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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-81

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    पिछली चर्चा में ईमान या धर्म पर विश्वास के बारे में हमारी बहस से यह स्पष्ट हुआ कि ईमान व ईश्वर पर विश्वास का आधार स्वेच्छा व चयन शक्ति के साथ झुकाव है और यह यह दशा, उस ज्ञान व जानकारी से भिन्न है जो अनेच्छित रूप से बिना किसी अधिकार के प्राप्त हो जाया करती है इस आधार पर ईमान को मन का एक स्वेच्छिक काम कहा जा सकता है अर्थात कर्म के अर्थ को विस्तृत करने की दशा में स्वयं ईमान भी कर्म के दायरे में आ जाता है।

    अपनी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए हम कहेंगे कि ईमान व आस्था पर आधारित विश्वास के लिए मात्र जानकारी ही पर्याप्त नहीं है बल्कि ह्रदय से उस जानकारी से सहमति भी आवश्यक है तभी उसे ईमान व आस्था कहा जा सकता है विशेषकर उन धर्मों में जिनमें आस्था को तर्क से अलग नहीं समझा जाता। मन में विश्वास व मानसिक रूप से किसी तथ्य की पुष्टि की भावना इतनी शक्तिशाली होती है कि वह तर्क को भी पीछे ढकेल देती है जैसा कि हम विश्व के बहुत से धर्मों और मतों में देखते हैं। अर्थात संसार में एसे बहुत से धर्म मिल जाएंगे जिनमें तर्क व बुद्धि का कोई महत्व नहीं है बल्कि यहां तक कहा जाता है कि यह बुद्धि नहीं आस्था का मामला है अर्थात एसा प्रदर्शित किया जाता है मानो आस्था और तर्क एक दूसरे से भिन्न वस्तु हैं किंतु हमारा यह कहना है कि आस्था का आधार बुद्धि है और इसी दशा में आस्था, विश्वास तथा ईमान कहलाएगी। इसी लिए हम मात्र जानकारी व ज्ञान को विश्वास का स्थान नहीं दे सकते उदाहरण स्वरूप, हमें बहुत से एसे लोग नज़र आ जाएंगे जो अन्य धर्मों के बारे में, स्वंय उस धर्म के अनुयाईयों से अधिक जानकारी रखते हैं किंतु उसके बावजूद उन्हें उस धर्म का अनुयाई नहीं माना जाता और इसका केवल एक ही कारण होता है और वह यह कि वे ज्ञान रखते हैं किंतु उस से सहमत नहीं होते अन्यथा नियमों का पालन तो स्वंय उस धर्म के बहुत से अनुयाई भी नहीं करते।

    इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि ईमान या आस्था, उसी समय ईश्वर से निकटता का कारण बनेगी जब मन से उसकी पुष्टि हो और उसका आधार वह बुद्धि हो जो ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान की है अलबत्ता यहां तक हम यह बात की स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमारे कहने का आशय यह कदापि नहीं है कि धर्म के सभी नियमों का आधार बुद्धि है और धर्म के हर नियम का बौद्धिक तर्क आवश्यक है क्योंकि यह संभव नहीं है इस लिए कि हमारा यह मानना है कि वास्तविक धर्म, के नियमों का संकलन, ईश्वर या उसके निर्धारित दूतों द्वारा होता है और यह बहुत स्वाभाविक सी बात है नियमों का संकलन करने वाला ईश्वर हो तो फिर उसके हर नियम का तर्क मनुष्य की बुद्धि में न समाए क्योंकि मानवज्ञान प्रगतिशील है और यह संभव है कि किसी नियम का तर्क आज समझ में न आएं किंतु कल वह बिल्कुल साधारण बात लगे।

    धर्म व आस्था के बौद्धिक आधार पर अर्थ यह है कि आस्था में कोई एसी बात न हो जो स्पष्ट बौद्धिक व तार्किक नियमों के विपरीत हो जैसे यदि कोई धर्म यह कहे कि उदाहरण स्वरूप दो और दो चार नहीं होते तो फिर उस धर्म के ईश्वरीय होने में संदेह है किंतु यदि कोई धर्म एसी कोई बात कहता है जो आज के वैज्ञानिक तथ्यों से मेल नहीं खाती तो उस नियम को ग़लत या उस धर्म को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता क्योंकि वैज्ञानिक तथ्य, अनुसंधान व विकास के साथ ही बदलते रहते हैं और जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता है वैसे वैसे वैज्ञानिक फार्मूलों और नियमों में सुधार या बदलाव आता रहता है।

    इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि ईश्वर से निकटता और मनुष्य की वास्तविक परिपूर्णता सच्चे विश्वास द्वारा संभव है और सच्चा विश्वास वही होता है जो मन की सहमति व इच्छा के साथ बौद्धिक आधारों पर आस्था का परिणाम हो तथा एसे ईमान व आस्था का ही फल परलोक में मिलेगा और जो भी इस दशा से दूर होगा उसे दंड मिलेगा इस प्रकार से यहां पर यह स्पष्ट हुआ कि परलोक में अनन्त सफलता का सीधा संबंध मनुष्य के ईमान व आस्था से है और वास्तव में परलोक का सब से बड़ा इनाम और परिपूर्णता ईश्वर से निकटता है और सब से बड़ा दंड उससे दूरी है किंतु यहां पर एक प्रश्न यह है कि यदि कोई ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता किंतु अच्छे कर्म करता है तो उसका परलोक में क्या होगा?

    इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि जिसने परलोक का इरादा ही न किया हो और जिसने परलोक में पारितोषिक के लिए अच्छे कर्म न किये हों तो उसे परलोक में पारितोषिक मिलने का कोई औचित्य नहीं है ठीक उस दर्शक की भांति जो उदाहरण स्वरूप क्रिकेट देखने के दौरान अपनी ओर आने वाली गेंद को कैच कर लेता है किंतु उसके कैच लेने का खेल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात न खिलाड़ी आउट होता है न ही खिलाड़ियों में उसका नाम दर्ज होता है क्योंकि वे खेल में शामिल नहीं था और उसने खेल के दायरे से बाहर यह काम किया है जबकि यदि खेल में व्यस्त कोई खिलाड़ी यह काम करता तो उसे सराहना होती और खेल पर उसका प्रभाव भी नज़र आता किंतु कैच लेने वाले दर्शक का परिश्रम बिल्कुल ही व्यर्थ नहीं जाता बल्कि कैच लेने के कारण कैमरे उसी पर टिक जाते हैं और उसे बार बार दिखाया जाता है और उसके परिजन और मित्र उसे देख कर और वह बाद में स्वंय को देख कर खुश हो लेता है। इस प्रकार से भले ही खेल पर उसके इस काम का कोई प्रभाव न पड़े किंतु क्षणिक प्रभाव के रूप में उसे अन्य दर्शकों से भिन्न महत्व प्राप्त हो जाता है।

    लोक परलोक तथा अच्छे कर्म का भी यही मामला है, यदि कोई अच्छे कर्म करता है और परलोक में विश्वास नहीं रखता तो निश्चित रूप से उसके अच्छे कर्म का प्रभाव होगा किंतु क्षणिक होगा और इसी संसार में उसका फल, लोगों में ख्याति तथा सम्मान के रूप में उसे मिल जाएगा किंतु परलोक की दौड़ में चूंकि वह शामिल नहीं है और इस लिए वहां उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। अलबत्ता यदि कोई एसा व्यक्ति हो जो अत्यधिक अच्छे कर्म करता हो और उसके अच्छे कर्म इतने अधिक हों कि संसार में ख्याति व सम्मान के रूप में उसका प्रतिफल संभव न हो या फिर अच्छे कर्म के बावजूद उसे संसार में ख्याति व सम्मान या किसी भी अन्य सांसारिक वस्तु के रूप में प्रतिफल न मिल पाए और वह ईश्वर व परलोक में विश्वास भी न करता तो उसके लिए अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि परलोक में उसके इन अच्छे कर्मों का प्रभाव यही हो सकता है कि उसके दंड में कमी कर दी जाएगी।

    आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु

    ईमान व आस्था पर आधारित विश्वास के लिए मात्र जानकारी ही पर्याप्त नहीं है बल्कि ह्रदय से उस जानकारी से सहमति भी आवश्यक है
    धर्म व आस्था के बौद्धिक आधार पर अर्थ यह है कि आस्था में कोई एसी बात न हो जो स्पष्ट बौद्धिक व तार्किक नियमों के विपरीत हो ईश्वर से निकटता और मनुष्य की वास्तविक परिपूर्णता सच्चे विश्वास द्वारा संभव है और सच्चा विश्वास वही होता है जो मन की सहमति व इच्छा के साथ बौद्धिक आधारों पर आस्था का परिणाम हो तथा एसे ईमान व आस्था का ही फल परलोक में मिलेगा परलोक तथा ईश्वर में विश्वास न रखने वाले को इसी संसार में प्रतिफल मिलेगा और परलोक में उसका कोई प्रभाव नहीं होगा।