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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-7 एवं 8 ज्ञान का सही मार्ग

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    पिछली चर्चा में यह बताया गया कि मनुष्य को ईश्वर तक पहुंचने के लिए सही मार्ग का चयन करना चाहिए और यह सही मार्ग है धर्म। अब प्रश्न यह उठता है कि जब मनुष्य धर्म तथा आयडियालोजी की मूल समस्याओं को समझना चाहता तो इसके लिए क्या मार्ग अपनाए? इस संदर्भ में किस प्रकार के ज्ञान और सूचनाओं को माध्यम बना? मानवीय ज्ञान को चार प्रकारों में बांटा गया है। एक है प्रयोगिक ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है, यह ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है। अर्थात मनुष्य आंखों से देखकर, कानों से सुनकर, त्वचा से छू कर, नाक से सूंघ कर और ज़बान से चख कर कुछ बातों की जानकारी प्राप्त करता है जबकि बुद्धि भी इस प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाती है। ज्ञान की दूसरी क़िस्म वो है जो बुद्धि और विवेक के प्रयोग से प्राप्त होती है। यह ज्ञान वस्तुतः वह निष्कर्ष है जो मानव बुद्धि निकालती है। उदाहरण स्वरूप यह निष्कर्ष निकालना कि दो धन दो बराबर चार होते हैं। इस प्रकार के ज्ञान को तर्क शास्त्र, दर्शन-शास्त्र तथा गणित जैसे विषयों में प्रयोग किया जाता है। तीसरे प्रकार का ज्ञान है अनुकरणीय ज्ञान। अर्थात कुछ सूत्रों और स्रोतों पर पूर्ण विश्वास के कारण मनुष्य उनकी बातों को सच मानता है और इस माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता है। ईश्वरीय धर्म के मानने वाले ईश्वरीय दूतों की बातों पर इसी प्रकार के ज्ञान के अंतर्गत विश्वास करते हैं और कभी कभी तो उनका विश्वास पहले की दो प्रकार के ज्ञानों से अधिक दृढ़ व ठोस होता है। ज्ञान की चौथी क़िस्म अंतर-दृष्टि के माध्यम से प्राप्त होती है। यह ज्ञान सबसे विश्वस्त ज्ञान है। इसमें किसी प्रकार की शंका और संदेह की गुंजाइश नहीं होती। किंतु यह बात जानना भी उचित होगा कि यह ज्ञान उसी को प्राप्त हो सकता है जिसकी आत्मा और मन पूर्ण रूप से पवित्र हो। अब हमें यह देखना है कि धर्म और आयडियालोजी के जो मूल विषय हैं उन्हें ज्ञान के इन चारों प्रकारों में से किसके माध्यम से समझा जा सकता है? और कौन सा ज्ञान इस मामले में दूसरे ज्ञानों से अच्छा है?प्रायोगिक गतिविधियों और क्रियाओं से प्राप्त होने वाला ज्ञान चूंकि सीमित होता है इसलिए इसके माध्यम से केवल भौतिक और सांसारिक वस्तुओं का ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और विज्ञान द्वारा विचारधारा के सिद्धान्तों की पहचान संभव नहीं है क्योंकि इस प्रकार के विषय भौतिक ज्ञान से परे हैं और कोई भी भौतिक ज्ञान इस संदर्भ में कुछ नहीं कह सकता। उदाहरण स्वरूप ईश्वर के अस्तित्व को किसी भी प्रकार से वैज्ञानिक मार्गों या प्रयोगशालाओं में परीक्षणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता। क्योंकि विज्ञान चाहे जितना विकास कर ले, सीमित ही रहेगा और वह किसी भी प्रकार से इस संसार से हटकर अर्थात भौतिकता से दूर किसी विषय के बारे में कुछ नहीं कह सकता। इस आधार पर वैज्ञानिक व भौतिक विचारधारा के जो अर्थ हमने बताए हैं उन अर्थों में केवल एक धोखा है और उसे वास्तव में विचारधारा नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह भौतिक वस्तुओं व अर्थों तक ही सीमित होता है। अधिक से अधिक उसे भौतिक संसार के ज्ञान का नाम दिया जा सकता है और यह ज्ञान विचारधारा के मूल विषयों पर बहस करने में सक्षम नहीं है। वो ज्ञान जो अनुसरण द्वारा प्राप्त होता है वह दूसरी श्रेणी का ज्ञान होता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुक हैं, इस प्रकार का ज्ञान जिसे अनुसरण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, उसकी प्राप्ति से पहले आवश्यक है कि जिसका अनुसरण किया जा रहा है उस पर पूर्ण विश्वास हो। अर्थात पहले किसी ईश्वरीय दूत अथवा पैग़म्बर की पैग़म्बरी और ईश्वरीय दूत होना सिद्ध हो ताकि उसके संदेश पर विश्वास किया जा सके। इससे पहले संदेश देने वाले अर्थात ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित होना आवश्यक है। स्पष्ट सी बात है कि ईश्वर के अस्तित्व को उसके भेजे हुए पैग़म्बरों और दूतों के कथनों से सिद्ध नहीं किया जा सकता। उदाहरण स्वरूप यह नहीं कहा जा सकता कि चूंकि क़ुरआन कहता है कि ईश्वर है इस लिए ईश्वर का अस्तित्व है बल्कि यह प्रक्रिया इसके विपरीत होगी। अर्थात सबसे पहले ईश्वर के अस्तित्व को तर्क व बुद्धि के आधार पर सिद्ध करना होगा फिर पैग़म्बरों के अस्तित्व को तथा क़ुरआन के अस्तित्व को सिद्ध करना होगा और जब यह सारी बातें सिद्ध हो जाएं तो पैग़म्बरों कथनों और क़ुरआन की शिक्षाओं का अनुसरण किया जा सकता है तथा इस मामले में सच्चे स्रोत के रूप में उस पर विश्वास करके उनका पालन किया जा सकता है किंतु मूल विषयों को दूसरे मार्गों से सिद्ध करना आवश्यक होगा। अर्थात ईश्वर है, इसके प्रमाण में यह नहीं कहा जा सकता कि चूंकि क़ुरआन में कहा गया है और चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा है कि ईश्वर एक है इस लिए ईश्वर एक है बल्कि पहले उसके होने और फिर उसके अनन्य होने का ऐसा तर्क होना चाहिए जो क़ुरआन और ईश्वरीय दूतों के कथनों के अतिरिक्त हो। इस प्रकार यह बात स्पष्ट हो गई कि अनुकरणीय अर्थात विश्वस्त सूत्र की बात मानकर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता वह सृष्टि की वास्तविकता को समझने के लिए उपयोगी नहीं होगा और उसके द्वारा सृष्टि के बारे में विचारधारा नहीं बनाई जा सकती। ज्ञान प्राप्ति का आध्यात्मिक और तपस्या का जो मार्ग है जिसमें कुछ लोग तपस्या और साधना के माध्यम से सफल हैं उसके संदर्भ में कहना चाहिए कि यह सबके लिए संभव नहीं है।आज की चर्चा का सारांश इस प्रकार हैः सृष्टि के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए सबसे पहले ज्ञात प्रकारों और दृष्टिकोणों के बारे में जानना आवश्यक है किंतु यह भी निश्चित है कि हर प्रकार का दृष्टिकोण सृष्टि के बारे में पूर्ण जानकारी प्रदान नहीं कर सकता क्योंकि बहुत सी विचारधाराएं और ज्ञान केवल भौतिक तथ्यों तक सीमित होते हैं जबकि सृष्टि के संपूर्ण ज्ञान के लिए भौतिकता से परे ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। इस लिए सृष्टि के बारे में ज्ञान के लिए किसी भी ईश्वरीय दूत या ग्रंथ की शिक्षाओं को भी प्रमाण नहीं बनाया जा सकता क्योंकि सृष्टि की पहचान के बाद रचयिता की पहचान होती है और उसकी पहचान प्राप्त करने और उस पर आस्था के बाद उसके दूतों और ग्रंथों पर आस्था होती है और फिर उसकी शिक्षाएं अनुकरणीय बनती हैं। (जारी है)