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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 71

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    हमने अपनी चर्चा के आरंभ में बताया था कि क़यामत पर विश्वास और हर मनुष्य का क़यामत व प्रलय के दिन जीवित होना, समस्त ईश्वरीय धर्मों में एक महत्वपूर्ण विश्वास रहा है और ईश्वरीय दूतों ने इस विश्वास व विचार पर अत्याधिक बल दिया है तथा इस विचार व विश्वास को लोगों के मन में बिठाने के लिए, बहुत से दुखों और बहुत सी समस्याओं का सामना किया।

    इस संदर्भ में जब हमने चर्चा आरंभ की थी तो यह भी बताया था कि क़यामत की सही कल्पना उस आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करने पर आधारित है जो हर मनुष्य की पहचान और उसके व्यक्तिव में एकता का मापदंड हो और मृत्यु के बाद भी बाक़ी रहे ताकि यह कहा जा सके कि जो व्यक्ति इस संसर से गया है वही पुनः परलोक में जीवित होगा। क्योंकि यदि हम यह नहीं मानेंगे तो फिर दंड व प्रतिफल व पारितोषिक की पूरी व्यवस्था की संदिग्ध हो जाएगी।

    इसके बाद हम ने इस प्रकार की आत्मा की उपस्थिति को बुद्धि द्वारा प्रमाणित किया ताकि यह सिद्ध हो सके कि मनुष्य कोई एसा जीव नहीं है जो इस संसार में आया और फिर यहीं उसका अंत हो जाए बल्कि वह हरने वाला अस्तित्व है और उसका अस्तित्व उसके नश्वर शरीर पर ही निर्भर नहीं है। किंतु अब हम यह चर्चा आरंभ कर रहे हैं कि किस प्रकार से यह प्रमाणित किया जा सकता है कि परलोक है और मनुष्य परलोक में पुनः जीवित होगा। ईश्वर से पहचान संबंधी चर्चा में हमने यह स्पष्ट किया था कि ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना, निर्रथक व लक्ष्यहीन नहीं है बल्कि भलाई व परिपूर्णता के मुख्य स्रोत के रूप में ईश्वर ने इस संसार की रचना कुछ इस प्रकार से की है कि यथासंभव भलाई व परिपूर्णता को सुनिश्चित बनाया जा सके । इस प्रकार से इम ने ईश्वर के लिए तत्वदर्शिता के गुण को प्रमाणित किया कि जिस के लिए यह आवश्यक था कि वह अपनी रचनाओं को , उस परिपूर्णता व भलाई तक पहुंचाए जिस की योग्यता उनमें है। किंतु चूंकि भौतिक संसार में बहुत सी वस्तुओं में परस्पर टकराव होता है और भौतिक वस्तुओं की भलाईयां व परिपूर्णताएं एक दूसरे से टकराव रखती हैं इस लिए ईश्वर की तत्वदर्शिता व ज्ञान के लिए आवश्यक है कि वह रचनाओं को कुछ इस प्रकार से व्यवस्थित करे कि सामूहिक रूप से अधिक से अधिक भलाई उन तक पहुंचे और अधिक से अधिक उनके सामूहिक हितों की रक्षा हो सके।

    दूसरे शब्दों में विश्व की व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ हो। इसी लिए तत्वों के प्रकार संख्या, मात्रा, क्रिया, प्रतिक्रिया तथा गतिशीलता को कुछ इस प्रकार से बनाया जाना आवश्यक था कि पेड़ पौधे पशुओं और मनुष्य की रचना की भूमिका प्रशस्त हो कि जो इस संसार का सब से अधिक परिपूर्ण अस्तित्व है और यदि भौतिक संसार को कुछ इस प्रकार से बनाया गया होता कि उस में प्राणियों का जन्म व विकास संभव न होता तो यह स्थिति ईश्वरीय कृपा व ज्ञान के विपरीत होती। अधिक स्पष्ट रूप से हम यह कहेंगे कि ईश्वर ने जो यह संसार बनाया है तो फिर उसके ज्ञान व कृपा के दृष्टिगत यह आवश्यक था कि वह एसा संसार बनाए जिसमें सारे अस्तित्वों के सामूहिक हितों की रक्षा हो सके इस लिए यह हम यह देखते हैं कि इस व्यवस्था से किसी विशेष प्राणी या किसी विशेष वर्ग को हानि होती है तो भी हमें यह समझ लेना चाहिए कि रचनाओं में विभिन्नता व विविधता के कारण सामूहिक हित की रक्षा के लिए आंशिक हानि महत्वहीन होती होती है और यदि आंशिक हानि सहन करके सामूहिक हित की रक्षा हो सकती है तो फिर आंशिक हानि का महत्व नहीं रह जाता। ठीक उस प्रकार से जैसे मनुष्य के हाथ में यदि कोई एसा रोग हो जाए जिससे पूरे शरीर के लिए ख़तरा उत्पन्न हो जाए तो फिर हाथ काट दिया जाता है और पूरे शरीर की रक्षा के मार्ग में यह आंशिक हानि महत्वहीन हो जाती है। इस संसार की घटनाएं भी एसी ही हैं बहुत से परिवर्तन एसे होते हैं जिनसे बहुत से लोगों को हानि होती है किंतु यदि उन पर ध्यान दिया जाए तो समझ में आ जाता है कि सामूहिक रूप से उन घटनाओं से इस धरती व और इस व्यवस्था को लाभ पहुंचता है। इस लिए हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि ईश्वर ज्ञानी है, तत्वदर्शी है और वह सामूहिक हितों की रक्षा करने वाली व्यवस्था ही इस संसार पर लागू करता है क्योंकि यदि एसा न हो तो फिर उसके ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा । यदि हम यह मानते हैं कि ईश्वर ज्ञानी है तो फिर हमें यह भी मानना होगा कि उसने इस संसार की जो व्यवस्था बनायी है वह सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यह बात बुद्धिमत्ता नहीं है कि वह सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था का ज्ञान रखने के बावजूद संसार के लिए एसी व्यवस्था का चयन करे जो सर्वश्रेष्ठ न हो। क्योंकि यह इसी प्रकार है जैसे हम कहें कि किसी इंजीनियर ने बड़े चाव से एक घर का डिज़ाइन बनाना चाहा किंतु अत्याधिक लगाव व चाह से बनाने के बावजूद उसने जो डिज़ाइन बनाया वह उसका सब से अच्छा डिज़ाइन नहीं था और वह उससे अच्छा डिज़ाइन बनाना जानता था किंतु उसने बनाया नहीं । ईश्वर के लिए हम यह नहीं मान सकते क्योंकि ईश्वर कृपालु है और कृपा के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त यह होती है कि कृपा पूरी तरह से हो तभी वह सही अर्थों में कृपा होगी ठीक उसी प्रकार से जैसे आप किसी निर्धन भूखे को खाना खिलाना चाहते हैं तो यदि आप एसा फैसला करते हैं तो आप के लिए आवश्यक है कि आप उसे पेट भर खाना दें अन्यथा आधा पेट खिलाकर यद्यपि आपने उसके साथ दयापूर्ण व्यवहार किया है किंतु उसे आपकी सम्पूर्ण कृपा नहीं कहा जा सकता। ईश्वर कोई भी काम अधूरा नहीं करता बल्कि वह जो भी काम करता है उसे पूरे रूप में करता है इस लिए हमारे लिए यह मानना आवश्यक है कि उसने इस संसार की रचना की तो उसे वही रूप दिया जिससे बेहतर रूप संभव नहीं था और इस संसार व सृष्टि के लिए जो उसने व्यवस्था निर्धारित की वह इस संसार की संभावनाओं को देखते हुए उसके लिए सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है। अब जब यह बात स्पष्ट हो गयी कि इस संसार को और उसमें जो व्यवस्था है उसे सर्वश्रेष्ठ रूप में बनाया गया है और यह भी स्पष्ट हो गया कि आत्मा इस शरीर के साथ नष्ट नहीं होती तो फिर प्रश्न यह उठता है कि इस संसार की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था के साथ रचना करने वाले ईश्वर ने, शरीर के बाद रह जाने वाली आत्मा के लिए क्या व्यवस्था की है। इस पर हम अपने अगले आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः • आत्मा शरीर के साथ ख़त्म नहीं होती बल्कि वह भौतिकता से दूर होने के कारण भौतिक विशेषताओं से भी दूर होती है अर्थात उसका अन्त नहीं होता तो

    • जब यह स्पष्ट हो गया कि आत्मा का अंत नहीं होता तो फिर यह प्रश्न उठता है कि उसका क्या होगा, यह प्रश्न इस लिए भी उठता है क्योंकि हमारा यह मानना है कि ईश्वर ने इस संसार को सर्वश्रेष्ठ रूप में बनाया है और इसके लिए सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था का चयन किया है।