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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-70

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    इससे पहले की चर्चा में यह बताया जा चुका है कि क़यामत का विषय आत्मा के विषय पर आधारित है अर्थात क़यामत की सही रूप से कल्पना, आत्मा की कल्पना और उसे समझे बिना संभव नहीं है। पिछली चर्चा में जो कुछ हमने कहा उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रत्येक मनुष्य के पास भौतिक शरीर के अतिरिक्त, एक ग़ैर भौतिक तथा शरीर से अलग, तत्व भी होता है जिसके कारण शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी उसे मनुष्य कहा जाता है और यदि एसा न हो तो फिर मरने और शरीर के नष्ट हो जाने के बाद क़यामत के दिन उसी व्यक्ति का पुनर्जीवन संभव नहीं होगा किंतु इस विषय को सिद्ध करने के लिए हम अपनी चर्चा को अधिक व्यापक कर रहे हैं। प्राचीन काल से ही दर्शनशास्त्री व बुद्धिजीवी आत्मा के बारे में अत्याधिक चर्चा करते आए हैं और विशेषकर इस्लामी दार्शनिकों ने इस विषय पर बहुत अधिक ध्यान दिया है किंतु स्पष्ट है कि हम अपने इस कार्यक्रम में आत्मा पर दार्शनिक चर्चा का विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं कर सकते बस संक्षेप में आत्मा के बारे में चर्चा के रूप में यही कहेंगे कि हम अपनी त्वचा के रंग और शरीर को अपनी आंख से देखते हैं और त्वचा को छू कर उसकी नर्मी या खुरदुरेपन का आभास कर सकते हैं तथा यह भी है कि हम हाथ लगा कर शरीर के भीतर होने वाले बहुत सी क्रियाओं का पता लगा सकते हैं। अर्थात हमारे पास जो इंद्रियां हैं हम उनकी सहायता से बहुत सी चीज़ों को समझ और उनके बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं किंतु बहुत सी एसी चीज़े भी हैं जिन्हें हम इन्द्रियों की सहायता के बिना भी समझ सकते हैं। उदाहरण स्वरूप क्रोध, भय, प्रेम, घृणा, संकल्प तथा विचार वह चीज़े हैं जिनका हमें ज्ञान होता है किंतु इसमें हमारी विदित रूप से इंद्रियां कोई भूमिका नहीं निभातीं अर्थात हमारे भीतर क्रोध है, प्रेम है, या हम जब किसी काम का इरादा करते हैं तो इन बातों को समझने के लिए हमें न किसी वस्तु को स्पर्ष करने की आश्यकता है न, सूंघने की, न सुनने की और न ही चखने की। इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि मनुष्य किसी भी वस्तु के होने या न होने को समझने के लिए दो प्रकार के साधनों का प्रयोग करता है। एक वह साधन जो विदित रूप से नज़र आते हैं और जिन्हें हम इन्द्रियां कहते हैं किंतु कुछ ज्ञान एसे हैं जिनके लिए इन इन्द्रियों की आवश्यकता नहीं होती किंतु इस संदर्भ में एक बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि विदित रूप से इन्द्रियों द्वारा प्राप्त किये गये ज्ञान में ग़लती की संभावना होती है। उदारहण स्वरूप हमारी नज़रे, धोखा खा सकती हैं, हम सूघं कर किसी वस्तु का पता लगाने में ग़लती कर सकते हैं, सुनने में हमसे ग़लती हो सकती है, स्पर्श के साथ भी हो सकता है हम किसी वस्तु के बारे में सही ज्ञान प्राप्त न कर पाएं। किंतु ज्ञान का दूसरा साधन जो है और जिस शक्ति की सहायता से हम यह समझते हैं कि हमारे भीतर क्रोध है, या प्रेम है या कोई काम करने का विचार है वह साधन कभी ग़लती नहीं करता। अर्थात यह तो संभव है कि कोई अपनी त्वचा देखे और यह सोचे कि मेरी त्वचा का वही रंग है जो मैं सोच रहा हूं या कोई अन्य रंग किंतु यह संभव नहीं है कि कोई यह सोचे कि मैंने अमुक काम करने का निर्णय लिया है या नहीं या मेरे मन में प्रेम है या घृणा। इस प्रकार से यह सिद्ध हुआ कि इस साधन द्वारा प्राप्त किया गया ज्ञान वास्तविक, शंका रहित और ठोस होता है और इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता है।

    हम सब जानते हैं कि हमारे भीतर एक एसी चीज़ है जिसे हम “मैं” कहते हैं। हम उसी मैं से संबंधित होते हैं और अपने हर वस्तु को उसी से संबंधित बताते हैं। हम कहते हैं मेरा शरीर, मेरा मन, मेरा ह्रदय मेरा मस्तिष्क किंतु प्रश्न यह है कि मैं से आशय किया है। यदि शरीर है तो फिर मेरा शरीर कहते समय हमारा क्या आशय होता है? निश्चित रूप से यह प्रश्न उठता है कि यह मैं वही भौतिक व महसूस किया जाने वाले शरीर है और सारी मनोस्थतियां व भावनाएं उसकी विशेषताएं हैं या यह कि उन का अस्तित्व शरीर के अस्तित्व से अलग है भले ही यह मैं शरीर से अत्याधिक निकट हो?

    इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि सब से पहली बात तो यह है कि मैं साक्षात ज्ञान द्वारा सीधे रूप से महसूस किया जाता है अर्थात इस मैं के बारे में हमारा ज्ञान इन्द्रियों पर निर्भर नहीं होता बल्कि हम इसे सीधे रूप से महसूस करते हैं और इसके होने में किसी प्रकार की शंका नहीं करते। पिछली चर्चा में हमने एकता के मापदंड की जो बात की थी वह यही मैं या आत्मा है कि जिससे हम अपने आप को संबंधित बताते हैं। शरीर के अंग कोशिकाओं में टूट फूट से बदलते रहते हैं किंतु यह मैं नहीं बदलता इस प्रकार से न बदलने का कारण वास्तव में यह है कि यह मैं या आत्मा भौतिक नहीं होती क्योंकि बदलाव भौतिक वस्तुओं में होता है। इसी प्रकार इस मैं का विभाजन संभव नहीं है अर्थात इसे आधा या कई भागों में बांटा नहीं जा सकता किंतु शरीर को और शरीर के अंगों को आधा किया जा सकता है और कई भागों में बांटा जा सकता है।

    इस प्रकार से हम देखते हैं कि हमारे भीतर जो मैं है वह हमारे भीतर होते हुए भी हमारी शारीरिक विशेषताओं से भिन्न है और भौतिक वस्तुओं की जो विशेषताएं होती हैं उनमें से कोई भी विशेषता हमारे भीतर मौजूद मैं अर्थात आत्मा में नहीं होती। इसी लिए यह सिद्ध होता है कि हमारी आत्मा यद्यपि शरीर से जुड़ी है किंतु दोनों में अत्याधिक भिन्नता है और दोनों में एक दूसरे की कोई विशेषता पायी नहीं जाती किंतु उसके बाद भी एक दूसरे से जुड़ी हैं और यह जुड़ा हुआ होना कदापि इस बात का प्रमाण नहीं है कि आत्मा भी शरीर की भांति नश्वर और नष्ट हो जाने वाली है। तो जब यह समझ लिया गया कि आत्मा शरीर की विशेषता नहीं रखती बल्कि भौतिकता से ही परे है तो फिर यह भी सिद्ध होता है कि वह शरीर की भांति नष्ट नहीं होगी और जब यह विषय समझ लिया गया तो फिर एक दिन हिसाब किताब के होने और क़यामत के बारे में विश्वास की वास्तविकता को किसी सीमा तक समझा जा सकता है। अगले कार्यक्रम में हमारी चर्चा जारी रहेगी फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः

    हमारे पास जो इंद्रियां हैं हम उनकी सहायता से बहुत सी चीज़ों को समझ और उनके बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं किंतु बहुत सी एसी चीज़े भी हैं जिन्हें हम इन्द्रियों की सहायता के बिना भी समझ सकते हैं।उदाहरण स्वरूप क्रोध, भय, प्रेम, घृणा, संकल्प तथा विचार हमारी आत्मा यद्यपि शरीर से जुड़ी है किंतु दोनों में अत्याधिक भिन्नता है और दोनों में एक दूसरे की कोई विशेषता पायी नहीं जाती किंतु उसके बाद भी एक दूसरे से जुड़ी हैं और यह जुड़ा हुआ होना कदापि इस बात का प्रमाण नहीं है कि आत्मा भी शरीर की भांति नश्वर और नष्ट हो जाने वाली है इस लिए आत्मा नष्ट नहीं होगी और इस प्रकार क़यामत के दिन हिसाब किताब को किसी सीमा तक समझा जा सकता है।