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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-79

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    लोक व परलोक के संदर्भ में चर्चा में एक महत्वपूर्ण विषय कल्याण व सफलता का भी है। मूल रूप से यह प्रश्न उठता है कि कल्याण, सफलता, मोक्ष आदि जैसे शब्दों का अर्थ क्या होता है और अच्छे कर्म तथा धर्म विश्वास मिल कर मनुष्य को कल्याण तक पहुंचाते हैं या फिर इन दोनों में से एक ही परलोक में सफलता के लिए पर्याप्त है

    लोक परलोक तथा परलोक में कल्याण की विचारधारा लगभग सभी धर्मों में पायी जाती है। भारतीय दर्शन के अनुसार संसार आवागमन, जन्म-मरण और नश्वरता का केंद्र हैं तथा इससे मुक्ति पाना ही मोक्ष है। प्राय: सभी दार्शनिक प्रणालियों ने संसार के दु:ख मय स्वभाव को स्वीकार किया है और इससे मुक्त होने के लिये कर्ममार्ग या ज्ञानमार्ग का रास्ता अपनाया है।भारतीय दर्शन में मोक्ष इस प्रकार के जीवन का अंतिम चरण है और इसे जीवन के परम उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया है। बौद्ध मत में भी निरवाण का लगभग यही अर्थ है जब कि इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्मों में परलोक व कल्याण का विचार थोड़े बहुत अन्तर के साथ समान है किंतु यह चर्चा बहरहाल महत्वपूर्ण है कि परलोक की सफलता या विफलता कि जिसके परिणाम स्वरूप पुरस्कार या दंड मिलता है, आस्था या ईमान तथा कर्म का परिणाम है या केवल आस्था या कर्म का परिणाम है?

    इस संदर्भ में कई प्रश्न उठते हैं उदाहरण स्वरूप यह कि यदि कोई व्यक्ति ईश्वर में आस्था न रखता हो किंतु अच्छे कर्म करता हो तो परलोक में उसका क्या होगा? या इसी प्रकार यदि कोई ईश्वर में आस्था रखता हो ईमान रखता हो किंतु अच्छे कर्म न करता हो उसका क्या होगा? या फिर उस व्यक्ति का क्या होगा जो ईश्वर का इन्कार करता हो और अच्छे कर्म भी न करता हो? या इसी प्रकार यह कि उस व्यक्ति का परलोक में क्या होगा जो अपने जीवन के एक भाग में ईश्वर में आस्था के साथ अच्छे कर्म किये हो और अन्य भाग में ईश्वर के इन्कार के साथ बुरे कर्म किये हो?

    इस संदर्भ में धार्मिक शिक्षाओं में आरंभ से ही चर्चा होती रही है और बहुत से गुट एसे भी हैं जिनका यह मानना था कि पाप की अकेले परलोक में अनन्त दंड का कारण है बल्कि पाप मनुष्य को धर्म से ही बाहर कर देते हैं किंतु कुछ अन्य गुटों का यह मानना था कि ईश्वर में विश्वास व आस्था, परलोक में सफलता का मूल कारण है और पाप, परलोक में सफलता पर प्रभाव नहीं डालता किंतु वास्तविकता यह है कि हर पाप, परलोक में अनन्त दंड का कारण नहीं बनता और न ही हर पाप परलोक में मनुष्य को कल्याण से दूर करता है और इसी प्रकार यह कहना भी ग़लत है कि पाप मनुष्य को धर्म से बाहर कर देता है यद्यपि यह संभव है कि पापों की अधिकता, मनुष्य के ह्रदय से ईश्वर पर विश्वास व आस्था समाप्त कर दे।

    इसी प्रकार यह कहना भी गलत है कि यदि ईमान है और मनुष्य को ईश्वर में विश्वास है तो फिर परलोक में उसकी सफलता पर पापों का कोई प्रभाव नहीं होगा क्योंकि यह निश्चित है कि ईश्वर पर विश्वास के बाद, परलोक में सफलता व विफलता या मोक्ष व कल्याण के लिए सब से अधिक प्रभाव वस्तु, मनुष्य के कर्म होते हैं किंतु इसमें ईमान व विश्वास की भूमिका सब से अधिक महत्वपूर्ण है इस लिए इस विषय पर अपनी चर्चा के आरंभ में हम ईमान व इन्कार से आशय को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं।

    ईमान या ईश्वर पर विश्वास वास्तव में मन व मस्तिष्क की उस दशा को कहते हैं जो किसी अर्थ के ज्ञान व उस की ओर झुकाव के कारण उत्पन्न होती है। अर्थात किसी भी वस्तु पर ईमान और विश्वास के लिए उसके प्रति ज्ञान व झुकाव होना आवश्यक है इसी लिए यदि कोई किसी वस्तु की उपस्थिति के बारे में किसी प्रकार का ज्ञान न रखता हो तो वह उस पर ईमान या विश्वास नहीं रख सकता अलबत्ता विश्वास व ईमान के लिए ठोस ज्ञान भी आवश्यक नहीं है और बहुत से लोग केवल कल्पना करके भी ईमान व विश्वास के चरण तक पहुंच सकते हैं किंतु यह कदापि वास्तिवक ईमान नहीं होगा।

    अपनी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए हम यह कहेंगे कि ईमान अर्थात ईश्वर में विश्वास के लिए केवल जान लेना और अवगत हो जाना ही पर्याप्त नहीं है अर्थात हम किसी से केवल यह सुन कर कि ईश्वर है, ईश्वर में विश्वास कर लें तो यद्यपि यह विश्वास, ज्ञान के आरंभिक चरण का परिणाम होगा किंतु सही अर्थ में इसे ईमान नहीं कहा जाएगा क्योंकि ईमान व विश्वास उसी समय पूरा होगा जब जिस वस्तु पर ईमान व विश्वास किया जाए उसकी मूल बातों और विशेषताओं का ज्ञान हो।

    चूंकि हमारी चर्चा का उद्देश्य, ईश्वर पर ईमान व विश्वास है इस लिए हम इसी विषय को उदाहरण बनाते हैं। ईश्वर में विश्वास के लिए हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम उसके कुछ मूल गुणों और उस में विश्वास रखने के बाद अपने कर्तव्यों का ज्ञान रखते हों। मूल विशेषताओं व गुणों के बारे में ठोस ज्ञान के बाद किया जाने वाला विश्वास वास्तविक विश्वास व ईमान होता है।

    यह इसी प्रकार है कि जैसे हमसे कोई यह कहे कि अमुक घर अच्छा है तो यद्यपि हमें उस घर के बारे में आरंभिक ज्ञान प्राप्त हो गया है और हम उसे अच्छा भी समझते हैं किंतु उसके अच्छा होने का हमारा विश्वास, जिस ज्ञान के आधार पर टिका है वह विश्वस्त नहीं है और बहुत संभव है कि जब हमें यह पता चले कि वह घर अमुख मोहल्ले में है तथा उसका क्षेत्रफल इतना है और उसे बनने हुए उदाहरण स्वरूप २० वर्ष हो चुके हैं तो उस घर के अच्छे होने का हमारा विश्वास समाप्त हो जाए इसी लिए इस प्रकार के आरंभिक ज्ञान के आधार पर किये जाने वाले विश्वास पर भरोसा नहीं किया जा सकता किंतु यदि हमें घर जिस मोहल्ले में स्थित है उसका ज्ञान हो, घर की निर्माण तिथि, निर्माणशैली और क्षेत्रफल का ज्ञान हो और हम उसे अच्छा समझें तो उस घर के अच्छे होने का हमारा यह विश्वास भरोसे योग्य होगा क्योंकि यह विश्वास जिस ज्ञान के आधार पर है वह पर्याप्त है।

    इसी प्रकार ईश्वर पर विश्वास है यदि हम साधारण से ज्ञान के आधार पर ईश्वर में विश्वास रखते हैं तो हमारा यह विश्वास, किसी भी रूप में ईमान नहीं कहा जाएगा क्योंकि इसका आधार अत्यन्त कमज़ोर होगा किंतु यदि हमने ईश्वर पर, उसके गुणों के बारे में किसी सीमा तक जानकारी प्राप्त करने के बाद विश्वास किया है तो हमारा यह विश्वास, भरोसे के योग्य होगा और इसे ईमान की श्रेणी में रखा जा सकता है। ईश्वर पर ईमान व विश्वास के संदर्भ में हमारी चर्चा अगले कार्यक्रम में भी जारी रहेगी फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः
    लोक परलोक तथा परलोक में कल्याण की विचारधारा लगभग सभी धर्मों में पायी जाती है किंतु सफलता से आशय के बारे में विचारधाराएं भिन्न हैं। ईश्वर पर विश्वास के बाद, परलोक में सफलता व विफलता या मोक्ष व कल्याण के लिए सब से अधिक प्रभावी वस्तु, मनुष्य के कर्म हैं किंतु इसमें ईमान व विश्वास की भूमिका सब से अधिक महत्वपूर्ण है। ईश्वर में विश्वास के लिए हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम उसके कुछ मूल गुणों और उस में विश्वास रखने के बाद अपने कर्तव्यों का ज्ञान रखते हों।