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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-60

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    दसियों हज़ार पैग़म्बरों ने विभिन्न कालों में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में ईश्वरीय संदेश लोगों तक पहुंचाया तथा लोगों के मार्गदर्शन के अपने अतिमहत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह किया और कुछ दूत, अपनी शिक्षाओं के आधार पर नये समाज के गठन में भी सफल हुए

    पिछले ईश्वरीय दूतों द्वारा लाए गये ग्रंथ उनके ही युगों के लिए उचित थे क्योंकि समय बीतने के साथ ही यह ग्रंथ या तो पूर्ण रूप से नष्ट हो गये या उनमें व्यापक रूप से फेर बदल कर दिया गया।

    छठी ईसवी शताब्दी में जब अरब जगत पर अज्ञानता का अंधकार छा चुका था ईश्वर ने मानवजाति को इस अंधकार से सदैव के लिए निकालने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को भेजा और छठी ईसवी शताब्दी में उनका जन्म हुआ।

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम जिन्हें मुसलमान अंतिम ईश्वरीय दूत मानते हैं सदैव ही इतिहासकारों की दृष्टि में एक सम्मानीय व्यक्ति रहे हैं यदि हालिया कुछ वर्षों के दौरान कुछ पश्चिमी देशों के षडयन्त्रों को छोड़ दिया जाए तो स्वंय पश्चिमी इतिहासकारों ने भी उन्हें यद्यपि ईश्वरीय दूत के रूप में स्वीकार नहीं किया है किंतु इसके बावजूद इतिहास के एक महापुरुष और महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में याद किया है किंतु हम यहां पर अपनी चर्चा में यह स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे कि मुसलमान हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को किस रूप में मानते हैं और उन्हें किस रूप में देखते हैं।

    इस से पूर्व की चर्चा में हमने बताया था कि पैग़म्बरों की सत्यता को तीन मार्गों से सिद्ध किया जा सकता है एक यह कि जिन लोगों के मध्य उसे भेजा गया हो वह पहले से ही उसे जानते हों और उसे एक सत्यप्रेमी व सही व्यक्ति के रूप में स्वीकार करते हों तथा पहले से ही कुछ चिन्ह लोगों के सामने स्पष्ट हों। दूसरा मार्ग यह है कि पहले के किसी ईश्वरीय दूत ने उसके बारे में भविष्यवाणी की हो और तीसरा मार्ग मोजिज़ा व चमत्कार है।

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का ईश्वरीय दूत होना इन तीनों मार्गों से सिद्ध होता है। वे मक्कावासियों के मध्य चालीस वर्षों से रह रहे थे और इस दौरान मक्का नगर के लोगों ने उन्हें निकट से देखा था और उन्हें उनके आचरण व चरित्र में किसी भी प्रकार की कोई कमी नज़र नहीं आयी थी। इसी लिए हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को उनकी पैग़म्बरी की घोषणा से पूर्व ही अमीन अर्थात अमानतदार और सादिक अर्थात सच्चा कहा जाता था। इसी लिए जब उन्होंने कहा कि मैं ईश्वर का दूत हूं और तुम लोगों के कल्याण के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगा तो मक्कावासियों के लिए यह सोचना कठिन था कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम चालीस वर्षों तक सच बोलने के बाद अचानक झूठ बोलने लगे।

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की जीवनी यदि देखी जाए तो उन्होंने चालीस वर्ष के बाद इस बात की घोषणा की कि वे ईश्वरीय दूत हैं इस से पूर्व वे अरब वासियों के मध्य रहे और इतने सम्मानीय रूप से रहे कि लोग उन्हें अपनी पंचायतों में फैसले के लिए बुलाते और वे जो कह देते थे उसे सच मानते थे क्योंकि चालीस वर्षों के दौरान उनके लिए यह सिद्ध हो चुका था कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम कभी झूठ नहीं बोलते।

    यही कारण है कि जब हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने अपनी पैग़म्बरी की घोषणा का इरादा किया और इस संदर्भ में ईश्वरीय आदेश का पालन करना चाहो तो उस से पूर्व अपने परिजनों को एकत्रित करके उनसे पूछा कि यदि मैं तुम लोगों से यह कहूं कि उस पहाड़ के पीछे शत्रु घात लगाए बैठा है और किसी भी समय तुम पर आक्रमण कर सकता है तो क्या तुम मेरी बात पर विश्वास करोगे? तो लोगों ने एक आवाज़ होकर कहा कि क्यों नहीं, आपने कभी झूठ नहीं बोला है।

    पैग़म्बरे इस्लाम ने पहले अपने व्यवहार से अपनी सत्यता का लोहा मनवाया, संसारिक वस्तुओं में अपनी अरुचि सिद्ध की, और उनके व्यवहार व जीने के ढंग से लोगों में यह विश्वास आम हुआ कि उन्हें संसारिक पद व स्थिति का कोई लोभ नहीं है। इसका मुख्य कारण तो यह था कि जब वे पैग़म्बरी की घोषणा करें तो कोई उन पर यह आरोप न लगा सके कि उन्हों ने संसार व सत्ता प्रेम में एसा किया है बल्कि लोगों को यह विश्वास हो जाए कि वे वास्तव में ईश्वरीय दूत हैं और उनका अभियान मानव समाज का कल्याण है।

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने जब अपनी पैग़म्बरी की घोषणा की तो उन्हें लोगों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि लोगों ने इसे अपना और अपने पूर्वजों का अपमान समझा किंतु जब उन्होंने देखा कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम हर दशा में अपना अभियान जारी रखना चाहते हैं और यातनाओं व समस्याओं द्वारा उनके इस अभियान को रोकना संभव नहीं है तो उन्होंने लोभ का सहारा लिया और हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम से कहा कि तुम अपने इस नये धर्म का प्रचार छोड़ दो इसके बदले हम तुम्हें अत्यधिक धन देंगे और अरब की सब से अधिक सुन्दर महिला से तुम्हारा विवाह कराएंगे किंतु उनके उत्तर में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने इतिहास शब्द कहे। उन्होंने कहा कि यदि तुम मेरे एक हाथ पर सूरज और दूसरे पर चांद रख दो और मुझ से कहा कि मैं इसके बदले में लोगों को कल्याण का मार्ग दिखाना बंद कर दूं तो मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगा।

    ईश्वरीय दूत की सत्यता प्रमाणित करने का दूसरा मार्ग यह है कि पहले का ईश्वरीय दूत उसके बारे में भविष्य वाणी करे और हम जब इतिहास पर नजऋर डालते हैं तो हम देखते हैं कि उनसे पहले के ईश्वरीय दूत ने उनके बारे में भविष्यवाणी की थी और ईश्वरीय धर्म के मानने वाले बहुत से लोग उनकी प्रतीक्षा भी कर रहे थे। यही कारण है कि अरब के इतिहास में बताया गया है कि अनेकेश्वरवादियों से बहुत से इस प्रकार के लोग कहा करते थे कि शीघ्र ही एक ईश्वरीय दूत आने वाला है। यही कारण है कि जब हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने अपनी पैग़म्बरी की घोषणा की तो बहुत से यहूदियों और ईसाइयों ने उनका अनुसरण करते हुए उनकी शिक्षाओं को स्वीकार किया और उनके अनुयाइयों में शामिल हो गये।

    इस प्रकार से हम देखते हैं कि किसी भी ईश्वरीय दूत की सत्यता को परखने के जो तीन मापदंड हमने बताये हैं उनमें से दो हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बारे में इस प्रकार से पूरे हुए किंतु चूंकि वे अंतिम ईश्वरीय दूत थे इस लिए ईश्वर ने उन्हें अपनी पैग़म्बरी सिद्ध करने के लिए तीसरा और सब से अधिक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली साधन अर्थात मोजिज़ा भी प्रदान किया था । इतिहासिक तथ्यों के आधार पर इस प्रकार के चमत्कारों की संख्या बहुत अधिक है किंतु इन में सब से अधिक महत्वपूर्ण चमत्कार, पवित्र ग्रंथ कुरआन है। जो आज भी यथास्थिति में मौजूद है और इसके साथ ही उसकी चुनौती भी जिस पर हम अपने अगले कार्यक्रम में विस्तार से चर्चा करेंगे फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम जिन्हें मुसलमान अंतिम ईश्वरीय दूत मानते हैं सदैव ही इतिहासकारों की दृष्टि में एक सम्मानीय व्यक्ति रहे हैं और पश्चिमी इतिहासकारों ने भी उन्हें यद्यपि ईश्वरीय दूत के रूप में स्वीकार नहीं किया है किंतु इसके बावजूद इतिहास के एक महापुरुष और महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में याद किया है

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम पैग़म्बरी की घोषणा से पूर्व चालीस वर्षों तक अपने समाज में रहे और अपने चरित्र से अपने अभियान को आगे बढ़ाया।

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को पैग़म्बरी सिद्ध करने के तीनों साधन प्रदान किये गये थे और सब से महत्वपूर्ण साधन कुरआन मजीद है तो आज भी मौजूद है और इसके साथ ही उस जैसी किताब लाने की उसकी चुनौती भी।