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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 76

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    बुद्धि तथा अन्य मार्गों से परलोक के बारे में हमें जो जानकारियां प्राप्त हुई हैं उनके आधार पर हम लोक व परलोक की कई आयामों से एक दूसरे से तुलना कर सकते हैं यद्यपि दोनों के मध्य बहुत अधिक अंतर है। इस संसार और परलोक के मध्य सब से पहला और स्पष्ट अंतर, इस संसार का सीमित जीवन और परलोक का अनन्त होना है। इस संसार में हर मनुष्य की आयु एक न एक दिन समाप्त हो जाने वाली है और यदि कोई लाखों वर्ष भी इस संसार में जीवित रहने में सफल गया तब भी वह प्रलय के समय मर जाएगा जैसा कि पिछली चर्चाओं में हम ने बताया है। इस प्रकार से परलोक, स्थायित्व की दृष्टि से इस संसार से कई गुना अधिक है और यह एसा विषय है जिस पर ईश्वरीय धर्मों में अत्यधिक बल दिया गया है तथा लगभग सभी ईश्वरीय धर्मों में इस संसार के अस्थाई होने की बात कही गयी है। क़ुरआन मजीद में सांसारिक जीवन का उदाहरण, उस पौधे से दिया गया है जो कुछ दिनों तक हरा भरा रहता है और फिर पीला होकर सूख जाता है। सांसारिक जीवन औज्ञ परलोक मंे एक अन्य मुख्य अंतर यह है कि इस संसार के सुख, दुख से मिले हैं और एसा नहीं है कि कुछ लोग सदैव ही सुख भोग करें और कुछ अन्य सदैव दुख व समस्याओं में घिरे रहें बल्कि सारे लोगों को किसी न किसी प्रकार का सुख प्राप्त होता है और इसी प्रकार हर एक को कोई न कोई दुख व कठिनाई होती है। संसार और परलोक के मध्य एक अन्य अंतर यह है कि सांसारिक जीवन परलोक की भूमिका और अनन्त कल्याण की प्राप्ति का साधन है और परलोक का जीवन अंतिम और मुख्य जीवन है भले सांसारिक जीवन के सुख व आंनद मनुष्य को पसन्द होते हैं किंतु इस बात के दृष्टिगत कि वह सब कुछ अनन्त सफलता व कल्याण की प्राप्ति का साधन मात्र होते हैं, यह सांसारिक जीवन मुख्य गतंव्य व लक्ष्य नहीं हो सकता और इस जीवन का वास्तविक मूल्य उन कर्मों पर निर्भर होता है जो मनुष्य परलोक को दृष्टि में रखकर करता है। इस आधार पर यदि कोई सांसारिक सुखभोग से ही सारी आशाएं लगा ले तो निश्चित रूप से उसने जीवन के सही मूल्य को नहीं पहचाना बल्कि उसने बहुत बड़ी ग़लती की है क्योंकि उसने मार्ग को गतंव्य समझ लिया है और इस प्रकार का काम खेल व मनोरंजन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होगा।परलोक की विशेषताओं, उसकी श्रेष्ठता, उसके अकल्पनीय सुखों, ईश्वर से निकटता के आनंद तथा सांसारिक सुखों के दृष्टिगत यह तो निश्चित है कि परलोक की तुलना में सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देना मूर्खता ही है और उसका पछतावे के अतिरिक्त कोई परिणाम नहीं निकलेगा किंतु इस प्रकार के चयन की बुराई उस समय और अधिक स्पष्ट होती है जब हमें यह पता चले कि संसार और उसके सुखों का चयन, न केवल यह कि परलोक की अनन्त नेमतों और सुखों से वंचित रहने का कारण बनता है बल्कि यह सदैव की विफलता व पछतावे का भी कारण बनता है। यदि मनुष्य अनन्त कल्याण के स्थान पर जल्दी ही समाप्त हो जाने वाले सांसारिक सुखों का चयन कुछ इस प्रकार से करे कि उस से परलोक में उसे किसी प्रकार की बुराई व हानि का सामना न करना पड़े तब भी यह काम, परलोक के असीम व अनन्त सुखों के दृष्टिगत मूर्खता है किंतु चूंकि परलोक से कोई भी बचने वाला नहीं है जिस ने अपने पूरे जीवन को सांसारिक सुख भोग में लगाए रखा और परलोक को पूरी तरह से भुला दिया या मूल रूप से उसका इन्कार किया तो वह न केवल यह कि स्वर्ग के सुखों से वंचित रह जाएगा बल्कि नर्क का दंड भी उसे मिलेगा। वास्तव में पाप व अच्छे कर्म की वास्तविकता यह है कि ईश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया और उसके लिए अनन्त सुखों की व्यवस्था की किंतु यदि मनुष्य अपनी योग्यताओं का लाभ न उठाए और ईश्वर द्वारा दी गयी बुद्धि का प्रयोग न करे जिससे भले बुरे की पहचान में वह असमर्थ रहे तो यह वास्तव में सब से बड़ा पाप है और यदि ध्यान दिया जाए तो पापों का कारण यही विचार होता है इसी लिए कहा जाता है कि बुद्धि वही है जिससे ईश्वर की उपासना की जाए और स्वर्ग प्राप्त किया जाए। अर्थात इस संसार में मूर्ख वह है जो पाप करके अपना परलोक बिगाड़े भले ही लोग उसे अत्यधिक चतुर समझते हों और वास्तिवक बुद्धिमान वही है जो भले कर्म करके अपना परलोक सुधारे भले ही लोग उसे मूर्ख समझते हों। वास्तव में, जिसे कल का ज्ञान न हो और जो केवल आज को ही देख रहा हो, वह किसी भी प्रकार से उस व्यक्ति से अधिक ज्ञानी नहीं हो सकता जो कल को ध्यान में रखकर काम करता हो। यह संसार हमारा आज है और परलोक हमारा कल है इस अंतर के साथ कि संसार का यह आज, समाप्त हो जाएगा किंतु परलोक नामक कल, सदैव जारी रहेगा। चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार से थेः • बुद्धि तथा अन्य मार्गों से परलोक के बारे में हमें जो जानकारियां प्राप्त हुई हैं उनके आधार पर हम लोक व परलोक की कई आयामों से एक दूसरे से तुलना कर सकते हैं यद्यपि दोनों के मध्य बहुत अधिक अंतर है।

    • परलोक की विशेषताओं, उसकी श्रेष्ठता, उसके अकल्पनीय सुखों, ईश्वर से निकटता के आनंद तथा सांसारिक सुखों के दृष्टिगत यह तो निश्चित है कि परलोक की तुलना में सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देना मूर्खता ही है

    • सांसारिक जीवन परलोक की भूमिका और अनन्त कल्याण की प्राप्ति का साधन है और परलोक का जीवन अंतिम और मुख्य जीवन है भले सांसारिक जीवन के सुख व आंनद मनुष्य को पसन्द होते हैं।