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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 72

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    हमारी चर्चा यहां तक पहुंची थी कि ईश्वर ने मनुष्य और इस सृष्टि के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था का चयन किया है तो फिर सदैव रहने वाली आत्मा के लिए क्या व्यवस्था की है? वास्तव में मनुष्य बाक़ी रहने वाली आत्मा का स्वामी होता है और कभी समाप्त न होने वाली परिपूर्णता को प्राप्त करने की योग्यता रखता है। अर्थात मनुष्य को ईश्वर ने एसा बनाया है कि वह बहुत ऊंचे चरण पर पहुंच सकता है और एसी क्षमताएं व योग्यताएं तथा सुखों का स्वामी बन सकता है जिनकी तुलना इस संसार के सुखों व सुविधाओं से नहीं की जा सकतीं तो अब यदि हम यह मान लें कि इस प्रकार की क्षमताओं व संभावनाओं का स्वामी मनुष्य अपने शरीर के साथ ही ख़त्म हो जाता है तो फिर इस बात के दृष्टिगत कि हम यह मान चुके हैं कि ईश्वर ने इस संसार के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था की रचना की है, यह बात बुद्धिमत्ता के अनुकूल नहीं होगी और न ही ईश्वरीय ज्ञान व कृपा से मेल खाएगी। इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि सांसारिक जीवन बहुत से दुखों, समस्याओं व कठिनाइयों के साथ होता है और प्रायः कोई भी सुख व आनन्द बहुत से दुखों व कठिनाइयों को सहन किये बिना प्राप्त नहीं होता अर्थात संसार का कोई भी सुख, यदि ध्यान दिया जाए तो , शुद्ध सुख नहीं होता बल्कि हर दुख दुख से जुड़ा होता है क्योंकि सुख दुख के बाद और सुख के बाद दुख होता है इस लिए यदि यही संसार सब कुछ होता और इसके बाद कुछ न होता तो बुद्धिमान मनुष्य सोच विचार के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि क्षणिक सुख के लिए लंबे समय तक दुख सहन करने का कोई अर्थ नहीं है बल्कि यह बुद्धिमत्ता नहीं है कि मनुष्य एक दिन के सुख के लिए उदाहरण स्वरूप दस दिनों तक दुख सहे और यदि अध्ययन किया जाए तो यह बात सिद्ध हो जाएगी कि बहुत से लोग इस निर्थरकता के आभास में ग्रस्त हो जाते हैं और चूंकि उन्हें परलोक में विश्वास नहीं होता इस लिए उन्हें अपना जीवन संसार सब कुछ निरर्थक और खोखला लगने लगता है और एसे लोग स्वाभाविक जीवन की लालसा रखने के बावजूद आत्महत्या कर लेते हैं। वास्तव में यदि मनुष्य का जीवन इस के अतिरिक्त कुछ नहीं होता कि वह निरंतर परिश्रम करे और प्राकृतिक व सामाजिक समस्याओं से जूझता रहे ताकि कुछ क्षण सुख व आंनद के प्राप्त कर सके और फिर थकन से चूर होकर सो जाए ताकि जब उसका शरीर पुनः गतिविधियों के लिए तैयार हो जाए तो फिर वहीं सब कुछ। अर्थात फिर से काम करे, परिश्रम करे सुख भोगे और फिर सो जाए। उदारहण स्वरूप मनुष्य एक रोटी पाने के लिए मेहनत करे ताकि उसे खाकर कुछ देर आनंद का आभास करे और बस तो निश्चित रूप से बुद्धि इस प्रकार के दुखदायी व थका देने वाले व उबा देने वाले क्रम को किसी भी दशा में स्वीकार नहीं करेगी क्योंकि यह निर्रथकता व खोखलेपन का प्रदर्शन होगा और यह सही नहीं है। इस का सब से अच्छा उदाहरण यह है कि कोई कार चालक परिश्रम करे और मेहनत से एक पेट्रोल पंप तक उसे ले जाए ताकि उसकी टंकी में पेट्रोल भर सके ताकि उस पेट्रोल से वह अपनी कार चला कर अगले पेट्रोल पंप तक कार ले जा सके ताकि वहां फिर से पेट्रोल भरना संभव हो और वहां पहुंचने के बाद फिर यही काम करे और यह काम उस समय तक करता रहे जब तक कि उसकी कार पुरानी होकर टूट न जाए। तो निश्चित रूप से यह काम बुद्धि के अनुरुप नहीं होगा और मूर्खता व निर्रथकता होगा। मनुष्य की दशा भी एसी है अर्थात यदि हम यह समझें कि मनुष्य इस संसार में केवल इस लिए है ताकि वह शरीर को थकाए ताकि उसे सुख दे सके और उसे सुख दे ताकि फिर से थकाने के लिए उसमें शक्ति उत्पन्न हो तो फिर निश्चित रूप से मनुष्य यदि अपनी इस स्थिति पर विचार कर लेगा तो उसके मन में खोखलापन पैदा हो जाएगा दूसरी ओर मनुष्य की एक मुख्य प्रवृत्ति व इच्छा अमरत्व है। अर्थात हर मनुष्य चाहता है कि वह सदा रहे और यह एसी इच्छा व चाह है जो हर मुनष्य के अस्तित्व में निहित है और वास्तव में यह इच्छा उस अत्याधिक शक्तिशाली ऊर्जा की भांति है जो मनुष्य को अनन्नता व अमरत्व की ओर बढ़ाती है और दिन प्रतिदिन उसमें तेज़ी आती जाती है अब यदि यह मान लिया जाए कि मनुष्य की इस इच्छा और इस यात्रा का परिणाम बस यही है कि गति की चरम सीमा पर वह किसी चट्टान से टकरा कर बिखर जाए तो क्या इस प्रकार की इच्छा व ऊर्जा को इसी के लिए उत्पन्न करना उचित होगा।? अर्थात हम यह मान चुके हैं कि ईश्वर ज्ञानी है, तत्वदर्शी है और किसी भी वस्तु को उसने निर्रथक नहीं बनाया है अब यदि उसने मनुष्य के मन में सदैव रहने की इच्छा बनायी है और वह भी इतनी सशक्त इच्छा कि जो मनुष्य को, हर काम पर तैयार करने की क्षमता रखती है तो फिर यह सोचना सही नहीं होगा कि इस प्रकार की शक्तिशाली ऊर्जा का उद्देश्य कुछ नहीं है बल्कि ईश्वर ने मनुष्य के अस्तित्व में यूंही यह इच्छा उत्पन्न कर दी है। इस प्रकार से हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि ईश्वरीय कृपा व तत्वदर्शिता तथा मनुष्य के लिए अनन्त जीवन की संभावना जैसे दो विषयों के मिलाकर यदि देखा जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि इस सीमित संसारिक जीवन के बाद मनुष्य के लिए एक अन्य जीवन का होना आवश्यक है ताकि सदैव रहने वाली आत्मा का वह ठिकाना बने और इस संसार में जीवन तथा दुख सुख का एक उद्देश्य हो सके और मानव जीवन में अन्तहीन क्रम और महत्वहीन निर्रथकता न उत्पन्न होने पाए। इस बात को अधिक स्पष्ट करते हुए हम यह कहेंगे कि मनुष्य इस सृष्टि में ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है और उसमें सदा रहने की इच्छा है इसके साथ ही चूंकि हम ईश्वर को ज्ञानी मानते हैं इस लिए हमारे लिए यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि वह हर काम सही रूप से करता है और उसे अंतिम चरण तक पहुंचाता है तो फिर यदि मनुष्य में परिपूर्णता और अतरत्व प्राप्त करने की क्षमता उसने बनायी है तो फिर उसे कोई एसी व्यवस्था भी करना होगी जो जिनके अंतर्गत मनुष्य यदि चाहे तो अमरत्व तक पहुंच सके और यदि ईश्वर एसा नहीं करता तो इसका अर्थ यह होगा कि उसने अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना के लिए सर्वश्रेष्ठ परिमाण व लक्ष्य नहीं रखा यद्यपि वह यदि चाहता तो एसा कर सकता था किंतु ईश्वर के लिए हम यह नहीं सोच सकते क्योंकि हम पहले की चर्चाओं में यह सिद्ध कर चुके हैं कि ईश्वर सर्वश्रेष्ठ काम करता है। इस विषय पर हमारी चर्चा जारी रहेगी फिलहाल आज की हमारी चर्चा के मुख्य बिन्दुःसांसारिक जीवन बहुत से दुखों, समस्याओं व कठिनाइयों के साथ होता है संसार का कोई भी सुख, शुद्ध सुख नहीं होता बल्कि हर दुख दुख से जुड़ा होता है इस लिए यदि यही संसार सब कुछ होता और इसके बाद कुछ न होता तो बुद्धिमान मनुष्य सोच विचार के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि क्षणिक सुख के लिए लंबे समय तक दुख सहन करने का कोई अर्थ नहीं है और वह निर्रथकता का शिकार हो जाएगा। हर मनुष्य चाहता है कि वह सदा रहे और यह एसी इच्छा व चाह है जो हर मुनष्य के अस्तित्व में निहित है और वास्तव में यह इच्छा उस अत्याधिक शक्तिशाली ऊर्जा की भांति है जो मनुष्य को अनन्नता व अमरत्व की ओर बढ़ाती है अब यदि यह मान लिया जाए कि मनुष्य की इस कामना और इस यात्रा का परिणाम बस यही है कि गति की चरम सीमा पर वह किसी चट्टान से टकरा कर बिखर जाए तो इस प्रकार की इच्छा व ऊर्जा को इस उद्देश्य के लिए उत्पन्न करना ईश्वर के लिए उचित नहीं होगा ईश्वर ने मनुष्य में परिपूर्णता और अमरत्व प्राप्त करने की क्षमता बनायी है इस लिए उसे कोई एसी व्यवस्था भी करना होगी जिसके अंतर्गत मनुष्य यदि चाहे तो अमरत्व तक पहुंच सके और यदि ईश्वर एसा नहीं करता तो इसका अर्थ यह होगा कि उसने अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना के लिए सर्वश्रेष्ठ परिमाण व लक्ष्य नहीं रखा।