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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 75

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    अब तक की चर्चाओं में हमने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि क़यामत है अर्थात एक एसा दिन है जब लोगों से उनके कर्मों का हिसाब लिया जाएगा और उसके बाद अच्छे और बुरे कर्मों का बदला दिया जाएगा आज हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि यह जो परलोक कहा जाता है यह क्या है? चर्चा का आरंभ हम एक भूमिका से कर रहे हैं। वास्तव में मनुष्य जिन विषयों के बारे में अनुभव नहीं रखता और न ही उन के बारे में उसे किसा प्रकार का विश्वस्त ज्ञान होता है न ही उसे इन्द्रियों द्वारा महसूस किया होता है तो वह एसे विषयों की पूर्ण पहचान प्राप्त नहीं कर सकता। इस बात के दृष्टिगत यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि परलोक की वास्तविकता तथा वहां घटने वाली घटनाओं को हम पूर्ण रूप से जान सकते हैं और उनकी वास्तविकताओं को पूर्ण रूप से समझ सकते हैं बल्कि हमें केवल उन्हीं विशेषताओं पर संतोष करना होगा जिसे हम बुद्धि व ईश्वरीय संदेशों द्वारा जानते हैं तथा हमें चाहिए कि स्वंय को दुस्साहस से दूर रखें।परलोक के बारे में विभिन्न लोगों की विभिन्न प्रतिक्रियाएं और विचार हैं किंतु खेद की बात है कुछ लोग परलोक को संसार की भांति बताने का प्रयास करते हैं और यह लोग यहां तक आगे बढ़ गये हैं कि उन्हों ने यह समझ लिया है कि परलोक में जिस स्वर्ग की बात की गयी है वह इसी संसार के किसी एक या कई नक्षत्रों में है और एक दिन मनुष्य विज्ञान की प्रगति तथा खोजों के सहारे वहां तक पहुंच कर सुख व चैन का जीवन व्यतीत करेगा। कुछ एसे लोग भी हैं जिन्हों ने व्यवहारिक रूप से परलोक और स्वर्ग के अस्तित्व का ही इन्कार कर दिया और स्वर्ग को नैतिक मान्यताएं समझा कि जिस के लिए समाज के अच्छे लोग प्रयास करते हैं तथा उन्होंने लोक व परलोक के मध्य अंतर को लाभ व मान्यता का अंतर समझा।

    अर्थात इन लोगों का यह कहना है कि स्वर्ग का कोई अस्तित्व नहीं है बल्कि यह अच्छी मान्यताएं हैं जो किसी भी स्थान को स्वर्ग या नर्क बनाती हैं किंतु इस प्रकार के विचार निराधार हैं क्योंकि यदि स्वर्ग नैतिक मूल्यों का नाम और नर्क उनके न होने का नाम है तो फिर लोगों को एकत्रित करने और हिसाब किताब का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा और न ही कर्मपत्र और लोगों से पूछताछ का कोई मतलब होगा। इसी प्रकार उन लोगों की बातें भी निराधार हैं जो स्वर्ग या नर्क को इसी ब्रहमाण्ड का एक भाग मानते हुए उसे किसी ग्रह या नक्षत्र में बताते हैं क्योंकि यदि हम ईश्वरीय धर्म पर विश्वास रखते हैं तो फिर यह भी मानना होगा कि परलोक है और यदि परलोक है तो परलोक की कोई भी वस्तु इस लोक में नहीं हो सकती क्योंकि लोक और परलोक में आधारभूत अंतर है ठीक उसी प्रकार से जैसे किसी विशेष क्षेत्र का विशेष मौसम, उसी क्षेत्र से विशेष होता है उसी प्रकार परलोक की चीज़े भी उसी से विशेष हैं। यह तो साधारण लोगों की बातें हैं किंतु इस संदर्भ में पढ़े लिखे और दार्शनिकों के मध्य भी विभिन्न प्रकार की चर्चाएं हैं जैसे दार्शनिकों के मध्य यह चर्चा होती है कि क़यामत के दिन जब सब लोगों का हिसाब होगा और लोग जीवित किये जाएंगे तो जीवन की ओर लोगों की वापसी आत्मा के रूप में होगी या शरीर और आत्मा दोनों की? या यह चर्चा कि भौतिक संसार पूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगा या नहीं? या यदि परलोक में शरीर भी होगा तो उसका रूप संसार की भांति होगा या भिन्न होगा? वास्तविकता के ज्ञान के लिए प्रयास के रूप में इस प्रकार की चर्चाओं की सराहना की जा सकती है किंतु यह आशा नहीं रखती चाहिए कि हम इस प्रकार की चर्चाओं द्वारा परलोक की वास्तविकता को समझने में सक्षम हो जाएगें या परलोक के जीवन से पूर्ण रूप से परिचित हो जाएंगे। वास्तविकता तो यह है कि हम इसी संसार की बहुत से वस्तुओं की यथास्थिति का ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाए हैं। क्या प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के परीक्षण व प्रयोग करने वाले वैज्ञानिक ऊर्जा व पदार्थ के बारे में सब कुछ जान लेने में सफल हुए हैं? क्या वे यह जान सकें हैं कि इस संसार का क्या होने वाला है ? क्या यह वैज्ञानिक यह जान सके हंइ कि यदि पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति या इलेक्ट्रान्स में गतिशीलता समाप्त हो जाए तो क्या होगा ? या यह कि एसा होगा भी या नहीं? इसी प्रकार दार्शनिकों को भी समस्त विषयों की पूर्ण रूप से जानकारी नहीं है और वे बहुत सी गुत्थियों को सुलझाते सुलझाते स्वयं ही उलझ गये हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जब हमारी जानकारियां सीमित हैं और ज्ञान कम तो फिर हम इस सीमित व कम ज्ञान द्वारा किस प्रकार से एसे लोक की वास्तविकताओं को पूर्ण रूप से जानने की इच्छा रखते हैं जहां के बारे में हमारे पास कोई अनुभव नहीं है किंतु हमारी इस बात का यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य किसी भी वस्तु को किसी भी दशा में पूर्ण रूप से पहचान नहीं सकता या यह कि उसे जानने का प्रयास ही नहीं करना चाहिए हमारी बात का यह अर्थ है कि यदि परलोक के बारे में हम जानना चाहें और हमे पूर्ण रूप से जानकारी प्राप्त न हो तो इस पर अचरज नहीं होना चाहिए क्योंकि इसी संसार की एसी अनगिनत वस्तुएं हैं जिनके बारे में या तो हमे बहुत कम ज्ञान है या सिरे से हमें उसकी जानकारी ही नहीं है। निश्चित रूप से हम ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी बुद्धि की शक्ति द्वारा बहुत सी वास्तविकताओं का पता लगा सकते और इसी प्रकार बोध व अनुभव के बल पर प्रकृति के बहुत से रहस्यों से पर्दा उठा सकते हैं। निश्चित रूप से हमें अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक व दार्शनिक प्रयास करने चाहिए किंतु इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि हमें अपनी बुद्धि व बोध की सीमा का भी पता हो। परलोक पर अगले कार्यक्रम में भी हमारी चर्चा जारी रहेगी फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः मनुष्य जिन विषयों के बारे में अनुभव नहीं रखता और न ही उन के बारे में उसे किसा प्रकार का विश्वस्त ज्ञान होता है न ही उसे इन्द्रियों द्वारा महसूस किया होता है तो वह एसे विषयों की पूर्ण पहचान प्राप्त नहीं कर सकता। वास्तविकता के ज्ञान के लिए प्रयास करना चाहिए किंतु यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि हम अपने इस प्रकार के प्रयासों द्वारा परलोक की वास्तविकता को समझने में अवश्य सक्षम हो जाएगें या परलोक के जीवन से पूर्ण रूप से परिचित हो जाएंगे।हम ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी बुद्धि की शक्ति द्वारा बहुत सी वास्तविकताओं का पता लगा सकते और इसी प्रकार बोध व अनुभव के बल पर प्रकृति के बहुत से रहस्यों से पर्दा भी उठा सकते हैं।