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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 57

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    ईश्वरीय दूत भी एक मनुष्य होता था और उसकी सभी शारीरिक विशेषताएं मनुष्य की ही होती थी इसलिए उसकी आयु सीमित होती थी। ईश्वर इस सृष्टि की स्वाभाविक प्रक्रिया को बिना किसी बहुत बड़े और असाधारण कारण के बदलता नहीं है।

    विभिन्न युगों और परिस्थितियों में मानव समाज और मानव जीवन समान नहीं होता इसलिए परिस्थितियों के अनुसार इस उद्देश्य की प्राप्ति के साधनों अर्थात धर्म की शिक्षाओं में परिवर्तन स्वाभाविक है।समस्त ईश्वरीय धर्मों की मूल शिक्षाओं में कोई अंतर नहीं है और इस प्रकार के सभी धर्मों में सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियम मूल रूप से एक ही थे। यदि ईश्वरीय दूत की शिक्षाएं अपने मूल रूप व ढांचे के साथ सुरक्षित रहें तो फिर किसी नये ईश्वरीय दूत या नये धर्म की आवश्यकता नहीं होती है।

    चर्चा में हम इतिहास की दृष्टि से ईश्वरीय दूतों और समाज के लोगों के मध्य संबंधों की शैली पर प्रकाश डालेंगे। यद्यपि इस विषय पर धर्म पर विश्वास से कोई विशेष संबंध नहीं है किंतु ईश्वरीय दूतों की भूमिका के महत्व को देखते हुए इस विषय पर संक्षिप्त चर्चा लाभदायक होगी।

    जब ईश्वरीय दूत, अपना आंदोलन आरंभ करते थे और लोगों को एक ईश्वर की उपासना की ओर बुलाते थे तो चूंकि उनकी बात स्वीकार करने का अर्थ यह होता था कि लोग अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों को छोड़ दें इसलिए लोग उनका और उनकी कही हुई बातों का विरोध करते थे। और इस विरोध में सब से आगे वह लोग होते थे जिनका समाज में प्रभाव होता था क्योंकि उस समाज की परंपराएं और रीति रिवाजों द्वारा ही उनका प्रभाव समाज पर होता था इस लिए वे इन परंपराओं को समाप्त किये जाने के हर प्रकार के प्रयास को, समाज पर अपनी पकड़ बनाए रखने और अपने प्रभाव के लिए ख़तरा समझते थे। यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों की जीवनी पर यदि दृष्टि डाली जाए तो हम देखेंगे कि उन्हें सब से अधिक, समाज के प्रभावी लोगों और शासकों के विरोध का सामना रहा है।

    समाज के प्रभावी लोग, लोगों को ईश्वरीय दूतों के विरुद्ध भड़काते थे क्योंकि उनकी सत्ता ख़तरे में होती थी किंतु इसके बावजूद धीरे धीरे समाज का शोषित वर्ग, ईश्वरीय दूतों की ओर आकृष्ट होने लगता और फिर ईश्वरीय दूत का संदेश उनके मध्य सार्वाजनिक हो जाता। अब वे यदि शक्तिशाली हो गये तो फिर नये समाज का गठन करने में भी सफल हो जाते थे।

    यह ऐसी स्वाभाविक प्रक्रिया है जो इतिहास में बार बार दोहरायी गयी है और सदैव ही ईश्वरीय दूतों के संदेश को समाज के शोषित वर्ग ने ही आरंभ में समझा और उसे अपनाया किंतु कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि बहुत से भ्रष्ट शासक भी, ईश्वरीय दूत के संदेश को अर्थात उसके द्वारा लाए गये धर्म को, समाज पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाने के एक साधन के रूप में देख कर उसे स्वीकार करते हैं किंतु ऐसा बहुत कम ही हुआ है कि समाज के शक्तिशाली व प्रभावी लोग, ईश्वरीय दूतों की सत्यता से प्रभावित होकर उसका संदेश स्वीकार कर लें। जहां तक धर्म को प्रभाव बनाने के लिए प्रयोग करने की बात है तो यह प्रक्रिया आज तक जारी है।

    यदि एतिहासिक तथ्यों पर ध्यान दिया जाए तो हम देखेंगे कि हर समाज में ईश्वरीय दूतों का विरोध विभिन्न कारणों से होता था। कुछ लोग तो ईश्वरीय दूतों का विरोध इसलिए करते थे क्योंकि ईश्वरीय दूत कामनाओं व इच्छाओं की निरंकुशता पर अंकुश लगाने का प्रयास करते थे। ईश्वरीय दूत निश्छलता के विरोधी थे और अश्लीलता व निरंकुश यौनसंबंधों का मुखर विरोध करते थे इसीलिए इन वस्तुओं में रूचि रखने वाले, इस प्रकार के सुखभोगों से वंचित होने के भय से ईश्वरीय दूतों का विरोध किया करते थे।

    इसके अतिरिक्त समाज के कुछ प्रभावी लोग, अपने घमंड व अहंकार के कारण भी ईश्वरीय दूतों का विरोध करते थे क्योंकि उन्हें यह लगता था कि समाज की बागडोर उनके हाथ में है और लोगों का भला-बुरा सोचने का अधिकार उन्हीं का है इसलिए यदि कोई दूसरा व्यक्ति सामने आकर यह कहता था कि वह ईश्वरीय दूत है और समाज को कल्याण दिलाना चाहता है तो वे उसका विरोध करते थे। उनको ऐसा लगता था कि ईश्वरीय दूत उनके कामों में हस्तक्षेप कर रहा है।

    इन्हीं प्रभावी लोगों में कुछ ऐसे लोग भी होते थे जो अपने पद व स्थान व भूमिका की रक्षा के कारण ईश्वरीय दूतों का विरोध करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यदि उन्होंने ईश्वरीय दूत के संदेश को स्वीकार कर लिया तो उन्हें अपने पद व स्थान को गंवाना पड़ेगा इसके साथ ही समाज के शोषण से उन्हें जो लाभ मिलता है वह भी नहीं मिलेगा।

    ईश्वरीय दूतों के विरोध का एक कारण, आम लोगों की अज्ञानता व अशिक्षा भी होता था। अज्ञानी व अशिक्षित लोग, चूंकि जानकारी नहीं रखते थे इसलिए वे समाज में अगुवा और प्रभावी लोगों की बात मान लेते थे जो अपने स्वार्थों के कारण ईश्वरीय दूतों का विरोध करते थे और उनकी बात मानते हुए समाज के अज्ञानी लोग भी ईश्वरीय दूतों का विरोध करते क्योंकि उन्हें लगता था कि वे जिन चीज़ों पर विश्वास रखते हैं वही उनके कल्याण का कारण है इसलिए जब ईश्वरीय दूत, उन्हें अन्य बातों की ओर बुलाता तो उन्हें लगता कि वह उन्हें उनके कल्याण से दूर करने का प्रयास कर रहा है इसलिए वे ईश्वरीय दूतों का विरोध करते।

    इस प्रकार के विरोधी ईश्वरीय दूत के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने के लिए कई शैलियां अपनाते थे जिनमें से कुछ का हम वर्णन कर रहे हैं।

    कुछ लोग, ईश्वरीय दूतों का अपमान करके या उनकी बातों का उपहास करके उनके संदेश का प्रभाव कम करने का प्रयास करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि इस प्रकार, लोगों के मन में उनके प्रति सम्मान को कम किया जा सकता है।

    इसी प्रकार कुछ लोग ईश्वरीय दूत पर विभिन्न प्रकार के आरोप लगाते जैसे कुछ लोग कहते कि वह पागल हो गया है ताकि लोग उसे पागल समझ कर उसकी बातों को महत्व न दें किंतु जब कोई ईश्वरीय दूत अपनी सत्यता सिद्ध करने के लिए चमत्कार दिखाता तो उसे जादूगर कह कर लोगों को उसके विरुद्ध भड़काया जाता था और उसकी बातों को क़िस्से कहानियों की संज्ञा दी जाती।

    इसी प्रकार कुछ लोग निराधार तर्कों द्वारा ईश्वरीय दूत की बातों को गलत सिद्ध करने का प्रयास करते थे जैसे कुछ लोग यह कहते थे कि यदि ईश्वर को मानव समाज के लिए कोई अपना दूत भेजना ही था तो उसने फरिश्ते को अपना दूत क्यों नहीं बनाया? क्यों एक मनुष्य को अपने दूत के रूप में चुना? बहुत से लोग यह कहते थे कि यदि ईश्वरीय दूत के पास ईश्वरीय संदेश आता है तो फिर हमारे पास भी आए ताकि हमें उसकी बातों पर विश्वास हो सके।

    बहुत से लोग ईश्वरीय दूतों को धमकी या प्रलोभन द्वारा अपने अभियान को छोड़ने पर तैयार करने का प्रयास करते थे। अर्थात उनसे कहा जाता कि यदि तुम लोगों को अपने धर्म की ओर बुलाने छोड़ दो तो तुम्हें अमुक पद दे दिया जाएगा या इतना धन दिया जाएगा या फिर उन्हें यातना और देश निकाला दिये जाने की धमकी दी जाती।

    इसी प्रकार जब विरोधियों की बातें ईश्वरीय दूत स्वीकार नहीं करता तो बहुत से विरोधी ऐसे होते थे जो ईश्वरीय दूतों की हत्या तक कर डालते थे इसीलिए इतिहास में ऐसे बहुत से ईश्वरीय दूतों का वर्णन है जिन्हें उनके विरोधियों ने मार डाला।

    हमारी इस चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार थेः

    समाज के लोग विभिन्न कारणों से ईश्वरीय दूतों और उनके संदेशों का विरोध करते थे जिनमें मुख्य रूप से अंधविश्वास,अज्ञानता, प्रभाव बनाये रखने के प्रयास, अंहकार तथा मनुष्य में निरंकुशता से प्रति लगाव का वर्णन किया जा सकता है।

    ईश्वरीय दूतों के विरोध की विभिन्न शैलियां रही हैं। कुछ लोग उपहास करते थे कुछ लोभ व धमकी का सहारा लेते किंतु कुछ लोग हिंसा पर उतर आते और उनकी हत्या कर देते थे।