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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-77

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    अब तक की चर्चाओं में हम यह जान चुके हैं कि मनुष्य का जीवन इसी नश्वर संसार तक ही सीमित नहीं है और वह पुनः परलोक में जीवित होगा और सदैव उस लोक में रहेगा तथा हम यह भी जान चुके हैं कि परलोक का जीवन वास्तविक जीवन है यहां तक कि सांसारिक जीवन उसकी तुलना में जीवन कहे जाने योग्य भी नहीं है। इसी लिए इस चर्चा में हम इन दोनों लोकों के मध्य संबंध पर अधिक प्रकाश डालेंगे यद्यपि इस संदर्भ में भी हम पिछली कड़ियों में संक्षिप्त रूप से चर्चा कर चुके हैं।

    इस संदर्भ में सब से पहले जिस विषय पर बल दिया जाना आवश्यक है वह यह है कि परलोक में सफलता व विफलता, संसार में मनुष्य के कर्मों पर निर्भर है और एसा कदापि नहीं है कि परलोक में सफलता व कल्याण के लिए परलोक में ही प्रयास व कर्म संभव है। अर्थात कर्म का अवसर केवल इस लोक में अर्थात संसार में है और परलोक में किसी भी प्रकार का कर्म संभव नहीं है इसी प्रकार, परलोक के बारे में भी नहीं सोचा जा सकता कि जिस प्रकार से इस संसार में अधिक शारीरिक व बौद्धिक शक्ति रखने वाले लोग, अधिक सुख प्राप्त कर सकते हैं उसी प्रकार परलोक में भी बुद्धिमान लोग, नैतिक व अनैतिक मार्गों से अतिरिक्त सुख प्राप्ति में सफल हो सकते हैं यद्यपि मानव इतिहास में बहुत से एसे समाज थे जिनका यही मानना था कि लोक और परलोक दो भिन्न भिन्न लोक हैं और जिस प्रकार से इस संसार में अधिक शक्ति व साधनों वाला व्यक्ति अधिक सुख प्राप्त कर सकता है उसी प्रकार परलोक में भी धूर्तता व प्रयास द्वारा अधिक लाभ प्राप्त करना संभव है किंतु यह धारणा निराधार है।

    प्रत्येक दशा में यदि कोई परलोक को पूर्ण रूप से भिन्न व अलग लोक माने और यह समझे के संसार में जो कुछ भी वह अच्छा या बुरा कर्म करता है उसका परलोक से कोई संबंध नहीं है तो वास्तव में वह प्रलय और क़यामत या हिसाब किताब के दिन में विश्वास नहीं रखता और यह विश्वास समस्त ईश्वरीय धर्मों का आधार है क्योंकि जैसा कि हम बता चुके हैं क़यामत या हिसाब किताब के दिन में पर विश्वास न होने का अर्थ है कि इस संसार में कर्म का कोई महत्व ही न हो और यही कारण है कि संसार को बाज़ार, व्यापारिक केन्द्र तथा परलोक की खेती कहा जाता है जहां प्रयास, श्रम तथ बीज बो कर परलोक में उसका लाभ प्राप्त और फ़स्ल काटी जा सकती है ।

    कुछ लोगों का विश्वास है कि धन व संतान तथा सांसारिक सुख भोग के अन्य साधन, परलोक में भी सुख व सुविधा का कारण बनेंगे और यही कारण है कि प्राचीन काल में मरने वाले के साथ आभूषण और सोना चांदी भी गाड़ दिया जाता था किंतु यह भी एक अवधारणा है क्योंकि यह निश्चित है कि संसार में किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त इस संसार की कोई भी वस्तु परलोक में किसी काम नहीं आती और परलोक में केवल ईश्वर से निकटता व धर्म पर आस्था का ही मूल्य है।

    इस प्रकार से निष्कर्ष यह निकला कि लोक व परलोक के मध्य संबंध, सांसारिक संबंधों की भांति कदापि नहीं है और एसा नहीं है कि जो भी इस संसार में अधिक शक्तिशाली अधिक सुन्दर और प्रसन्न होगा व परलोक में भी वैसा ही होगा क्योंकि यदि एसा होता तो फिर संसार के कूर राजाओं के लिए परलोक में भी सुख सुविधा के सभी साधन होते क्योंकि उन्हें इस संसार में हर प्रकार की सुविधा और सुख प्राप्त था किंतु स्पष्ट है कि यह संभव नहीं है क्योंकि इस प्रकार से उनके कर्मों का फल उसे नहीं मिल पाएगा और लाखों लोगों पर उसके अत्याचार पर उसे दंड देना संभव नहीं होगा।

    इस प्रकार से लोक व परलोक के मध्य जो संबंध है उसके दृष्टिगत यह हो सकता है कि इस संसार में सुख भोगने वाला, परलोक में दुख में ग्रस्त हो और इस संसार में निर्धनता व अभाव से जूझने वाला व्यक्ति अपने कर्मों के कारण, परलोक में सुख भोगे।

    दूसरी ओर कुछ लोग यह समझ बैठे कि संसार और परलोक के सुखों में विरोधाभास पाया जाता है अर्थात परलोक में सुख उसी को प्राप्त होगा जिसने इस संसार में समस्त सुखों से दूरी की होगी और जिसने इस संसार में सुख भोगा होगा वह परलोक में सुखभोग से वंचित रहेगा किंतु यह भी एक गलत सोच है क्योंकि संसार में सुख भोग और परलोक में सुख भोग एक दूसरे के उलट नहीं है बल्कि संसार में यदि कोई अच्छे कर्म करता है, ईश्वर के आदेशों के दायरे के भीतर रह कर सुख भोगता है तो यह एक प्रकार से ईश्वर के प्रति आभार ही है और ईश्वरीय धर्मों में जो सांसारिक मोहमाया से दूरी की बात की गयी है उसका उद्देश्य यह है कि सांसारिक सुखों में मूल उद्देश्य न बनाया जाए अर्थात कोई इस बात का प्रयास न करे कि सांसारिक सुख सुविधा हर दशा में प्राप्त की जानी चाहिए जैसा कि आज की पश्चिमी संस्कृति में यही होता है कि लाभ प्राप्ति हर मूल्य पर किंतु धर्म इस प्रकार के लाभ को उचित नहीं समझता बल्कि धर्म का कहना है कि लाभ प्राप्त करो सुख भोग करो किंतु नैतिकता व ईश्वरीय आदेशों को दृष्टि में रखकर

    विभिन्न उदाहरणों से हमें यह मानना पड़ेगा कि सांसारिक सुख और परलोक के सुख के मध्य किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है बल्कि सांसारिक सुख दुख ईश्वर के ज्ञान व न्याय के अंतर्गत होते हैं और यह सब मनुष्य की परीक्षा के साधन मात्र है ईश्वर किसी को सुख देकर आज़माता है और किसी की परीक्षा दुख द्वारा करता है और किसी भी दशा में सांसारिक सुख व दुख, ईश्वर की प्रसन्नता व प्रकोप का चिन्ह नहीं हैं अर्थात सुख में रहने वाले व्यक्ति के लिए हम निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते कि ईश्वर अवश्य उससे प्रसन्न है इसी प्रकार दुख में ग्रस्त किसी भी व्यक्ति के बारे में हम नहीं सोच सकते के निश्चित रूप से ईश्वर उससे अप्रसन्न है इसी लिए उसे दुख दिये हैं।

    इन चर्चाओं से यह निष्कर्ष निकतला है कि संसार और परलोक के मध्य किसी भी प्राकर के संबंध न होने में विश्वास वास्तव में क़यामत में विश्वास न होने के समान है किंतु सांसारिक सुखों और दुखों का परलोक के सुखों और दंडों से कोई संबंध नहीं है बल्कि जो वस्तु परलोक में सुख व दंड का कारण है वह वास्तव में मनुष्य के अपने कर्म हैं और परलोक का सुख दुख मनुष्य के संसार में किये गये कर्मों पर आधारित होगा।

    आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार थे।

    मनुष्य का जीवन इसी नश्वर संसार तक ही सीमित नहीं है और वह पुनः परलोक में जीवित होगा और सदैव उस लोक में रहेगा
    परलोक में सफलता व विफलता, संसार में मनुष्य के कर्मों पर निर्भर है और यह सोच ग़लत है कि परलोक में सफलता व कल्याण के लिए परलोक में ही प्रयास व कर्म संभव है। संसार में सुख भोग धर्म के विपरीत नहीं है और ईश्वरीय धर्मों में जो सांसारिक मोहमाया से दूरी की बात की गयी है उसका उद्देश्य यह है कि सांसारिक सुखों में मूल उद्देश्य न बनाया जाए।