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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-62

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    कुरआन मजीद एक मात्र ईश्वरीय ग्रंथ है जो स्पष्ट रूप से यह घोषणा करता है कि किसी में भी उस जैसी रचना पेश करने की क्षमता नहीं है इसी लिए कुरआन मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की सत्यता को सिद्ध करने वाले प्रमाण के रूप में पेश किया गया है चौदह सौ वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद कोई भी कुरआन जैसी रचना लाने में सफल नहीं हुआ है।

    अरबी साहित्य के विकास की चरम सीमा के बावजूद उस समय कुरआन की चुनौती को किसी ने स्वीकार नहीं किया और न ही इतिहास में किसी एसे का उल्लेख है जिसने यह कहा हो कि उसने कुरआन की चुनौती स्वीकार करते एक कुरआन जैसी किसी रचना का संकलन किया है।और अब आज आज की चर्चाः

    जैसाकि हम पिछली चर्चाओं में यह बता चुके हैं कि अधिकांश ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों ने ईश्वरीय दूतों के स्वर्गवास के बाद उनकी शिक्षाओं में परिवर्तन कर दिये और समय बीतने के साथ ही उनकी शिक्षाओं में इतना परिवर्तन हो गया कि उसका रूप ही दूसरा हो गया, विभिन्न युगों में ईश्वरीय दूत और धर्म भेजने का तर्क भी यही है तो फिर स्पष्ट है कि फेर बदल की इस प्रक्रिया से ईश्वरीय दूतों के ग्रंथ भी सुरक्षित नहीं रह सके तो प्रश्न यहां पर यह है कि क्या क़ुरआन मजीद के साथ ही एसा ही कुछ हुआ है? अर्थात क्या क़ुरआन में भी फेर बदल हुआ है क्योंकि इसे उतरे हुए थी चौदह सौ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है।

    इस से पूर्व संकेत किया जा चुका है कि पैग़म्बरों और ईश्वरीय दूतों के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यह आवश्यक था कि ईश्वरीय संदेश सही दशा में और बिना किसी फेर बदल के लोगों तक पहुंचें ताकि लोग अपना लोक परलोक बनाने के लिए उससे लाभ उठा सकें।

    यही स्थिति क़ुरआन के लिए भी है और मुसलमानों का यह मानना है कि लोगों तक पहुंचने से पूर्व तक क़ुरआन का हर प्रकार से परिवर्तन व फेर बदल से सुरक्षित होना आवश्यक है किंतु हम ईश्वरीय दूतों की पवित्रता पर चर्चा कर चुके हैं इस लिए लोगों तक सही स्थिति में पहुचंना यहां पर इस समय हमारी चर्चा का विषय नहीं है किंतु इस बात के दृष्टिगत कि ईश्वरीय दूतों के बाद उनकी किताबों में फेल बदल कर दी जाती है मुसलमानों को यह कहां से पता है कि अंतिम ईश्वरीय दूत के ग्रंथ के नाम से जो किताब उनके पास है जिसे वे कुरआन कहते हैं उसमें आज तक कोई फेर बदल नहीं हुआ है और न उस में कोई चीज़ बढ़ायी गयी है और न ही उसमें से कोई वस्तु कम की गयी है?

    जिन लोगों को इस्लामी इतिहास का ज्ञान है और इस ग्रंथ की सुरक्षा के बारे में ईश्वरीय मार्गदर्शकों और शासकों तथा मुसलमानों की संवेदनशीलता का पता है वह बड़ी सरलता से इस बात पर विश्वास कर लेगा कि कुरआन में कुछ बढ़ाया या घटाया नहीं गया है क्योंकि एतिहासिक तथ्यों के आधार पर इस्लामी काल में इतने सारे युद्धों में से केवल एक ही युद्ध में सत्तर एसे लोग मारे गये थे जिन्हें पूरा क़ुरआन याद था।

    वास्तव में अरबों में लिखने पढ़ने का चलन बहुत कम था बल्कि न होने के बराबर था इसी लिए वहां पर याद करना बहुत प्रचलित था। इसी लिए हम जब प्राचीन अरब इतिहास पर नज़र डालते हैं तो हमें पता चलता है कि इस साहित्यिक काल में लोग एक एक हज़ार शेर याद करते और उसे सुनाते।

    जब क़ुरआन उतरा तो उसे सुरक्षित रखने का एक मार्ग यह भी था कि लोग उसे याद कर लेते थे और पैग़म्बरे इस्लाम ने इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित भी किया था और यही कारण है कि आज भी मुसलमान, एक अत्यधिक महत्वपूर्ण कर्म के रूप में क़ुरआन कंठस्थ करते हैं

    इस प्रकार से हम देखते हैं कि गत चौदह सौ वर्ष के दौरान कुरआन की सुरक्षा के लिए जो उपाय किय गये तथा उसके शब्दों और आयतों की गिनती आदि करने जैसे काम भी इसी संवेदनशीलता को सिद्ध करते हैं।

    किंतु इस प्रकार के एतिहासिक प्रमाणों से हट कर भी बौद्धिक व एतिहासिक तथ्यों पर आधारित एक तर्क द्वारा कुरआन के सुरक्षित रहने को सिद्ध किया जा सकता है। तो सब से पहले हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि कुरआन में कुछ बढ़ाया नहीं गया है।

    कुरआन में कुछ बढ़ाया नहीं गया है इस बात पर सभी मुसलमान सहमत हैं बल्कि विश्व के इतिहासकारों ने भी इस विषय की पुष्टि की है और कोई भी एसी घटना नहीं घटी जिसके अंतर्गत क़ुरआन में कुछ बढ़ाना पड़ा हो और इस प्रकार की संभावना का कोई प्रमाण भी नहीं है और यदि यह मान लिया जाए कि कोई एक शब्द या एक छोटी सी आयत उसमें बढ़ा दी गयी तो फिर इसका अर्थ यह होगा कि कुरआन जैसी रचना दूसरे लोगों के लिए भी संभव है और यह संभावना कुरआन के चमत्कारी आयाम अर्थात उसके जैसी रचना में मनुष्य की अक्षमता से मेल नहीं खाती जबकि हम पिछली चर्चाओं में कुरआन के इस चमत्कारिक पहलु को सिद्ध कर चुके हैं।

    इसके अतिरिक्त यदि हम यह स्वीकार कर लें कि कुरआन में कोई विषय बढ़ाया गया है तो इसका अर्थ यह होगा कि कुरआन की व्यवस्था व ढांचा बिगड़ गया जिस का अर्थ यह होगा कि कुरआन की व्यवस्था व ढांचा बिगड़ गया जिसका अर्थ होगा कि क़ुरआन में वाक्यों के मध्य तालमेल का जो चमत्कारी पहलू था वह समाप्त हो गया और इस दशा में यह भी सिद्ध हो जाएगा कि कुरआन में शब्दों की बनावट व व्यवस्था का उत्तर लाना संभव है क्योंकि कुरआनी शब्दों का एक चमत्कार शब्दों का चयन तथा उनके मध्य संबंध भी हैं और उनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन, उस के ख़राब होने का कारण बन जाएगा।

    अर्थात कुरआन में जिस प्रकार के शब्दों का चयन किया गया है और जिन वाक्यों का प्रयोग किया गया है उनसे मिल कर कुरआन का ढांचा बना किंतु स्पष्ट रूप से दिखने वाले ढांचे के अतिरिक्त कुरआन के अर्थों का भी एक अदृश्य ढांचा है जो शब्दों में किसी भी प्रकार के फेर बदल से ख़राब हो सकता है।

    इस प्रकार से जिन तर्कों के अंतर्गत कुरआन के चमत्कार होने को सिद्ध किया गया था वही तर्क इसके सुरक्षित रहने के लिए भी प्रयोग किये जा सकते हैं। अर्थात यदि कुरआन में फेर बदल हुआ होता तो अवश्य इतिहास में कुछ एसे लोगों का उल्लेख होता जो एसा दावा करते किंतु इतिहास में एसे लोगों का उल्लेख नहीं है।

    प्रत्येक दशा में कुल मिलाकर कुरआन के संदर्भ में यह सिद्ध है कि उसमें अभी तक किसी प्रकार का फेर बदल नहीं हुआ है और इस पर सभी मुसलमानों का विश्वास भी है और यदि कोई इस बात को स्वीकार करता है कि कुरआन ईश्वरीय चमत्कार है तो फिर उसे यह भी विश्वास करना होगा कि ईश्वरीय कामों में कोई भागीदार नहीं बन सकता और जब यह सिद्ध हो जाएगा कि कुरआन ईश्वरीय संदेश है तो फिर उसकी हर आयत और हर वाक्य को सत्य मानना होगा और कुरआन में स्पष्ट रूप से यह कहा है कि हमने इसे उतारा है और हम ही इसकी सुरक्षा करने वाले हैं।

    कुरआन के संदर्भ में चर्चा अत्यधिक विस्तृत है किंतु इस कार्यक्रम में चूंकि हमारा उद्देश्य बौद्धिक तथ्यों से ईश्वर और परलोक संबंधों तथ्यों को सिद्ध करना है इस लिए हम कुरआन के संदर्भ में अपनी चर्चा को यहीं पर समाप्त करते हैं। अगले कार्यक्रम में हम इमामत अर्थात, अंतिम ईश्वरीय दूत के उत्तराधिकारियों और इससे संबंधित भूमिका पर वार्ता आरंभ करेंगे। फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु। • इस्लामी इतिहास का ज्ञान रखने वालों को पता है कि इस ग्रंथ की सुरक्षा के बारे में ईश्वरीय मार्गदर्शकों और शासकों तथा मुसलमानों में अत्याधिक संवेदनशीलता पाई जाती है इसी लिए वे बड़ी सरलता से इस बात पर विश्वास कर लेगा कि कुरआन में कुछ बढ़ाया या घटाया नहीं गया है

    • कुरआन में जिस प्रकार के शब्दों का चयन किया गया है और जिन वाक्यों का प्रयोग किया गया है उनसे मिल कर कुरआन का ढांचा बना किंतु स्पष्ट रूप से दिखायी देने वाले ढांचे के साथ ही कुरआन के अर्थों का भी एक अदृश्य ढांचा है जो शब्दों में किसी भी प्रकार के फेर बदल से बिगड़ सकता है।

    • इतिहासिक तथ्यों के आधार पर किसी ने कुरआन में फेर बदल करने या कुछ घटाने अथवा बढ़ाने का दावा नहीं किया है और न ही इसका कोई प्रमाण है।