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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-78

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    लोक परलोक के मध्य संबंध के विषय पर चर्चा के अवसर पर कुछ एसी बातें भी सामने आती हैं जिन पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डालने की आवश्यकता है उदाहरण स्वरूप, लोक व परलोक के मध्य जो संबंध है वह वास्तविक व मूल संबंध है या किसी वस्तु के आधार पर यह संबंध स्थापित हुआ है ? या यह कि ईमान व ईश्वर पर विश्वास तथा अच्छे कर्मों और ईश्वर के इन्कार व पाप के मध्य क्या संबंध है? और क्या स्वंय अच्छे व बुरे कर्म भी प्रभावित करने और प्रभाव स्वीकार करने की क्षमता रखते हैं या नहीं?

    आज की चर्चा में हम यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि लोक व परलोक के मध्य या पाप व इन्कार के मध्य संबंध बनाए हुए नहीं हैं।

    जैसा कि बारम्बार बताया जा चुका है सांसारिक कर्मों और परलोक के दुखों व नेमतों के मध्य जो संबंध है वह भौतिक व साधारण नहीं है तथा उसे भौतिक अथवा रसायनिक सिद्धान्तों के आधार पर समझा या समझाया नहीं जा सकता बल्कि यह सोचना भी ग़लत होगा कि मनुष्य के कर्म में प्रयोग होने वाली ऊर्जा पदार्थ व ऊर्जा में परिवर्तन के सिद्धान्त के आधार पर होती है और परलोक के दुख व सुख के रूप में सामने आती है।

    वास्तव में बहुत से लोग कर्म और उसके प्रतिफल के मध्य संबंधों को, विश्व के साधारण भौतिक संबंधों की भांति मानते हैं अर्थात उनका सोचना है कि जिस प्रकार से इस संसार में हर प्रतिक्रिया किसी क्रिया का परिणाम होती है और जिस प्रकार का संबंध क्रिया और प्रतिक्रिया में होता है उसी प्रकार का संबंध अच्छे व भले कर्मों के प्रतिफल में होता है अर्थात क्रम में ख़र्च की जाने वाली ऊर्जा की प्रतिफल बनती है किंतु यह सोचना बिल्कुल ग़लत है क्योंकि मनुष्य कर्म के लिए जो ऊर्जा प्रयोग करता है उससे से एक साधारण से पौधे का बीज भी नहीं बनाया जा सकता स्वर्ग की अपार नेमतों और सुखों की बात ही क्या।

    दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य इस संसार में जो कर्म करता है यदि उसके फल को उसके करनी की प्रतिक्रिया और उसी मात्रा में समझा जाए तो फिर इस दशा में मनुष्य के एक जन्म के समस्त अच्छे कर्म भी उसे स्वर्ग के किसी एक सुख के योग्य बनाने की क्षमता नहीं रखते। इस लिए यह समझ लेना चाहिए कि मनुष्य के अच्छे कर्मों पर जो प्रतिफल ईश्वर उन्हें देता है वह मज़दूरी नहीं बल्कि इनाम होता है और इनाम व पुरुस्कार में श्रम की मात्रा नहीं देखी जाती बल्कि इनाम, इनाम देने वाले की प्रसन्नता पर निर्भर होता है। वास्तव में मनुष्य के कर्म भले हों या बुरे वह विदित प्रभाव तो डालते ही हैं किंतु इसके साथ ही अच्छे और बुरे कर्मों का मानव की आत्मा का सीधा प्रभाव पड़ता है और आत्मा वास्तव में मनुष्य के शरीर में ईश्वर की धरोहर होती है। यदि हम किसी से कोई वस्तु कुछ दिनों के लिए उधार लेते हैं और फिर प्रयोग करके और काम निकाल कर उसे वापस लौटा देते हैं तो यदि हमने दूसरे व्यक्ति की वस्तु को उसके उसी रूप में लौटाया तो हम अच्छे इन्सान समझे जाएंगे और यदि हम ने उसे साफ सुथरी और अधिक अच्छी दशा में उसे लौटाया तो यह हमारा प्रशंसनीय काम होगा किंतु यदि हम ने प्रयोग के लिए ली गयी वस्तु को ख़राब कर दिया और उसे उसकी पहली वाली दशा में वापस करने के लिए ख़राब दशा में लौटाया तो इससे उसके स्वामी को दुख होगा और वह अप्रसन्न होगा। अच्छे व बुरे कर्म पर ईश्वर द्वारा पुरुस्कार व दंड का कारण भी यही है। यह हमारी आत्मा हमारे पास ईश्वर की धरोहर है जिसे ईश्वर ने हमें कुछ दिनों के लिए दिया है और यह आत्मा चूंकि ईश्वरीय होती है इस लिए भले कर्मों से भली और बुरे कर्मों से दूषित और ख़राब होती है तो जो मनुष्य अच्छे कर्मों से इस आत्मा को स्वच्छ रखता है तो जब वह आत्मा रूपी धरोहर ईश्वर को लौटाता है तो उसकी दशा अच्छी रहती है और ईश्वर उससे प्रसन्न होता है और अपनी धरोहर के रख रखाव पर ध्यान देने के कारण उसे पुरुस्कार देता है और इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य बुरे कर्म करके आत्मा को दूषित और ख़राब करता है तो जब वह बुरी दशा में ईश्वर के पास लौटती है तो ईश्वर अप्रसन्न होता है और अपनी धरोहर को दूषित और ख़राब करने के कारण इसके ज़िम्मेदार को दंड देता है।

    इन सब के साथ यह भी एक वास्तविकता है कि धर्म और परलोक से संबंधित सभी वास्तविकताओं को पूर्ण रूप से समझना संभव नहीं है क्योंकि मनुष्य को प्रयोगशालाओं द्वारा प्राप्त ज्ञान की आदत पड़ गयी है और आज का मनुष्य उसी समय संतुष्ट होता है जब आंखों कोई चीज़ अपनी आंखों से देख ले यद्यपि यह भी एक वास्तविकता है कि आंखों से देखी हुई घटनाएं भी कभी कभी भ्रम सिद्ध हो जाती हैं और इसके साथ यह भी एक अटल वास्तिवकता है कि परलोक का संबंध, इस लोक से नहीं है अर्थात यह कोई भौतिक वस्तु नहीं है और मनुष्य अभी तक अपनी इंद्रियों से सभी भौतिक वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने में भी सक्षम नहीं हो पाया है भौतिकता से परे विषयों और चीज़ों को समझने की बात ही क्या।

    अच्छे और बुरे कर्म के प्रतिफल के बारे में कई आयामों से चर्चा की जा सकती है किंतु इस संदर्भ में अधिक चर्चा से यह संभव है कि चर्चा गूढ़ हो जाए इसी लिए संक्षिप्त रूप से हम यह कह सकते हैं कि धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार हमारे अच्छे व बुरे कर्मों का वास्तविक प्रभाव और रूप, उससे कहीं अधिक बड़ा और भिन्न होता है जो हमें नज़र आता है और भले कर्मों की भलाई और बुरे कर्मों की बुराई का वास्तविक रूप, कम से कम इस लोक में पूर्ण रूप से हमारे सामने स्पष्ट होना संभव नहीं है।

    आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार से थे।

    यह सोचना ग़लत है कि मनुष्य के कर्म में प्रयोग होने वाली ऊर्जा पदार्थ व ऊर्जा में परिवर्तन के सिद्धान्त के आधार पर होती है और परलोक के दुख व सुख के रूप में सामने आती है। मनुष्य कर्म के लिए जो ऊर्जा प्रयोग करता है उससे से एक साधारण से पौधे का बीज भी नहीं बनाया जा सकता स्वर्ग की अपार नेमतों और सुखों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। मनुष्य के अच्छे कर्मों पर जो प्रतिफल ईश्वर उन्हें देता है वह मज़दूरी नहीं बल्कि इनाम होता है और इनाम व पुरुस्कार में श्रम की मात्रा नहीं देखी जाती बल्कि इनाम, इनाम देने वाले की प्रसन्नता पर निर्भर होता है। अच्छे कर्म आत्मा को स्वच्छ और बुरे कर्म उसे दूषित करते हैं और चूंकि आत्मा ईश्वरीय धरोहर है इस लिए ईश्वर उसे स्वच्छ रखने पर इनाम और दूषित करने पर दंड देता है।