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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 66

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    जिस धर्म का यह कहना हो कि वह अंतिम धर्म है तो उसे सम्पूर्ण और व्यापक भी होना चाहिए और जिस धर्म में भी समाज व राजनीति शामिल न हो उसे सम्पूर्ण व व्यापक धर्म नहीं कहा जा सकता।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बाद इस्लामी समाज दो गुटों में बंट गया कुछ लोगों का यह कहना था कि वे अपने बाद किसी को अपना उत्तराधिकारी नहीं बना कर गये और अब यह समाज की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने लिए अगुवा और मार्गदर्शक का चयन करे।

    शीआ समुदाय का मानना है कि इमाम का निर्धारण, ईश्वरीय व्यवस्था के अंतर्गत होना चाहिए, उसे पापों और ग़लतियों से दूर होना चाहिए क्योंकि उसका अभियान भी ईश्वरीय दूतों का अभियान है इसी लिए जो शर्तों ईश्वरीय दूतों के लिए थीं वही उसके लिए भी होनी चाहिए सिवाए इसके कि वह ईश्वरीय दूत नहीं होता।

    बहुत से एसे लोग जो धर्म से सबंधित मामलों का अधिक ज्ञान नहीं रखते यह सोचते हैं कि इमामत व तथा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकार के बारे में शीआ व सुन्नी समुदाय में अन्तर केवल यही है कि शीआ का यह मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को समाज संचालन के लिए अपना उत्तराधिकारी बनाया है किंतु सुन्नी समुदाय का मानना है कि एसा नहीं हुआ और लोगों ने अपनी इच्छा से एक एक व्यक्ति को उत्तराधिकारी के रूप में चुन लिया।

    किंतु यहां पर हम ब्योरे में जाए बिना यह स्पष्ट कर दें कि मुसलमानों के दो प्रमुख समुदाय शीआ और सुन्नी के मध्य इस संदर्भ में मतभेद व्यापक हैं इस लिए मूल रूप से हम इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करेंगे कि इमामत अथवा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकार का पद ईश्वर की पुष्टि के बाद प्राप्त होता है या एक सांसारिक साम्राज्य है जो सामाजिक कारकों के अंतर्गत प्राप्त होता है।

    इस संदर्भ में शीआ समुदाय का यह मानना है कि स्वंय

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को भी पूर्ण स्वतंत्रता के साथ अपनी इच्छा के अनुसार अपना उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार प्राप्त नहीं था बल्कि उन्होंने यह काम ईश्वर के आदेश से किया और वास्तव में ईश्वरीय दूतों के क्रम के समाप्त होने और पापों से पवित्र इमामों के निर्धारण के मध्य एक प्रकार का संबंध है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बाद इस प्रकार के इमामों की उपस्थिति के कारण ही इस्लामी समाज के हितों की रक्षा संभव हुई।

    इस प्रकार से यह स्पष्ट होता है कि शीआ मतानुसार इमामत एक मूल विश्वास व सिद्धान्त के रूप में पेश की जाती है न कि एक व्यवहारिक आदेश के रूप में क्योंकि शीआ समुदाय, इमामों के लिए ईश्वरीय ज्ञान, पापों से पवित्रता की ईश्वरीय ज़मानत और ईश्वरीय पुष्टि को आवश्यक मानता है किंतु प्रश्न यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के बाद इमामों की आवश्यकता क्यों है?

    वास्तव में मानव की रचना के उद्देश्यों के वर्णन के समय हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि ईश्वरीय संदेशों द्वारा मनुष्य का मार्गदर्शन आवश्यक है और ईश्वर ने अपनी कृपा व दया के कारण यह आवश्यक समझा कि अपने दूत भेज कर मनुष्य को लोक-परलोक के कल्याण के मार्गों से परिचित कराए और उन्हें यथासंभव सीमा तक परिपूर्णता के अंतित चरण तक पहुंचाए और मानव समाज की इस आवश्यकता को पूरा करने और इसी प्रकार यदि सामाजिक परिस्थितियां अनुकूल हों तो ईश्वर द्वारा निर्धारित लोग समाज संचालन और ईश्वरीय नियमों के पालन की ज़िम्मेदारी भी संभालें।

    इसी प्रकार हम यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि जो भी धर्म इस बात का दावा करता है कि वह अंतिम धर्म है तो उसमें ईश्वरीय दूतों के क्रम का समापन उसी समय तार्किक होगा जब अंतिम ईश्वरीय धर्म, समस्त मानव आवश्यकताओं की पूर्ति की क्षमता रखता हो और संसार के अंत तक उस की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो किंतु प्रश्न यह है कि इस की व्याख्या का स्रोत क्या हो?

    इस्लाम में क़ुरआन को सभी नियमों का स्रोत समझा जाता है किंतु यह भी एक वास्तिवकता है कि सभी इस्लामी नियमों के वर्णन के लिए एक साधारण मनुष्य के लिए क़ुरआन ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि क़ुरआन में बहुत से विषयों का केवल संक्षेप में उल्लेख है और उसकी विधि और संस्कार का वर्णन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने किया है इसी लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का व्यवहार, जीवन शैली और कथन, इस्लामी नियमों के मुख्य स्रोत हैं।

    यह भी एक वास्तिवकता है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को अपनी जीवन में अत्याधिक चुनौतियों का सामना रहा जिसके कारण यह संभव नहीं था कि वह सभी युगों में सामने आने वाले सभी विषयों के नियमों का विस्तार पूर्वक वर्णन कर देते और इसके साथ यह भी एक वास्तविकता है कि मुसलमानों में तो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के उन कामों के बारे में भी मतभेद है जिन्हें प्रतिदिन लोग देखते थे उदाहरण स्वरूप नमाज़ से पूर्व, पवित्र होने के लिए वूज़ू करना आवश्यक है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम प्रतिदिन पांच बार लोगों के सामने वूज़ू करते थे किंतु फिर उनके बाद मुसलमानों में इस संदर्भ में मतभेद उत्पन्न हो गये जो आज भी जारी हैं तो फिर इस्लाम के जटिल व महत्वपूर्ण विषयों के बारे में स्वाभाविक है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के गहन मतभेद उत्पन्न हो जाएं

    इन बातों के दृष्टिगत यह तो स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम उसी समय एक सर्वव्यापी धर्म के रूप में मानव जीवन के कल्याण को सुनिश्चित कर सकता है कि जब स्वयं धर्म में समाज के आवश्यक व महत्पूर्ण हितों की रक्षा की व्यवस्था की गयी हो अर्थत उन हितों की रक्षा का कोई प्रबंध हो जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के बाद ख़तरे में पड़ गये थे और इसका केवल एक ही मार्ग है और वह, एक योग्य उत्तराधिकारी के निर्धारण के अतिरिक्त कुछ नहीं हो सकता। एक एसा उत्तराधिकारी जिस के पास ईश्वरीय ज्ञान हो ताकि वह धर्म की वास्तिवकता को उसके समस्त आयामों के साथ स्पष्ट कर सके किंतु इसके लिए उसका पापों और ग़लतियों से दूर होना भी आवश्यक है क्योंकि यदि एसा न होगा तो फिर उसके आदेशों पर भी संदेह व शंका की जाएगी।

    निष्कर्ष यह निकला कि ईश्वरीय दूतों के क्रम का समापन उस समय ईश्वरीय कृपा के अनुकूल होगा जब उसके बाद पवित्र मार्गदर्शकों की तैनाती भी हो जाए जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के भांति हों सिवाए इसके कि वे ईश्वरीय दूत न हों। किंतु सुन्नी समुदाय में यह नहीं माना जाता बल्कि उनका मानना है कि लोग अपने लिए मार्गदर्शक का निर्धारण करते हैं और यदि कोई बलपूर्वक भी समाज के संचालन के पद को प्राप्त कर ले तो भी वह इमाम और मार्गदर्शक बन जाता है और उसकी आज्ञापालन आवश्यक हो जाती है।

    इस चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं:

    • शीआ और सुन्नी मुसलमानों के मध्य मूल रूप से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकार को लेकर अन्तर है जो बाद में बहुत से अन्य प्रकार के अलगाव का कारण बना है।

    • शीआ समुदाय का मानना है कि ईश्वरीय दूतों की भांति ही पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकारी की ईश्वर द्वारा पुष्टि आवश्यक है और इसी प्रकार से उसका पापों और ग़लतियों से पवित्र रहना भी आवश्यक है।

    • यदि कोई धर्म यह कहता है कि वह सभी युगों के लिए है तो फिर लोगों के मार्गदर्शन की व्यवस्था भी एसी होनी चाहिए जो सभी युगों में उपयोगी हो और मार्गदर्शन का प्रयोजित क्रम कभी टूटना नहीं चाहिए।