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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 73

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    पिछले चर्चा में हमने परलोक को सिद्ध करने का प्रयास किया था अर्थात यह प्रमाणित करने का प्रयास किया था कि मनुष्य का जीवन यहीं पर और इसी संसार में समाप्त नहीं होता है बल्कि इस जीवन के बाद भी एक जीवन और इस लोक के बाद भी एक लोक है। इसके लिए हमने अपनी चर्चा में ईश्वर की तत्वदर्शिता व मनुष्य में अमरत्व प्रेम की ओर संकेत किया था इसके बाद हम यह बताना चाहेंगे कि इस संसार में मनुष्य अच्छे व बुरे कर्मों के चयन के मामले में स्वतंत्र है एक ओर कुछ एसे लोग होते हैं जो अपने पूरे जीवन ईश्वर की उपासना करते हैं, अच्छे कर्म करते हैं लोगों की सहायता करते हैं और भलाई ही करते हैं तथा हर प्रकार की बुराई से दूर रहते हैं और इस काम के कारण और यह मार्ग अपनाने के कारण जीवन के बहुत से सुखों से वंचित रहते हैं और बहुत सी कठिनाइयां सहन करते हैं। इसके साथ ही कुछ एसे लोग भी होते हैं जो बुरे कर्म करते हैं और उन्हें बुरे कर्म करने में तनिक भी संकोच नहीं होता और हर वह काम करते हैं जिससे लोगों को पीड़ा पहुंचे। इस प्रकार से वह अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए बुरा मार्ग अपनाते हैं और इसके बावजूद सुख उठाते हैं और जिन्हें सताते हैं वह उनके अत्याचार भी सहते हैं और अन्य आयामों से भी दुख उठाते हैं। वास्तव में यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस संसार में जो भले बुरे मार्ग ईश्वर ने मनुष्य के समाने खोले हैं और उसमें भलाई व बुराई की इच्छा व कामना उत्पन्न की है , उसे ज्ञान प्रदान किया है, भलाई व बुराई की पहचान दी है तो इन सब का उद्देश्य यही है कि इस संसार में मनुष्य की हर पहलु और हर कोण से परीक्षा ली जाए ताकि वह अपनी परिपूर्णता का मार्ग अपने अधिकार व चयन शक्ति के बल पर चुने और अपने कर्मों का फल प्राप्त कर सके और यदि ध्यान दिया जाए तो मनुष्य का पूरा जीवन एक परीक्षा है किंतु इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य गहरायी से चिंतन करे। जैसाकि हमने कहा इस संसार में भलाई व बुराई करने वाले असंख्य लोग हैं किंतु इन लोगों का जीवन उनके कर्मों के अनुसार नहीं होता अर्थात भले व बुरे को उनके कर्मों के अनुसार पुरस्कार या दंड नहीं मिलता और बहुत से एसे लोग जो बड़े बड़े पाप करते हैं, लोगों पर अत्याचार करते हैं वह इस संसार में सुखी जीवन व्यतीत करते हैं और उन्हें किसी प्रकार का सांसारिक दुख नहीं होता और इसी प्रकार हम यह भी देखते हैं कि बहुत से भले लोग एसे होते हैं जो सब के साथ भलाई करते हैं कभी किसी को दुख नहीं पहुंचाते किंतु उनकी अपना जीवन दुखों से भरा होता है। इस प्रकार से यदि हम ध्यान दें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह संसार कर्मों के फल का स्थान नहीं हो सकता क्योंकि यदि यह संसार कर्मों के फल का स्थान होता तो फिर पीड़ित व शोषित दुख में और अत्याचारी व शोषणकरने वाले सुख में न रहता। इसके साथ यह भी एक तथ्य है कि संसार की व्यवस्था और परिस्थितियां एसी नहीं हैं कि जहां कर्मों का सही और वास्तविक फल या दंड दिया जाए अर्थात इस संसार में एसा संभव ही नहीं है। उदाहरण स्वरूप यदि किसी ने लाखों निर्दोषों की हत्या की तो उसे उसके इस अपराध का दंड क्या दिया जा सकता है? स्पष्ट है उसके लिए सब से कड़ा दंड यही होगा कि उसे मृत्यु दंड दे दिया जाएगा किंतु यदि किसी ने एक व्यक्ति की हत्या की है तो उसे भी मृत्यु दंड दिया जाएगा इस प्रकार दंड की दृष्टि से एक व्यक्ति की हत्या करने वाला और लाखों लोगों को मौत के घाट उतारने वाले को दिया जाने वाला दंड एक ही होता है। इसी प्रकार बहुत सी भलाईयां एसी होती हैं जिनका किसी भी प्रकार से इस संसार में वास्तविक पुरस्कार नहीं दिया जा सकता इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि कर्मों के प्रतिफल का इस संसार के अतिरिक्त कोई अन्य स्थान होना चाहिए जहां कर्मों का वास्तविक फल मिले क्योंकि यह संसार परीक्षा स्थल है पुरुस्कार की जगह नहीं। भले व बुरे कर्मों के प्रतिफल के बारे में एक विषय यह भी ध्यान योग्य है कि भले कर्म और बुरे कर्म के सही मापदंड का इस संसार में ज्ञान नहीं हो सकता अर्थात कर्म का महत्व उसके प्रभाव पर निर्भर होता है एसा बहुत होता है कि बड़ी नज़र आनी वाली बुराई का प्रभाव साधारण और साधारण नज़र आने वाली बुराई का प्रभाव अत्याधिक व्यापक हो। इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि साधारण नज़र आने वाली भलाई का प्रभाव अत्याधिक व्यापक और गहरा हो और दिखने में बहुत बड़ी भलाई प्रभाव की दृष्टि से साधारण हो। इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि इस संसार में कोई भी अच्छे और बुरे काम से वास्तविक महत्व व प्रभाव का पता नहीं लगा सकता क्योंकि संसार में विदित चीज़ों को देखा जाता है इसी लिए किसी एसे स्थान का होना आवश्यक है जहां इन सब कर्मों का सही मूल्य आंका जाए और उस पर दंड या पारितोषित दिया जाए। और यह एसी ही स्थान पर हो सकता है जो इस संसार से अलग हो अर्थात सांसारिक विशेषताएं उस में न हो और जहां कर्मों को आकंने वाला भी ईश्वर जैसा सर्वशक्तिमान व सर्वज्ञानी हो। चर्चा मुख्य बिन्दुः • इस संसार में जो भले बुरे मार्ग ईश्वर ने मनुष्य के समाने खोले हैं और उसमें भलाई व बुराई की इच्छा व कामना उत्पन्न की है , उसे ज्ञान प्रदान किया है, भलाई व बुराई की पहचान दी है तो इन सब का उद्देश्य यही है कि इस संसार में मनुष्य की हर पहलु और हर कोण से परीक्षा ली

    • इस संसार में भलाई व बुराई करने वाले असंख्य लोग हैं किंतु इन लोगों का जीवन उनके कर्मों के अनुसार नहीं होता अर्थात भले व बुरे को उनके कर्मों के अनुसार पुरस्कार या दंड नहीं मिलता और बहुत से एसे लोग जो बड़े बड़े पाप करते हैं, लोगों पर अत्याचार करते हैं वह इस संसार में सुखी जीवन व्यतीत करते हैं और उन्हें किसी प्रकार का सांसारिक दुख नहीं होता

    • इस प्रकार से यदि हम ध्यान दें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह संसार कर्मों के फल का स्थान नहीं हो सकता क्योंकि यदि यह संसार कर्मों के फल का स्थान होता तो फिर पीड़ित व शोषित दुख में और अत्याचारी व शोषण करने वाले सुख में न रहता।