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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 65

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    मानव समाज रचना के आरंभ में असंख्य विषयों से अनभिज्ञ था और उसे हर क़दम पर मार्गदर्शन की आवश्यकता इसी लिए एक के बाद एक ईश्वरीधय दूत भेजे गये किंतु जब समाज में वैचारिक व बौद्धिक विकास एक सीमा तक पहुंच गया तो मार्गदर्शन के आयाम भी कम हो गये और इसी के साथ ईश्वरीय दूतों का क्रम भी ।

    ईश्वर ने अंतिम दूत और अंतिम धर्म के बाद भी मानव समाज को यूं ही नहीं छोड़ा है क्योंकि मानव समाज की ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता विकसित होने के कारण कम हो गयी है किंतु ख़त्म नहीं हुई है।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने मक्का से मदीना पलायन किया और मदीना के लोगों ने उनका और उनके साथ पलायन करके मदीना जाने वालों का व्यापक समर्थन किया और इसी लिए उन्हें अंसार अर्थात सहायकों की उपाधि दी गयी और इस प्रकार से मदीने नगर में एक इस्लामी समाज की नींव रखी गयी और उसका संचालन इस्लामी नियमों के आधार पर आरंभ हुआ।

    मदीना नगर में मस्जिदुन्नबी का निमार्ण हुआ जो उपासना स्थल, लोगों की व्यापारिक व समाजिक गतिविधियों पर नज़र रखने और उनके विवाद सुलझाने का स्थान होने के साथ ही साथ दूरस्त क्षेत्रों से आने वाले लोगों की शरणस्थली भी थी और जब युद्ध होता था तो उसी मस्जिद में सब इकटठा होकर रणनीति बनाते थे। अर्थात उस काल में लोगों के लोक व परलोक के मामलों का निपटारा इसी मस्जिद में होता था और सारे निर्णय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम करते थे क्योंकि इस्लामी आदेशों के अनुसार सभी मामलों में चाहे वह सांसारिक हों या परलोकिक पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का आदेश मानना अनिवार्य था।

    इस प्रकार से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने जहां लोगों को परलोक में कल्याण का नियम बताए और उस का पालन करवाया वहीं लोगों को शिष्टाचार व राजनीति तथा समाज के संबंधी नियम भी बताए और उनका पालन कराया क्योंकि स्पष्ट सी बात है जिस धर्म का यह कहना हो कि वह अंतिम धर्म है तो उसे सम्पूर्ण और व्यापक भी होना चाहिए और जिस धर्म में भी समाज व राजनीति शामिल नहीं है उसे सम्पूर्ण व व्यापक धर्म नहीं कहा जा सकता क्योंकि समाज व राजनीति मानव जीवन के अभिन्न अंश हैं और उनके बिना समाज के गठन व जीवन यापन की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।

    किंतु अब प्रश्न यह है कि इस्लाम यह कहता है कि वह अंतिम धर्म है और मानव जीवन के लिए एक व्यापक सिद्धान्त लेकर आया है और यह कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बाद कोई ईश्वरीय दूत नहीं है और यह कि उनका संदेश पूरी मानवजाति के लिए है तो प्रश्न यह उठता है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के बाद समाज के संचालन की ज़िम्मेदारी अर्थात इमामत अर्थात नेतृत्व की ज़िम्मेदारी किस की है?

    क्या ईश्वर ने जिस प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को समाज के मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी उसी प्रकार उसने कुछ अन्य लोगों को यह ज़िम्मेदारी सौंपी है या फिर अपना मार्गदर्शक और अगुवा चुनने का काम ईश्वर ने लोगों पर छोड़ दिया? और क्या समाज के आम लोगों में यह योग्यता है कि वे अपनी समझ से एसे व्यक्ति का चयन करें जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की भांति और उनका प्रतिनिधित्व करते हुए समाज का नेतृत्व कर सके?

    इस संदर्भ में मुसलमानों के शीआ व सुन्नी समुदायों में मूल अंतर पाया जाता है। अर्थात शीआ समुदाय का यह मानना है कि इमामत अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बाद समाज के नेतृत्व का पद ईश्वरीय है और ईश्वर ने इमामों और अर्थात अपने बाद के मार्गदर्शकों का निर्धारण ईश्वरीय आदेश से कर दिया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी बनाया और उनके बाद उनके वंश से एक के बाद एक ११ इमाम हुए।

    किंतु सुन्नी समुदाय का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम द्वारा समाज के मार्गदर्शन का क्रम उनके स्वर्गवास के साथ ही समाप्त हो गया और उनके बाद समाज के मार्गदर्शकों का चयन स्वंय समाज की ज़िम्मेदारी है और बहुत से सुन्नी बुद्धिजीवियों का तो यह भी मानना है कि यदि कोई शस्त्र के बल पर भी इस्लामी समाज में सत्ता अपने हाथ में ले ले तो भी उसकी आज्ञापालन लोगों के लिए अनिवार्य होगी

    इस्लामी इतिहास में यह विषय अत्यधिक मतभेदों का कारण बना और यही कारण है कि मदीना नगर में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने जिस समाज की नींव रखी थी वह उनके बाद उत्तराधिकार और नेतृत्व को लेकर दो भागों में बंट गया और समय के साथ ही साथ दोनों धड़ों के मध्य दूरियां बढ़ती गयीं किंतु यहां पर हम इस विवाद का वर्णन नहीं कर सकते क्योंकि यह स्वंय अत्यधिक विस्तृत विषय है फिर तो इमामत के अर्थ पर चर्चा कर रहे हैं।

    इमामत अरबी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ होता है नेतृत्व और जो व्यक्ति भी किसी गुट या व्यक्ति का नेतृत्व करे उसे इमाम कहा जाता है। इमाम अर्थात आगे चलने वाला और इसके लिए यह भी शर्त नहीं है कि वह सही मार्ग की ओर ले जाने वाला हो या ग़लत मार्ग की ओर। अर्थ के अनुसार सही या गलत मार्ग की ओर ले जाने वाले को इमाम कहा जाता है इसी लिए मस्जिद में नमाज़ पढ़ाने वाले धर्म गुरु को इमाम जमाअत कहा कहा जाता है क्योंकि वह जमाअत अर्थात लोगों के आगे खड़ा होता है।

    किंतु जब धार्मिक चर्चा होती है और उसमें इमामत का विषय उठाया जाता है तो उससे आशय, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बाद समाज के नेतृत्व का पद होता है और इस संदर्भ में इमाम से आशय वह मार्गदर्शक होता है जो समाज के लोक व परलोक के सभी मामलों का ज़िम्मेदार और जीवन के हर पहलु व विषय के बारे में मार्गदर्शन उसका दायित्व होता है। इसी लिए यद्यपि वह ईश्वरीय दूत नहीं होता किंतु जिस प्रकार से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के आदेशों का पालन अनिवार्य था उसके आदेशों का पालन भी वाजिब होता है और चूंकि वह पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के अभियान को आगे बढ़ा रहा होता है इस लिए उससे भी किसी भी प्रकार की गलती की संभावना नहीं होती और इस संदर्भ में उसे भी ईश्वरीय दूतों की ही भांति गलतियों और पापों से दूर माना जाता है और वास्तव इमाम वही काम करते हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम करते थे बस इस अंतर के साथ कि इमाम ईश्वरीय दूत नहीं हैं बल्कि ईश्वरीय मार्गदर्शक हैं।
    इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि इमामत के बारे में शीआ और सुन्नी के मध्य मतभेद तीन विषयों में प्रकट होते हैं।

    पहला यह कि इमाम को ईश्वर की ओर से निर्धारित किया जाना चाहिए दूसरा यह कि उसके पास ईश्वरीय ज्ञान होता है और वह ग़लतियों से दूर होता है। तीसरा यह कि इमाम पापों से दूर होता है। सुन्नी समुदाय के निकट इमाम में यह तीनों विशेषताएं होना आवश्यक नहीं है। क्योंकि मूल रूप से वह यही नहीं मानते कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का उत्तराधिकारी, ईश्वर और स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम द्वारा निर्धारित होना चाहिए।

    इस चर्चा के मुख्य बिंदु

    जिस धर्म का यह कहना हो कि वह अंतिम धर्म है तो उसे सम्पूर्ण और व्यापक भी होना चाहिए और जिस धर्म में भी समाज व राजनीति शामिल न हो उसे सम्पूर्ण व व्यापक धर्म नहीं कहा जा सकता।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बाद इस्लामी समाज दो गुटों में बंट गया कुछ लोगों का यह कहना था कि वे अपने बाद किसी को अपना उत्तराधिकारी नहीं बना कर गये और अब यह समाज की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने लिए अगुवा और मार्गदर्शक का चयन करे।

    शीआ समुदाय का मानना है कि इमाम का निर्धारण, ईश्वरीय व्यवस्था के अंतर्गत होना चाहिए, उसे पापों और ग़लतियों से दूर होना चाहिए क्योंकि उसका अभियान भी ईश्वरीय दूतों का अभियान है इसी लिए जो शर्तों ईश्वरीय दूतों के लिए थीं वही उसके लिए भी होनी चाहिए सिवाए इसके कि वह ईश्वरीय दूत नहीं होता। अगली चर्चा तक के लिए अनुमति दें।