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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 59

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    ईश्वरीय दूतों के काल पर हम यदि दृष्टि डालें तो यह पता चलता है कि ईश्वर ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं जिनमें लोगों को यह लगा कि उन्हें ईश्वर और उसके दूतों की आवश्यकता है।

    कभी-कभी लोग अज्ञानता और इस सोच के कारण कि उन्हें ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है, धर्म और ईश्वर का इन्कार करते हैं जिसके बाद ईश्वर उन्हें सचेत करने के लिए समस्याएं व कठिनाइयां उत्पन्न करता है किंतु चूंकि उसका उद्देश्य मनुष्य का कल्याण होता है इसलिए यह भी उसकी कृपा का ही भाग है।

    ईश्वरीय दूतों ने मनुष्य को ईश्वरीय मार्ग दिखाने और उन्हें कल्याण तक पहुंचाने के लिए सभी उपलब्ध व ईश्वरीय मार्गों का प्रयोग किया है और इसके लिए उन्होंने, यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो सत्ता का प्रयोग भी किया है और वे असत्य के विरुद्ध तलवार से भी युद्ध लड़े हैं।

    पिछले कुछ कार्यक्रमों में हमने ईश्वरीय दूतों, उनके अभियान, उनकी शैली और समाज से और समाज के उनके साथ व्यवहार के बारे में चर्चा की थी अगली कुछ चर्चाओं में हम अंतिम ईश्वरीय दूत, हज़रत मोहम्मद के बारे में चर्चा करेंगे। और इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करेंगे कि यदि मुसलमान हज़रत ईसा और हज़रत मूसा तथा अन्य ईश्वरीय दूतों को ईश्वरीय दूत मानते हैं तो फिर उनके बाद अंतिम ईश्वरीय दूत के रूप में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की क्या आवश्यकता थी जबकि पैग़म्बरे इस्लाम ने जब अपना अभियान आरंभ किया और इस्लाम धर्म का प्रचार किया तो उस समय, हज़रत ईसा का धर्म अर्थात ईसाइय और हज़रत मूसा का धर्म अर्थात यहूदियत मौजूद थी।

    दसियों हज़ार पैग़म्बरों ने विभिन्न कालों में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में ईश्वरीय संदेश लोगों तक पहुंचाए तथा लोगों के मार्गदर्शन के अपने अतिमहत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह किया और कुछ दूत, अपनी शिक्षाओं के आधार पर नए समाज के गठन में भी सफल हुए इनमें से हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा अलैहेमुस्सलाम को ईश्वर ने व्यक्तिगत, समाजिक व धार्मिक नियमों पर आधारित ग्रंथ दिये किंतु यह ग्रंथ उनके ही युगों के लिए उचित थे किंतु समय बीतने के साथ ही यह ग्रंथ या तो पूर्ण रूप से नष्ट हो गये या उनमें व्यापक रूप से फैर बदल कर दिया गया और आज हज़रत ईसा द्वारा लाए गये पवित्र ग्रंथ इंजील या बाइबल का अस्तित्व नहीं है बल्कि उनके अनुयायी कहे जाने वालों के हाथों से लिखे हुए कुछ पृष्ठों को जोड़कर उसे हज़रत ईसा के पवित्र ग्रंथ का नाम दे दिया गया है। यही हाल हज़रत मूसा के लाये हुए ग्रंथ तौरैत का है।उदाहरण स्वरूप वर्तमान इंजील जिसे बाइबल कहा जाता है यदि उस पर बिना किसी भेदभाव के केवल वास्तविकता की खोज के लिए दृष्टि डाली जाए तो बड़ी सरलता से यह समझा जा सकता है कि इस ग्रंथ में फेर बदल किया गया है। यहूदी धर्म को यद्यपि ईश्वरीय धर्म समझा जाता है किंतु जिस ग्रंथ को वे हज़रत मूसा द्वारा लाया हुआ बताते हैं उसमें ईश्वर के बारे में ऐसी बातें हैं जो न केवल यह कि बुद्धि के लिए स्वीकारीय नहीं हैं बल्कि स्वंय ईश्वर के गुणों से भी वह बातें मेल नहीं खातीं।

    इस ग्रंथ में ईश्वर को एक साधारण मनुष्य की भांति बताया गया है और यह भी कहा गया है कि उसे बहुत सी बातों का ज्ञान ही नहीं है और वह बार बार अपने कामों पर पछताता है और अपने एक दास अर्थात ईश्वरीय दूत हज़रत याक़ूब से कुश्ती लड़ता है किंतु उनसे जीत नहीं पाता और अन्ततः उनसे अनुरोध करता है कि वे उसका पीछा छोड़ दें ताकि उसे ईश्वर समझने वाले लोग उसे इस दशा में न देखें।

    इसके साथ ही इस ग्रंथ में ईश्वरीय दूतों पर आलोचनीय आरोप भी लगाए गये हैं जैसा कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पर जिन्हें वे डेविड कहते हैं विवाहित महिला से अवैध संबंध जोड़ने, हज़रत लूत अलैहिस्सलाम पर निकट संबंधियों से शारीरिक संबंध बनाने और शराब पीने जैसे आरोप लगाए गये हैं।

    किंतु जहां तक इंजील या बाइबल का संबंध है तो उसकी दशा और भी ख़राब है पहली बात तो यह है कि स्वंय ईसाई भी इस बात का दावा नहीं करते कि उनके पास मौजूद ग्रंथ वही है जो हज़रत ईसा लाए थे बल्कि स्पष्ट रूप से उसमें उनके बहुत से अनुयाईयों और मार्गदर्शकों के कथनों का वर्णन भी किया गया है तथा उसमें शराब पीने के सुझाव और उसे बनाने की विधि को हज़रत ईसा का मोजिज़ा बताया गया है। वास्तव में ईश्वर किस प्रकार मनुष्य की भांति हो सकता है? और किस प्रकार से यह संभव है कि उसे कुछ बातों का ज्ञान न हो? या फिर यह कि वह किसी मनुष्य से, चाहे वह ईश्वरीय दूत ही क्यों न हो आकर कुश्ती लड़े? और फिर उस कुश्ती में हार भी जाए? हम अपनी आरंभिक चर्चाओं में तार्किक प्रमाणों से यह सिद्ध कर चुके हैं कि ईश्वर का आकार या उसकी कोई सीमा नहीं है न ही वह पदार्थ है और न ही वह भौतिकता में आ सकता है और न ही उसकी कल्पना की जा सकती है और न ही उसे मनुष्य की किसी भी विशेषता का स्वामी समझा जा सकता है। अज्ञानता व विवशता उसे छू कर भी नहीं गुज़री है और यदि ईश्वर ही अज्ञान होगा यदि ईश्वर की कमज़ोर होगा तो फिर उसमें और मनुष्य में क्या अंतर रह जाएगा? इन सब विषयों पर हम विस्तार से चर्चा कर चुके हैं इसलिए इसे यहां दोहरान उचित नहीं होगा किंतु यह तो निश्चित है कि जिस कथन या पुस्तक में ऐसी बातों का वर्णन होगा जिससे ईश्वर का साकार होना, अज्ञानी होना या अक्षम होना सिद्ध होता हो तो निश्चित रूप से वह ईश्वर की ओर से नहीं होगी।

    वास्तव में एक के बाद एक ईश्वरीय दूत और धर्म की आवश्यकता ही इसलिए पड़ती थी क्योंकि प्रायः ईश्वरीय दूतों के अनुयाई उनके बाद उनकी शिक्षाओं में अपनी इच्छा व हितों के अनुसार फेर-बदल कर लेते थे और यह प्रक्रिया जब लंबी हो जाती थी तो फिर एक चरण ऐसा भी आता था कि उस ईश्वरीय दूत की शिक्षाएं कही जाने वाली बातों या उसका ग्रंथ कही जाने वाली किताब में उस दूत का कोई विचार या बात सिरे से होती ही नहीं थी।

    हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद पांच सौ वर्षो के अंतराल में समाज की यही दशा हो चुकी थी। यही कारण था कि छठी ईसवी शताब्दी में जब अरब जगत पर अज्ञानता का अंधकार छा चुका था ईश्वर ने मानवजाति को इस अंधकार से सदैव के लिए निकालने हेतु मार्गदर्शन के मशाल के स्थान पर मार्गदर्शन का सूर्योदय किया।

    छठी ईसवी में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का जन्म तो एक ऐतिहासिक तथ्य है ही उनकी शिक्षाएं भी पूरब व पश्चिमी इतिहासकारों द्वारा प्रमाणित तथ्य के रूप में मौजूद हैं और छठी ईसवी के बाद हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का जीवन और उनकी शिक्षा, इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों के लिए अध्ययन का एक रोचक विषय रहा है इसीलिए इस विषय पर पूरब व पश्चिम के शोधकर्ताओं ने व्यापक शोध किये और हज़ारों किताबें लिखीं।

    अन्य ईश्वरीय दूतों की भांति हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को भी अपनी सत्यता सिद्ध करने के लिए मोजिज़ा प्रदान किया गया इसके अतिरिक्त भी ऐतिहासिक तथ्यों से उनकी सत्यता सिद्ध होती है जिसपर हम अपने अगले कुछ कार्यक्रमों में चर्चा करेंगें। फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिंदुः • दसियों हज़ार पैग़म्बरों ने विभिन्न कालों में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में ईश्वरीय संदेश लोगों तक पहुंचाया तथा लोगों के मार्गदर्शन के अपने अतिमहत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह किया और कुछ दूत, अपनी शिक्षाओं के आधार पर नए समाज के गठन में भी सफल हुए।

    • पिछले ईश्वरीय दूतों द्वारा लाए गए ग्रंथ उनके ही युगों के लिए उचित थे क्योंकि समय बीतने के साथ ही यह ग्रंथ या तो पूर्ण रूप से नष्ट हो गए या उनमें व्यापक रूप से फेर-बदल कर दिया गया।

    • छठी ईसवी शताब्दी में जब अरब जगत पर अज्ञानता का अंधकार छा चुका था ईश्वर ने मानवजाति को इस अंधकार से सदैव के लिए निकालने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को भेजा और छठी ईसवी शताब्दी में उनका जन्म हुआ।