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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 64

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    यह कहना सही नहीं है कि पैग़म्बरे इस्लाम का संदेश केवल एक क्षेत्र से विशेष था क्योंकि इतिहासिक तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि उनका संदेश पूरी मानव जाति के लिए था।

    यदि पैग़म्बरे इस्लाम के काल में कुछ अन्य धर्म इस्लामी सरकार के साथ लेन देन करते थे तो इसका अर्थ यह नहीं है कि पैग़म्बरे इस्लाम उन धर्मों की सत्यता को औपचारिक रूप से स्वीकार करते थे बल्कि इसका अर्थ यह है कि वे धर्म के चयन में मनुष्य के मूल अधिकार में विश्वास रखते थे। और अब आज की चर्चा

    मुसलमानों का कहना है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही स सल्लम अंतिम ईश्वरीय दूत हैं और जो भी मुसलमान है वह जिस प्रकार से ईश्वर को एक मानता है उसी प्रकार से यह भी मानता है कि पैग़म्बरे इस्लाम के बाद ईश्वर का कोई दूत नहीं भेजा गया और वे अंतिम ईश्वरीय दूत हैं किंतु प्रश्न यह है कि इसका प्रमाण क्या है?

    जहां तक इस के प्रमाण की बात है तो निश्चित रूप से बौद्धिक रूप से इसका ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना संभव नहीं है क्योंकि यह विषय, ईश्वर के एक होने या उसके न्यायी होने जैसे विषयों की भांति बौद्धिक नहीं है किंतु वास्तव में यदि देखा जाए तो इस विषय को बौद्धिक रूप से सिद्ध करने की कोई आवश्यकता ही नहीं क्योंकि यह विषय केवल मुसलमानों से संबंधित है अर्थात ईश्वर है या नहीं है यदि है तो कैसा है, एक है या कई है या फिर धर्म का कोई आधार है या नहीं या फिर धर्म अफीम है जैसा कि कुछ लोगों का दावा है इस प्रकार की चर्चाओं जो पिछले कार्यक्रमों में गुज़र चुकी हैं हर धर्म के अनुयाई से संबंधित हो सकती हैं किंतु पैग़म्बरे इस्लाम अंतिम दूत थे या नहीं इसका संबंध अधिकतर मुसलमानों से है और जो मुसलमान होता है वह क़ुरआन को अवश्य मानता है और कुरआन ने उन्हें अंतिम दूत कहा है इस लिए मुसलमानों के लिए इससे बड़ा और कोई प्रमाण नहीं हो सकता।

    किंतु इसके बावजूद कुछ प्रश्न उठाए जा सकते हैं जैसे यह कि यदि ईश्वरीय दूतों को भेजना मानव समाज के कल्याण के लिए आवश्यक है तो फिर अब यह क्रम रुक क्यों गया, क्या कारण है कि अतीत में तो समाजों में ईश्वरीय दूत भेजे गये किंतु आज के समाज में कोई ईश्वरीय दूत नहीं है?

    इस शंका का उत्तर यूं दिया जा सकता है कि जब मानव समाज की रचना हुई तो लोग असंख्य विषयों से अनभिज्ञ थे और उन्हें क़दम क़दम पर मार्गदर्शन की आवश्यकता थी किंतु जब समाज में वैचारिक व बौद्धिक विकास एक सीमा तक पहुंच गया तो मार्गदर्शन के आयाम भी कम हो गये।

    इसका उदाहरण हम इस प्रकार से दे सकते हैं कि जब किसी घर में एक बच्चा जन्म लेता है तो आरंभ में अपनी जगह से इधर उधर भी नहीं हो सकता इस लिए उसके माता पिता उसका हर काम करते हैं धीरे धीरे वह बढ़ता है और फिर कुछ महीनों बाद यदि वह कोई वस्तु लेना चाहता है तो इस काम पर सक्षम हो जाता है किंतु इस दशा में भी उसे माता पिता की सहायता व मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है किंतु जब वह और बड़ा हो जाता है तो फिर एक एसा चरण आता है जहां उसे माता पिता की शारीरिक सहायता की आवश्यकता नहीं होती और उसका हाथ पकड़ कर चलना सिखाने वाले माता पिता आश्वस्त होकर उसे अकेले स्कूल जाने देते हैं किंतु यही बच्चा जब विश्व विद्यालय में चला जाता है तो फिर उसके लिए अभिभावक छात्र की बैठक का भी आयोजन नहीं किया जाता क्योंकि अब इसकी आवश्यकता नहीं है यहां तक कि वह विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर नौकरी प्राप्त कर लेता है विवाह करता है और अपनी जीवन जीने लगता है तो यदि हम उसके जन्म से लेकर इस चरण तक के जीवन पर ध्यान दें तो धीरे धीरे उसे स्वाधीन होते देख सकते हैं। यही हाल ईश्वरीय दूतों का है ईश्वर की दृष्टि में जब तक मानव समाज विकास के चरण में था उसने ईश्वरीय दूतों को भेजा और जब समाज का विकास हो गया तो फिर ईश्वरीय दूतों की आवश्यकता नहीं रही इसी लिए यह क्रम रुक गया किंतु इसके बाद भी चूंकि मनुष्य को सदैव ही ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है इसी लिए उसने इमामों के रूप में मनुष्य के मार्गदर्शन की व्यवस्था की ठीक उसी बच्चे की भांति जो बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़े होने के बावजूद बहुत से मामलों में अपने माता पिता की सहायता और परामर्श की आवश्यकता महसूस करता है।

    इसका एक प्रमाण पैग़म्बरे इस्लाम का लाया हुआ धर्म है उन्होंने समाज के लिए जो धर्म पेश किया उसमें आदेश एसे नहीं हैं कि उनमें लचक न हो बल्कि इस्लाम के आदेश दो प्रकार के हैं एक प्रकार के वह आदेश हैं जो अटल और अडिग हैं और अन्य प्रकार के आदेश, समय की आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं किंतु बहुत से आदेश एसे हैं जो बदले नहीं किंतु हर काल में उपयोगी होते हैं।

    उदाहरण स्वरूप इस्लाम ने आदेश दिया है कि समझौतों से प्रतिबद्ध रहो तो अब यह एसा नियम है जो हर युग में उपयोगी है क्योंकि यह नियम हर प्रकार के समझौते के बारे में इस लिए समझौतों का विषय बदलता रहेगा किंतु नियम यही रहेगा।

    यह इसी प्रकार से क़ानून बनाने के लिए एक नियम है कि हानि से बचाया जा सके अर्थात कोई भी एसा नियम नहीं बनना या कोई एसा काम नहीं करना चाहिए जिससे समाज को हानि पहुंचे यह एसा नियम है जिसके आधार पर हर युग के समाज के लिए नियमों की रचना की जा सकती है इस प्रकार से हम देखते हैं कि यद्यपि ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम को अंतिम दूत बनाया है और उनके धर्म को अंतिम धर्म बनाया किंतु उसके नियमों को एसा बनाया है जो हर युग में उपयोगी व अनुकरणीय हों।और अब हमारी आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः

    मानव समाज रचना के आरंभ में असंख्य विषयों से अनभिज्ञ था और उसे हर क़दम पर मार्गदर्शन की आवश्यकता इसी लिए एक के बाद एक ईश्वरीधय दूत भेजे गये किंतु जब समाज में वैचारिक व बौद्धिक विकास एक सीमा तक पहुंच गया तो मार्गदर्शन के आयाम भी कम हो गये और इसी के साथ ईश्वरीय दूतों का क्रम भी ।

    ईश्वर ने अंतिम दूत और अंतिम धर्म के बाद भी मानव समाज को यूं ही नहीं छोड़ा है क्योंकि मानव समाज की ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता विकसित होने के कारण कम हो गयी है किंतु ख़त्म नहीं हुई है।