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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-61

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    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम जिन्हें मुसलमान अंतिम ईश्वरीय दूत मानते हैं सदैव ही इतिहासकारों की दृष्टि में एक सम्मानीय व्यक्ति रहे हैं और पश्चिमी इतिहासकारों ने भी उन्हें यद्यपि ईश्वरीय दूत के रूप में स्वीकार नहीं किया है किंतु इसके बावजूद इतिहास के एक महापुरुष और महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में याद किया है

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम पैग़म्बरी की घोषणा से पूर्व चालीस वर्षों तक अपने समाज में रहे और अपने चरित्र से अपने अभियान को आगे बढ़ाया।

    हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को पैग़म्बरी सिद्ध करने के तीनों साधन प्रदान किये गये थे और सब से महत्वपूर्ण साधन कुरआन मजीद है तो आज भी मौजूद है और इसके साथ ही उस जैसी किताब लाने की उसकी चुनौती भी। अब आज की चर्चा।

    कुरआन मजीद एक मात्र ईश्वरीय ग्रंथ है जो स्पष्ट रूप से यह घोषणा करता है कि किसी में भी उस जैसी रचना पेश करने की क्षमता नहीं है बल्कि यदि सारे मनुष्य और जिन्न एक हो जाएं तब भी वह एसा कर पाने में सक्षम नहीं होंगें। यही नहीं कुरआन ने तो यहां तक कहा कि यदि किसी में क्षमता है कि तो उसके दस सूरों जैसे ही रचना ला दे।

    इस प्रकार से हम देखते हैं कि कुरआन मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की सत्यता को सिद्ध करने वाले प्रमाण के रूप में पेश किया गया है और आज चौदह सौ वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद कोई भी कुरआन जैसी रचना लाने में सफल नहीं हुआ है।

    क़ुरआन के इस चमत्कारिक पहलु को अधिक समझने के लिए हमें उस चौदह सौ वर्ष पूर्व अरब जगत के इतिहास पर एक दृष्टि डालनी होगी। जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने अरब जगत में इस बात की घोषणा की कि वे ईश्वरीय दूत हैं और लोगों को एक ईश्वर की उपासना करनी चाहिए और भांति भांति के और अपने हाथों से बनाए हुए ईश्वरों को छोड़ देने चाहिए तो उन्हें अत्याधिक कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।

    सब से पहले तो लोगों ने उनकी बातों का उपहास बनाया और उन्हें पागल तक कहा किंतु जब उन्होंने यह देखा कि कुछ लोग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की बातों से प्रभावित हो रहे हैं तो उन्हें ख़तरे का आभास हुआ विशेषकर इस लिए भी उनके संदेश का सब से अधिक प्रभाव कमजोर वर्गों पर हो रहा था जिनका शोषण तत्कालीन समाज में कुलीन और प्रभावी वर्ग पूरी शक्ति से कर रहा था।

    जैसे जैसे समय बीतता गया और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का अभियान व्यापक होता गया, उनका मार्ग रोकने और उनके अभियान को विफल करने के लिए विरोधियों के प्रयास भी व्यापक होते गये। यहां तक कि जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने मक्का नगर में अपने विरोधियों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं से अपने अनुयाइयों को बचाने के लिए उन्हें हब्शा, अर्थात वर्तमान एथोपिया पलायन करने का आदेश दिया और वे सब चुपचाप हब्शा चले गये तो मक्का के प्रभावी सरदारों ने उन्हें वापस लाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल, हब्शा के ईसाई राजा के पास भेजा।

    इसके अलावा जब विरोधी, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के चाचा हज़रत अबूतालिब के पास भी गये और उनसे कहा कि हम मोहम्मद को ढेर सारा धन देंगे और अरब की सब से सुन्दर लड़की से उनका विवाह कराएंगे बस वे अपने धर्म का प्रचार बंद कर दें।

    इन सब प्रयासों के विफल होने के बाद, मक्का वासियों ने चालीस कबीलों से एक एक जवान लेकर एक गुट बनाया और कार्यक्रम यह बनाया कि रात में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के घर पर आक्रमण करके सोते में उनकी हत्या कर दी जाए किंतु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को इसकी सूचना मिल गयी और वे अपने बिस्तर में हज़रत अली अलैहिस्सलाम को सुलाकर रातों रात मक्का से मदीना की निकल पड़े।

    मदीना नगर में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के समर्थकों की संख्या अधिक थी,वहां इस्लामी केन्द्र की स्थापना हुई किंतु मक्का वासियों ने सेना बनायी और मक्का पर आक्रमण कर दिया और इस प्रकार मक्का के विरोधियों से मदीने में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम और उनके समर्थकों को कई युद्ध करने पड़े किंतु हर बार मक्का के विरोधियों को विफलता मिली। हालांकि कई युद्धों में उन्हों ने, आसपास के यहूदियों के साथ गठजोड़ भी किया।

    इस प्रकार से सिद्ध होता है कि जब इस्लाम का प्रचार आरंभ हुआ और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने कुरआन रूपी ईश्ववरीय संदेश अरबों को सुनाया तो उन्हें अरबों के अत्याधिक कड़े विरोध का सामना करना पड़ा और उनसे जो बन पड़ा उन्हों ने किया किंतु क़ुरआन की इस चुनौती का उत्तर नहीं दिया कि यदि तुम में शक्ति है तो कुरआन जैसे दस सूरे ही पेश करो।

    क़ुरआन मजीद की यह चुनौती अरब इतिहास के उस युग में गूंजी जब साहित्य और साहित्यिक रचना ही सब से बड़ी पूंजी थी और समाज में साहित्यकारों और कवियों का अत्याधिक सम्मान था यहां तक कि अरब की सात प्रसिद्ध काव्य रचनाओं को काबे की दीवार पर टांग दिया गया था जिसकी लोग पूजा करते थे। अरब साहित्य में इस काल को साहित्यिक प्रगति की चरमसीमा और आदर्श समझा जाता है इसी लिए यह बड़ी विचित्र बात है कि अरब, क़ुरआन की ललकार का उत्तर देने के बजाय तलवारें लेकर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के सामने आते थे और क़ुरआन मजीद द्वारा मेरे जैसी रचना पेश करो की चुनौती स्वीकार करने के स्थान पर, लोगों से कहते थे कि मोहम्मद जब कुरआन पढ़ें तो अपनी कानों में उंगुली ठूंस लो क्योंकि वे जादूगर हैं।

    उस समय कुरआन की चुनौती को किसी ने स्वीकार नहीं किया और न ही इतिहास में किसी एसे का उल्लेख है जिसने यह कहा हो कि उसने कुरआन की चुनौती स्वीकार करते एक कुरआन जैसी किसी रचना का संकलन किया है। केवल उसी काल में नहीं उसके बाद और आज तक कुरआन की चुनौती अपनी जगह बाकी है किंतु उसे किसी भी काल में स्वीकार नहीं किया गया।

    स्पष्ट सी बात है यदि कुरआन ईश्वरीय चमत्कार न होता तो साहित्य की चोटियों पर विराजमान अरब के वह साहित्यकार जिनकी रचनाओं की पूजा होती थी, कुरआन की चुनौती अवश्य स्वीकार करते या कम से कम वह एसी रचना पेश कर देते जिसके बारे में उनका दावा होता कि वह कुरआन जैसी है किंतु आश्चर्यजनक रूप से एसा दावा तक किसी ने नहीं किया। जब कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के विरुद्ध, मक्का वासियों की शत्रुता और उनके विरोध की व्यापकता देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उनके लिए यदि संभव होता तो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को रोकने और उनके धर्म को झूठा सिद्ध करने का यह सब से अधिक सरल मार्ग था। क्योंकि इस प्रकार से न किसी युद्ध की आवश्यकता पड़ती और न ही उनके असंख्य योद्धा, विभिन्न युद्धों में मारे जाते किंतु उन्हों ने एसा नहीं किया जिसका साफ अर्थ यही निकलता है कि वे एसा कर नहीं पाए यदि वे एसा कर पाते तो अवश्य।

    यह स्थिति चौदह सौ वर्ष से जारी है और वर्तमान युग में भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम और उनके लाए हुए धर्म तथा उनके अनुयाइयों के विरुद्ध साम्राज्यवादी शक्तियों की शत्रुओं पूर्ण रूप से स्पष्ट है और वे इस्लाम की छवि बिगाड़ने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का अपमान करते हैं और उनके ग्रंथ कुरआन को भांति भांति का नाम देकर उसका अपमान करते हैं यहां तक कि अपनी इच्छा से उसमें फेर बदल करके कुरआन के रूप में नया ग्रंथ तक प्रकाशित करते किंतु कुरआन की चुनौती को स्वीकार करने का कदापि प्रयास नहीं करते जो विदित रूप से कम ख़र्चीला और सरल मार्ग है।

    इस प्रकार से इस्लाम के शत्रुओं द्वारा इस चुनौती को स्वीकार न किया जाना इस बात का सब से बड़ा प्रमाण है कि कुरआन एक चमत्कार और ईश्वरीय ग्रंथ है अलबत्ता उसके चमत्कार का यह एक आयाम है अन्यथा अरबी भाषा का पूर्ण ज्ञान रखने वालों को लिए कुरआन के चमत्कारिक पहलु अनगिनत हैं और यह कुरआन की विशेषता है कि जैसे जैसे मनुष्य का ज्ञान इस किताब के बारे में बढ़ता जाता है, उसके सामने कुरआन के चमत्कारिक आयाम भी बढ़ते जाते हैं। चर्चा जारी रहेगी फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिंदु

    कुरआन मजीद एक मात्र ईश्वरीय ग्रंथ है जो स्पष्ट रूप से यह घोषणा करता है कि किसी में भी उस जैसी रचना पेश करने की क्षमता नहीं है इसी लिए कुरआन मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की सत्यता को सिद्ध करने वाले प्रमाण के रूप में पेश किया गया है चौदह सौ वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद कोई भी कुरआन जैसी रचना लाने में सफल नहीं हुआ है।

    अरबी साहित्य के विकास की चरम सीमा के बावजूद उस समय कुरआन की चुनौती को किसी ने स्वीकार नहीं किया और न ही इतिहास में किसी एसे का उल्लेख है जिसने यह कहा हो कि उसने कुरआन की चुनौती स्वीकार करते एक कुरआन जैसी किसी रचना का संकलन किया है।