करने वालों के झूठ को सिद्ध करना

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    इस कड़ी में इस बात का उल्लेख है कि सच्चे ईश्वरीय दूतों की सत्यता और झूठे दावे करने वालों के झूठ को किस प्रकार सिद्ध किया जा सकता है? क्योंकि इतिहास में ऐसे बहुत से लोगों का वर्णन है जिन्होंने यह दावा किया है कि वे ईश्वरीय दूत हैं इस प्रकार के दावों के दृष्टिगत यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन प्रमाणों और साधनों पर चर्चा करें जिनके द्वारा किसी के ईश्वरीय दूत होने के दावे की सच्चाई को परखा जा सकता है। क्योंकि हर दावे के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है और यह एक बौद्धिक विषय है इस लिए यह नहीं सोचा जा सकता कि ईश्वर ने अपने दूतों को बिना प्रमाण के ही धरती पर भेज दिया।

    ईश्वरीय दूत होने का दावा यदि कोई ऐसा व्यक्ति करे जो पाप करता हो तो उसका झूठ स्पष्ट होता है क्योंकि हम यह सिद्ध कर चुके हैं ईश्वरीय दूत पाप नहीं करता। इसी प्रकार यदि किसी ईश्वरीय दूत ने अपने बाद के ईश्वरीय दूत का परिचय करा दिया हो तो उसे ईश्वरीय दूत मानने में कोई बाधा नहीं होती किंतु समस्या उस समय होती है जब लोगों के पास ईश्वरीय दूत को पहचानने के लिए कोई विश्वस्त जानकारी न हो और पहले वाले ईश्वरीय दूत ने भी अपने बाद के ईश्वरीय दूत को परिचित न कराया हो। ऐसी स्थिति में ईश्वरीय दूत को पहचानना कठिन होता है क्योंकि इस स्थिति में पापों से दूर रहने वाली विशेषता भी प्रभावी नहीं होती क्योंकि पापों से दूर बहुत से लोग होते हैं किंतु पापों से दूर इन लोगों में कौन सचमुच पापों से दूर है और सही अर्थों में पापों से दूर इन लोगों में कौन ईश्वरीय दूत है इसका ज्ञान साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं है।

    इस स्थिति में ईश्वरीय दूत को पहचानने के लिए किसी अन्य साधन की भी आवश्यकता होती है और यही कारण है कि ईश्वर ने अपने असीम ज्ञान द्वारा इस स्थिति के लिए भी मनुष्य को ईश्वरीय दूतों का पहचानने का साधन दिया है और वह साधन है चमत्कार जिसे अरबी भाषा में मोजिज़ा कहा जाता है।

    इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि सच्चे ईश्वरीय दूतों को पहचानने के मुख्य रूप से तीन मार्ग हैं। पहला मार्ग तो यह है कि कोई अपनी जानकारी और ज्ञान व पहचान के आधार पर किसी के ईश्वरीय दूत होने का विश्वास कर ले किंतु इसमें समस्या यह है कि इसके लिए आवश्यक है कि वह ईश्वरीय दूत आरंभ से लेकर अंत तक उसके सामने रहा हो अर्थात उसी समाज में जीवन व्यतीत करता हो और उसके सभी कर्मों का लोगों को ज्ञान हो और लोग उसकी भलाईयों, सत्यवाद और उच्च चारित्रिक विशेषताओं से भली भांति अवगत हों किंतु इसके बावजूद यदि किसी को युवास्था में ही ईश्वरीय दूत का पद मिल जाए तो उसकी पूरी आयु के बारे में कौन विश्वास कर सकता है कि वह अपने जीवन के बचे हुए वर्षों में कोई बुराई नहीं करेगा ? इस लिए पैग़म्बर और ईश्वरीय दूत को पहचानने का यह साधन अत्यन्त कमज़ोर और अधिकांश अवसरों पर उपयोगिताहीन होता है।

    ईश्वरीय दूतों को पहचानने का एक अन्य मार्ग यह है कि पहले वाले ईश्वरीय दूत ने आगामी ईश्वरीय दूत का परिचय करा दिया हो और स्पष्ट रूप से बता दिया हो उसके बाद अमुक व्यक्ति ईश्वरीय दूत है किंतु इस मार्ग की यह समस्या है कि इसके लिए यह आवश्यक है कि लोग पहले वाले दूत से परिचित हों अर्थात यह मार्ग उसी समाज के लिए उपयोगी हो सकता है जिसमें पहले भी ईश्वरीय दूत रहा हो किंतु यदि किसी समाज में पहली बार कोई ईश्वरीय दूत बनाया जाए तो उसकी सत्यता सिद्ध करने के लिए यह मार्ग उपयोगी नहीं होगा।

    तीसरा और सब से अधिक व्यापक व उपयोगी मार्ग चमत्कार का मार्ग है जिसके द्वारा किसी भी समाज में ईश्वरीय दूत अपनी सत्यता सिद्ध कर सकता है। किंतु वह चमत्कार जिससे किसी के ईश्वरीय दूत होने को सिद्ध किया जा सके कैसा हो? चमत्कार या मोजिज़ा उस काम को कहते हैं जो ईश्वर के आदेश से उसके दूतों की सत्यता को असाधारण रूप से सिद्ध करता हो। यदि ध्यान दिया जाए तो इस परिभाषा के तीन भाग हैं। पहले भाग में यह कहा गया है कि कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो सामान्य व प्रचलित कारकों का परिणाम नहीं होती बल्कि उन घटनाओं के कारक मनुष्य के लिए अज्ञात होते हैं।

    इस परिभाषा के दूसरे भाग के अनुसार इस प्रकार के असाधारण कार्य ईश्वर के इरादे और उसकी विशेष अनुमति के बाद ईश्वरीय दूतों द्वारा किये जाते हैं विशेष अनुमति इस लिए क्योंकि ईश्वर ने जो व्यवस्था इस सृष्टि के लिए बनायी है उसमें परिवर्तन ईश्वर के विशेष आदेश व अनुमति से हीं संभव है। उदारहण स्वरूप कारक व परिणाम के नियम के अनुसार यदि जलती हुई आग में उदाहरण स्वरूप पत्ता डाला जाएगा और पत्ते के जलने के लिए आवश्यक सारी परिस्थितियां भी होंगी तो पत्ता अवश्य जलेगा किंतु यदि सारी परिस्थितियों और शर्तों के पूरा होने के बावजूद वह पत्ता न जले अर्थात पत्ता न जलने का कोई भौतिक कारण न हो तो फिर इसे असाधारण काम कहा जाएगा किंतु इसके बावजूद चमत्कार की परिभाषा का तीसरा भाग, उसे चमत्कार कहे जाने के लिए आवश्यक है अर्थात इस प्रकार के असाधारण काम यदि ईश्वरीय दूत के कथन को सही सिद्ध करने की क्षमता रखते होंगे तभी उन्हें मोजिज़ा या चमत्कार का नाम दिया जा सकता है अन्यथा वह साधारण चमत्कार होगा वह चमत्कार नहीं होगा जिस पर हम यहां चर्चा कर रहे हैं।

    वह चमत्कार जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं स्पष्ट है कि साधारण चमत्कार के भिन्न होता है और उसकी अपनी विशेष शर्ते होती हैं जिन के बाद ही उसे ईश्वरीय चमत्कार कहा जा सकता है। इस विषय पर हमारी चर्चा जारी रहेगी जिसके दौरान हम ईश्वरीय चमत्कार के विभिन्न आयामों पर व्यापक चर्चा करेगें किंतु फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः

    1. यदि ईश्वरीय दूत होने का दावा करने वाला पाप करता हो तो उसके झूठ का पता लगाना अत्यधिक सरल होता है किंतु यदि वह पाप न करता हो तो फिर उसकी सत्यता का पता लगाना कठिन होगा।

    2. ईश्वरीय दूतों की सत्यता का पता लगाने का सब से व्यापक और उपयोगी मार्ग वह चमत्कार होता है जो ईश्वर उन्हें अपना दावा सिद्ध करने के लिए प्रदान करता है किंतु इस चमत्कार की भी अपनी शर्तें होती हैं और इसी लिए हर असाधारण कार्य को वह चमत्कार नहीं समझा जा सकता जिससे किसी का ईश्वरीय दूत होना सिद्ध होता हो। (जारी है)