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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म-9 एवं 10 ईश्वर कैसा है?

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    हम यह जान चुके हैं कि धर्म का आधार इस सृष्टि के रचयिता के अस्तित्व पर विश्वास है और भौतिकवादी व ईश्वरीय विचारधारा के मध्य मुख्य अंतर भी इसी विश्वास का होना और न होना है। इस आधार पर सत्य के खोजी के सामने जो पहली बात आती है और जिसका उत्तर उसके लिए किसी भी अन्य बात से अधिक आवश्यक होता है वह यह है कि किसी ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए सत्य के खोजी को अपनी बुद्धि का प्रयोग करना होगा ताकि निश्चित परिणाम तक पहुँच सके, चाहे वह परिणाम सकारात्मक हो या नकारात्मक।परिणाम यदि सकारात्मक होगा तो उस दशा में ईश्वर के बाद के विषयों पर विचार व चिंतन की बारी आएगी अर्थात फिर उसके बाद उसके गुणों के बारे में सोचना होगा कि यदि ईश्वर है तो कैसा है? और उसकी विशेषताएं क्या हैं? किंतु यदि उत्तर नकारात्मक रहा अर्थात सत्य का खोजी चिंतन व विचार के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इस सृष्टि का कोई रचयिता नहीं है तो भौतिकवादी विचारधारा प्रमाणित होगी और फिर धर्म से संबंधित अन्य विषयों पर विचार व चिंतन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी।अब प्रश्न यह है कि ईश्वर के बारे में पहचान कैसे प्राप्त की जाए? ईश्वर के बारे में दो प्रकार से पहचान व ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, स्वाभाविक रूप से और अन्य स्थान से प्राप्त करके। स्वाभाविक रूप से पहचान का आशय यह है कि मनुष्य चिंतन व समीक्षा के बिना विशेष प्रकार की मनोस्थिति व आध्यात्मिक शक्ति द्वारा यह विश्वास प्राप्त कर ले कि ईश्वर है और यह भी जान ले कि वह कैसा है। स्पष्ट है कि यदि किसी को इस प्रकार से ईश्वर की पहचान और उसके बारे में ज्ञान प्राप्त हो जाए, जैसा कि कुछ लोग दावा भी करते हैं, तो फिर उसे चिंतन व विचार के चरणों से गुज़रने की आवश्यकता नहीं होगी किंतु जैसा कि पहले उल्लेख किया गया, इस प्रकार का ज्ञान किसी साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं है।प्राप्त की जाने वाली पहचान का अर्थ यह है कि मनुष्य आवश्यकतामुक्त रचयिता, ज्ञानी, सक्षम जैसे अर्थों की सहायता से एक अदृश्य शक्ति के बारे में एक विचारधारा बना ले और केवल इतना विश्वास उत्पन्न कर ले कि इस प्रकार की कोई शक्ति है जिसने संसार की रचना की है। फिर इस संदर्भ में अधिक विचार करके अन्य प्रकार की बातों व ईश्वर की विशेषताओं का ज्ञान प्राप्त करे तो फिर विचारों और विश्वासों के इस समूह को धार्मिक विचारधारा का नाम दिया जा सकता है।तर्कसंगत दलीलों और दार्शनिक विचारों के बाद प्रत्यक्ष रूप से जो वस्तु प्राप्त होती है उसे प्राप्त की जाने वाली पहचान व ज्ञान का नाम दिया जाता है और जब इस प्रकार की पहचान प्राप्त हो जाए तो फिर उसके बाद मनुष्य स्वाभाविक व आध्यात्मिक पहचान प्राप्त करने का भी प्रयास कर सकता है। हम प्रायः यह सुनते रहते हैं कि ईश्वर की पहचान मनुष्य की प्रवृत्ति में है और मनुष्य स्वाभाविक रूप से ईश्वर की पहचान रखता है। इस प्रकार के वाक्यों के अर्थ को अधिक समझने के लिए प्रवृत्ति और स्वभाव के बारे में जानना आवश्यक है।प्रवृत्ति व स्वभाव से आशय वह दशा व स्वभाव है जो किसी भी प्राणी के जन्म के साथ ही उसमें पाया जाता है और उस प्रकार के सभी प्राणियों में वह विशेषता व स्वभाव मौजूद होता है। इस प्रकार से प्रवृत्ति व स्वभाव के लिए तीन विशेषताओं पर ध्यान दिया जा सकता है। पहली बात तो यह कि प्रवृत्ति हर प्राणी में उसके जैसे अन्य प्राणियों की भांति होती है भले ही किसी में प्रबल और किसी में क्षीण हो। दूसरे यह कि प्रवृत्ति सदैव एक समान होती है और इतिहास से भी यह सिद्ध होता है कि प्रवृत्ति में कभी भी परिवर्तन नहीं आता, आज मनुष्य की जो प्रवृत्ति है वह हज़ार वर्ष पहले भी थी। तीसरे यह कि प्रवृत्ति से संबंधित विशेषताओं को सीखने-सिखाने की आवश्यकता नहीं होती अलबत्ता उसे सजाया-संवारा जा सकता है और इसके लिए प्रशिक्षण व सीखने की आवश्यकता हो सकती है।बहुत से बुद्धिजीवी ईश्वर व धर्म की ओर मनुष्य के रुझान को स्वाभाविक व मनोवैज्ञानिक विषय मानते हैं और उसे धर्म बोध या धर्म भावना का नाम देते हैं। यहाँ पर यह बात उल्लेखनीय है कि ईश्वर की पहचान भी मनुष्य के लिए स्वाभाविक बताई गई है किंतु जिस प्रकार ईश्वर की उपासना की प्रवृत्ति जाना-बूझा रुझान नहीं है उसी प्रकार ईश्वर की पहचान की प्रवृत्ति भी जाना-बूझा रुझान नहीं होता कि साधारण लोगों को इस संदर्भ में चिंतन व विचार की आवश्यकता ही न पड़े अर्थात इस बात का कि ईश्वर की पहचान हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होती है, यह अर्थ नहीं होगा कि मनुष्य को ईश्वर की पहचान प्राप्त करने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसमें यह पहचान स्वाभाविक रूप से मौजूद होती है किंतु इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि हर व्यक्ति जिसे कम ही सही किंतु ईश्वर की आध्यात्मिक पहचान होती है वह थोड़ा सा चिंतन और विचार करके ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर सकता है और धीरे-2 अपने बोध, ज्ञान और पहचान में वृद्धि करके चेतना व ज्ञान के चरण में पहुँच सकता है।परिणाम यह निकला कि ईश्वर की पहचान व बोध के स्वाभाविक होने का यह अर्थ है कि मनुष्य का हृदय ईश्वर को पहचानता है और उसकी आत्मा की गहराइयों में ईश्वरीय पहचान का प्रकाश मौजूद होता है जिसे बढ़ाया भी जा सकता है किंतु साधारण लोगों में यह स्थिति ऐसी नहीं होती कि उन्हें चिंतन व विचार की आवश्यकता ही न रहे।ईश्वर को पहचानने के लिए असंख्य और विभिन्न मार्ग हैं जिनका बुद्धिजीवियों की किताबों में, धर्मगुरुओं द्वारा और ग्रंथों में उल्लेख किया गया है। ईश्वर की पहचान के लिए जो प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं वे कई पहलुओं से एक दूसरे से अलग हैं। उदाहरण स्वरूप कुछ दलीलों व प्रमाणों में अनुभव, प्रयोग और बोध से संबंधित तथ्यों का सहारा लिया गया है जबकि कुछ अन्य में केवल बौद्धिक तर्कों का ही प्रयोग किया गया है। कुछ दलीलों में सीधे रूप से ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित किया गया है जबकि कुछ अन्य में बौद्धिक तर्कों का सहारा लेकर किसी ऐसे अस्तित्व को प्रमाणित किया गया है जिसकी उपस्थिति के लिए अन्य अस्तित्व की आवश्यकता नहीं होती और जिसको पहचानने के लिए दूसरे प्रकार के तर्क प्रस्तुत करने पड़ते हैं।एक आयाम से ईश्वर को पहचानने के तर्कों को ऐसे मार्गों के समान बताया जा सकता है जो नदी को पार करने के लिए होते हैं। नदी पार करने के लिए कभी साधारण लकड़ी के पुल होते हैं जो नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बनाए जाते हैं और जिस पर चल कर पथिक दूसरी ओर पहुँच जाता है जबकि कुछ पुल पत्थर के बने होते हैं जो अधिक मज़बूत होते हैं किंतु इससे मार्ग लम्बा हो जाता है (जबकि नदी में से रेल की पटरी भी बिछाई जाती है जिस पर से भारी भरकम रेल गाड़ियाँ गुज़रती हैं।) जो लोग सरलता से तथ्यों को स्वीकार कर लेते हैं वे बड़े ही साधारण मार्ग से अपने ईश्वर को पहचान कर उसकी उपासना कर सकते हैं किंतु जिनके मस्तिष्क पर शंकाओं का बोझ होता है उन्हें पत्थरों से बने हुए पुल का मार्ग अपनाना चाहिए और जो लोग सदैव ही शंकाओं तथा संदेहों के भंवर में फंसे रहते हैं उन्हें ऐसे मार्ग का चयन करना होगा जो अधिक मज़बूत हो भले ही उसमें मोड़ व जटिलता भी अधिक ही क्यों न हो।ईश्वर को पहचानने के सबसे सरल मार्ग की कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं। इस मार्ग पर चल कर ईश्वर को पहचानने के लिए जटिल व गूढ़ और कठिनाई से समझी जाने वाली भूमिकाओं की आवश्यकता नहीं होती बल्कि अत्यंत सरल शब्दों में ईश्वर को पहचनवा दिया जाता है जिसका समझना हर वर्ग और स्तर से संबंध रखने वाले व्यक्ति के लिए बहुत सरल होता है।दूसरा मार्ग वह है जो सीधे रूप से बुद्धिमान व विश्व के रचयिता ईश्वर की ओर जाता है और यह मार्ग दर्शनशास्त्र व वादशास्त्र के विपरीत है जिनमें पहले किसी ऐसे अस्तित्व की उपस्थिति सिद्ध की जाती है जिसको अपनी उपस्थिति के लिए किसी अन्य अस्तित्व की आवश्यकता नहीं होती और फिर उसके गुणों और विशेषताओं को अन्य मार्गों से सिद्ध किया जाता है।तीसरा मार्ग वह मार्ग है जो किसी भी वस्तु से अधिक प्रवृत्ति की चेतना और स्वाभाविक ज्ञान को जगाने का काम करता है और उसके विभिन्न चरणों पर चिंतन व विचार द्वारा मनुष्य अध्यात्म के उच्च स्थान पर पहुँच जाता है और वह सांसारिक परिवर्तनों और रचनाओं के पीछे ईश्वर का हाथ देखता है जिसे उसकी प्रवृत्ति भी पहचान रही होती है।इन्हीं विशेषताओं के कारण धर्मगुरुओं और ईश्वरीय मार्गदर्शकों ने इस मार्ग को आम लोगों के लिए चुना है और उन्हें इस पर चलने का निमंत्रण दिया है तथा दूसरे मार्गों को विशेष प्रकार के लोगों के लिए विशेष किया है या फिर नास्तिक बुद्धिजीवियों और ईश्वर का इन्कार करने वाले दर्शन शास्त्रियों से बहस के दौरान उसका प्रयोग किया है।ईश्वर को पहचानने का सबसे सरल मार्ग पृथ्वी पर मौजूद उसके चिन्हों के बारे में चिंतन करना है अर्थात ब्रह्मांड की सभी वस्तुएं चाहे वे पृथ्वी पर हों या आकाश पर या फिर मनुष्य के शरीर में, एक जाने पहचाने अस्तित्व को दर्शाती हैं और दिल की सूइयों को सृष्टि के रचयिता की ओर घुमाती हैं जो हर समय हर स्थान पर उपस्थित रहता है। कोई भी उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था, उद्देश्य रखने वाले व्यवस्थापक का चिन्ह होती है और पूरी सृष्टि में इस प्रकार की सूक्ष्म व्यवस्थाएं बड़ी संख्या में दिखाई पड़ती हैं जो मिल कर एक परिपूर्ण व्यवस्था की रचना करती हैं जिसे एक बुद्धिमान रचयिता ने जन्म दिया है और वही उसे सही रूप से चला रहा है। बाग़ में मिट्टी और खाद व पानी की सहायता से उगने वाले फूल, अपने विभिन्न आकर्षक रंगों और सुगंधों के साथ और सेब का पेड़ जो एक छोटे से बीज से बढ़ कर इतना बड़ा होता है और हर वर्ष ढेरों फल देता है, इसी प्रकार सारे पेड़-पौधे सब कुछ किसी का पता बताते हैं। इसी प्रकार फूलों की डालियों पर बैठी बुलबुल है जो मीठी आवाज़ में बोलती है, उसके अंडों से बच्चे बाहर आते हैं और अपनी चोंच ज़मीन पर मारते हैं। इसी प्रकार जन्म लेते ही अपनी माँ का दूध पीने वाला बछड़ा और गाय के थन में दूध का होना, यह सब कुछ उसी के चिन्ह ही तो हैं। यदि सोचा जाए तो स्तनों में दूध का होना कितनी आश्चर्य की बात है जो बच्चे के जन्म देते ही माता के स्तन में आ जाता है। वह मछलियाँ जो हर वर्ष अंडे देने के लिए सैंकड़ों किलो मीटर यात्रा करती हैं और समुद्री पक्षी जिन्हें आस-पास मौजूद हज़ारों अन्य पंछियों के घोंसलों में से अपने घोंसले का सही पता होता है और वे एक बार भी दूसरे के घोंसले में नहीं जाते और मधु मक्खियाँ, जो प्रतिदिन प्रातः अपने छत्ते से बाहर निकलती हैं और दूर-दूर जाकर फूलों का रस चूसती हैं और शाम होते ही पुनः अपने छत्तों में लौट जाती हैं, यह सब कुछ उसी का तो चिन्ह है। इन सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि मधु मक्खियाँ और गाएं अपनी आवश्यकता से कई गुना अधिक मधु और दूध देती हैं ताकि मनुष्य उनसे लाभ उठाए।इसी प्रकार मानव शरीर में ईश्वर की महान व सूक्ष्म रचनाओं के अनेक उदाहरण मिलते हैं। शरीर के विभिन्न अंगों में सामंजस्य, प्रत्येक अंग की विशेष प्रकार की करोड़ों जीवित कोशिकाओं से रचना, यद्यपि सारी कोशिकाएं एक ही कोशिका से अस्तित्व में आई होती हैं, किंतु प्रत्येक कोशिका आवश्यक पदार्थों की निर्धारित मात्रा के साथ होती है। इसके अतिरिक्त शरीर का प्रत्येक अंग अपने सही स्थान पर रहता है और विभिन्न अंगों के उद्देश्यपूर्ण व संतुलित काम, उदाहरण स्वरूप फेफड़ों द्वारा ऑक्सीजन शरीर के भीतर जाती है और फिर लाल रक्त कणों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचती है। यकृत, आवश्यक मात्रा में शर्करा बनाता है, घाव या कटने की स्थिति में नई कोशिकाएं स्वतः जन्म लेती हैं, सफ़ेद ग्लोब्यूल अथवा कणों द्वारा रोगाणुओं के विरुद्ध लड़ाई और इसी प्रकार शरीर के एक-एक अंग और एक-एक कोशिका की क्रियाएं सबकी सब उसी ईश्वर के चिन्ह ही तो हैं। प्रत्येक कोशिका एक सूक्ष्म व उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था है और कोशिकाओं का एक समूह अंग बनाता है जो एक बड़ी उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था होती है और इस प्रकार की जटिल व उद्देश्यपूर्ण व्यवस्थाओं के समूह को शरीर कहा जाता है किंतु बात यहीं पर समाप्त नहीं होती बल्कि इस ब्रह्मांड के कोने-कोने में प्राणधारी और बिना प्राण की ऐसी लाखों-करोड़ों व्यवस्थाएं मौजूद हैं जो मिल कर इस ब्रह्मांड की रचना करती हैं जिसका कोई छोर नहीं है और जो एक तत्वदर्शी व सूझ-बूझ वाले व्यवस्थापक की देख-रेख में संतुलित रूप से चल रहा है।स्पष्ट है कि मानव ज्ञान जितना बढ़ता जाएगा, प्रकृति के रहस्यों से उतना ही अधिक पर्दा उठता जाएगा और इस सृष्टि के राज़ उतने ही उजागर होते जाएंगे किंतु अब तक जिन रहस्यों से पर्दा उठ चुका है, उन्हीं पर चिंतन और विचार, पवित्र व स्वच्छ मन रखने वालों को इस संसार के रचयिता तक पहुँचा देगा और सभी का कर्तव्य है कि अपने रचयिता के बारे में सोचें। (जारी है)