islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. स्वर्गीय इमाम खुमैनी

    स्वर्गीय इमाम खुमैनी

    स्वर्गीय इमाम खुमैनी
    Rate this post

    आज स्वर्गीय इमाम खुमैनी की बरसी है। इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी का स्वर्गवास वर्ष १९८९ में हुआ था। 

    संयोग से आज ही कल इस्लाम के महापुरूष हज़रत अली अलैहिस्सलाम का भी शुभ जन्म दिवस है। इमाम ख़ुमैनी जैसे महापुरूष की बरसी पर हम उनकी दृष्टि से हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विशेषताओं की ओर संकेत करेंगे जो वास्तविक अर्थों में हज़रत अली के अनुयायी थे। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों को पैग़म्बर के उत्तराधिकारियों और परिपूर्ण मनुष्यों के रूप में पहचनवाते हैं और इन लोगों में वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम के प्रति विशेष श्रद्वा और निष्ठा रखते हैं और वे उनको विशेष महत्व देते हैं क्योंकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम का शुभ अस्तित्व हज़रत मुहम्मद के हाथों निखारा गया था। जिस प्रकार से हज़रत मुहम्मद (स) मानवता के शिक्षक हैं उसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम के पश्चात हज़रत अली भी मानवता के शिक्षक रहे हैं। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के प्रति अपनी विशुद्ध भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ईश्वर की अनंत कृपा और हमारा सलाम हो पैग़म्बरे इस्लाम पर जिन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम जैसे ईश्वरीय अस्तित्व का अपनी छत्रछाया में प्रशिक्षण किया और उन्हें मानवता को सुशोभित करने वाली परिपूर्णता तक पहुंचाया। ईश्वर की कृपा हो हमारे स्वामी पर जो मानव आदर्श और बोलता हुआ क़ुरआन है और अनंत काल तक उनका महान नाम सदा बाक़ी रहेगा और वे मानवता के लिए आदर्श तथा ईश्वर के महान नामों का प्रतीक हैं। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ईश्वर के योग्य दास थे जो जीवन के सही मार्ग पर चलने में दूसरों से बहुत आगे थे। उन्होंने अपने जीवन को सच्चे मार्गदर्शकों की जीवनशैली से बहुत निकट कर लिया था और वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसरण का प्रयास करते थे। इतिहास के इस महापुरूष ने, जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) के वंशज थे, अत्याचार का डटकर मुक़ाबला किया और अपने अस्तित्व से संसार को सुगन्धित कर दिया।स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विशेषताओं को अपने भीतर उतार कर उन्हें प्रतिबिंबित करने का प्रयास किया और इस माध्यम से वे सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, तथा नैतिक क्षेत्रों को पूरी शक्ति से बहुत प्रभावित करने में सफल रहे। इमाम ख़ुमैनी की बहुत सी विशेषताएं, हज़रत अली अलैहिसस्लाम की उच्च विशेषताओं से प्रभावित थीं इसीलिए इस प्रकाशमान सूर्य की चमक को देखकर लोगों के मन-मस्तिष्क में हज़रत अली का चरित्र जीवित हो उठता है। इमाम अली अलैहिस्सलाम के बारे में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि अली (अ) क़ुरआन और इस्लाम का व्यवहारिक रूप हैं। इमाम ख़ुमैनी का व्यक्तित्व, कि जिन्होंने इस्लामी राष्ट्र का नेतृत्व किया, कुछ इस प्रकार का था जिसमें विरोधाभासी विशेषताएं इकट्टठा हो गई थीं। हमको एसे परिपूर्ण व्यक्ति का अनुसरण करना ही चाहिए जो हर क्षेत्र में इस प्रकार से दक्ष हो कि हर क्षेत्र के विशेषज्ञ जिसका सम्मान करने पर विवश हों। यदि कोई किसी भी क्षेत्र के लिए उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता है तो वह उनका ही उदाहरण प्रस्तुत करता है। ईश्वरीय भय व ज्ञान के आयाम से वंचितों और दरिद्रों की सहायता करने के आयाम से तथा युद्ध और वीरता के आयाम से, सारांश यह कि हर आयाम से उनका उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। वास्तव में वे एक बहुआयामी अस्तित्व हैं और हमको एसे व्यक्ति का अनुसरण करना ही चाहिए। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इन वास्तविकताओं की ओर संकेत करते हैं कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम जहां एक ओर ईश्वर का भय रखने वाले और उसकी गहन पहचान रखने वाले थे वहीं योद्धा भी थे और वे धर्म के शत्रुओं से युद्ध करते थे। ईश्वर के मार्ग में युद्ध करने वाला होने के साथ ही वे ज्ञानी भी थे और उन्हीं परिस्थितियों में वे आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहते थे। उन्ही परिस्थितियों में राजनीति व सत्ता के क्षेत्र में भी उपस्थत रहते। इसी के साथ परिवार और बच्चों का प्रशिक्षण, ईश्वर की उपासना तथा ईश्वर एवं समाज के साथ संबन्धों को भी नहीं छोड़ते थे। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी हज़रत अली अलैहिस्सलाम को शक्ति एवं सत्ता के आकर्षण के मुक़ाबले में एक परिपूर्ण आदर्श की संज्ञा देते हुए कहते हैं कि अली के हाथों में सत्ता, साधन है लक्ष्य नहीं। एसा साधन जिसके माध्यम से अधिकारों को दिलाया जा सके और असत्य को समाप्त किया जाए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इब्ने अब्बास को सत्ता की वास्तविकता के बारे में बताते हुए एक जूते की ओर इशारा किया और कहा था कि मेरे निकट सत्ता का मूल्य इससे भी कम है परन्तु यह कि सत्ता के माध्यम से मैं हक़ अर्थात क़ानून और इस्लामी व्यवस्था को लागू करूं और असत्य अर्थात भ्रष्ट एवं अत्याचारी व्यवस्थाओं को जनता के बीच से हटा दूं।स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की दृष्टि में हज़रत अली अलैहिस्सलाम का शासन, धर्म तथा राजनीति के एक-दूसरे से अलग होने की साम्राज्यवादी एवं ग़लत विचारधारा को पूर्ण रूप से नकारता है। इस विचारधारा का लंबे समय से शत्रु प्रचार-प्रसार कर रहे थे और आज भी इसे विभिन्न शैलियों से दोहराया जा रहा है। विलायते फ़क़ीह अर्थात धार्मिक नेतृत्व के संदर्भ में वे लिखते हैं कि यह बात कि धर्म को राजनीति से अलग होना चाहिए और इस्लाम के धर्मगुरूओं को सामाजिक तथा राजनैतिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए वर्चस्ववादियों की ओर से कही और फैलाई गई है ताकि धर्म को सांसारिक मामलों में प्रयोग करने और मुसलमानों की सामाजिक व्यवस्था से अलग किया जा सके। क्या पैग़म्बरे इस्लाम (स) के काल में धर्म, राजनीति से अलग था? क्या हज़रत अली के सत्ताकाल में धर्म और राजनीति एक दूसरे से अलग थे? हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सरकार की स्पष्ट विशेषता सामाजिक न्याय की स्थापना है। जनकोष के प्रयोग तथा आवश्यकता रखने वालों के बीच धन के वितरण की जो न्यायपूर्ण शैली हज़रत अली ने अपनाई उसकी मुसलमान तथा ग़ैर मुसलमान विद्वानों ने बहुत प्रशंसा की है। इमाम ख़ुमैनी, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के लगभग पांच वर्ष के सत्ताकाल को आदर्श बताते हुए कहते हैं कि हर प्रकार की समस्याओं तथा कठिनाइयों के बावजूद, जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम के लिए उत्पन्न की गईं, उनका पांच वर्षीय सत्ताकाल एसा रहा जिसके लिए उत्सव मनाना चाहिए। यह उत्सव न्याय और न्याय की स्थापना के लिए हो। उसके पश्चात वे अधिकारियों को नसीहत करते हुए कहते हैं कि सत्ता से लगाव न रखने और न्याय की स्थापना में उन्हें हज़रत अली अलैहिस्सलाम का अनुसरण करना चाहिए।इमाम ख़ुमैनी धार्मिक मूल्यों, आस्थाओं तथा ईश्वरीय सीमाओं का ध्यान रखने को अपने स्वामी अली की भांति विशेष महत्व देते थे और इसी विशेषता के कारण उन्होंने वर्चस्ववाद तथा तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष को अपने कार्यक्रम में सर्वोपरि रखा था। वे इस सेवा या कार्य को धार्मिक दायित्व मानते थे। यही कारण है कि कमियों और उल्लंघनों ने उन्हें कभी भी निराश नहीं किया और विजय तथा अनुयाइयों की भारी संख्या उनके भीतर कभी भी घमण्ड उत्पन्न नहीं कर सकी। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इस बात को खुलकर कहते थें कि यह नहीं हो सकता कि शत्रुओं के अतिक्रमण के मुक़ाबले में ख़ुमैनी मौन धारण कर ले और शांत रहे या फिर मुसलमानों के निरादर और अपमान पर मूक दर्शक बना रहे। बड़ी शक्तियों और उनके पिट्टठुओं को जान लेना चाहिए कि यदि ख़ुमैनी अकेला भी रह जाए तब भी वह अपने मार्ग पर आगे बढ़ता रहेगा।ईरान की इस्लामी क्रांति के उतार-चढ़ाव भरे मार्ग पर इमाम ख़ुमैनी कभी भी नहीं डगमगाए और कठिन परिस्थितियों में उनके भीतर का उल्लास और वास्तिविक शांति उनके मुख से स्पष्ट होती थी। इसीलिए उन्होंने दूसरों को प्रभावित किया और उनको उज्जवल भविष्य के प्रति आशान्वित किया।इमाम ख़ुमैनी के भीतर उच्च विशेषताएं और महान गुण एकत्रित थे। जहां एक ओर वे बहुत ही विनम्र और भावुक थे वहीं पर संघर्ष के दौरान इतने साहस के साथ बोलते थे कि महाशक्ति उनकी प्रतिक्रियाओं से भयभीत रहती थीं। इसी के साथ जब आध्यात्म की ओर मुड़ते थे तो उनकी विनम्र बातों को सुनकर लोग चकित रह जाते। जहां वे एक ओर अमरीका जैसी महाशक्ति के सामने डटे हुए थे और उन्होंने अमरीका के बारे में कहा था कि “अमरीका कुछ बिगाड़ नहीं सकता वहीं पर वे बहुत प्रसन्न और प्रेम से युवाओं का निकाह पढ़ते थे और बच्चों के सिर पर अपने स्नेहमयी हाथ फेरते थे। इस्लामी ज्ञान और ईश्वरीय पहचान में वे दक्ष थे और इस बारे में उन्होंने मूल्यवान पुस्तकें लिखी हैं किंतु उन्होंने इन दो विशेषताओं को सदैव एक-दूसरे से अलग रखा। यही कारण है कि एसी महान एवं उच्च आत्मा होने के बावजूद उन्होंने एक आम व्यक्ति की भांति उपासना की और इस्लामी नियमों का अनुसरण किया। इराक़ में निर्वासन के जीवन के दौरान उन्होंने एक दिन के लिए भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के रौज़े की ज़ियारत नहीं छोड़ी। उन्होंने इराक़ की तत्कालीन सुरक्षा व्यवस्था के प्रमुख सादून शाकिर से कहा था कि मैं उन सय्यदों में से नहीं हूं कि ज़ियारत जैसे दायित्व को भुला बैठूं।ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई के कथनानुसार उस महापुरूष के भीतर ईश्वर की शक्ति, अच्छे कार्यों के साथ दृढ संकल्प, उच्च साहस के साथ नैतिक साहस, तत्वदर्शिता के साथ आध्यात्मिक व आत्मिक शुद्धता, होशियारी व बुद्धिमानी के साथ ईश्वरीय भय, दृढ़ता के साथ दृढ नेतृत्व और कृपा साथ थे और यह समस्त विशेषताएं उनमें एकसाथ मौजूद थीं। इमाम ख़ुमैनी ने अपने व्यवहारिक जीवन में इस बात का प्रयास किया कि आत्मनिर्माण, उपासना, और पवित्रता के साथ निष्ठा के मार्ग को अपनाए और स्वयं को अपने मार्गदर्शक अर्थात इमाम अली के निकट कर लें। सभी लोगों ने इस वास्तविकता को स्वीकार किया है कि संघर्षकाल के आरंभ से अपने अन्तिम समय तक इमाम ख़ुमैनी ने अपने समस्त प्रयासों का केन्द्र झूठ के विरुद्ध संघर्ष को बनाया था। ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता भी इमाम के विभूतिपूर्ण अस्तित्व के कारण ही संभव हुई जिसने अत्याचार, तानाशाही, और वर्चस्ववाद का सफ़ाया किया। आज भी इस्लामी जगत में इस्लामी जागरूकता की जो लहर दिखाई दे रही है वह भी इमाम खुमैनी की दूरदर्शिता और उनके कुशल मार्गदर्शन का ही परिणाम है। इमाम ख़ुमैनी के बारे में एक वरिष्ठतम धर्मगुरू स्वर्गीय आयतुल्लाह मुहम्मद अली अराकी कहते हैं कि ५० वर्षों की जो मेरी उनसे जान पहचान है उस दौरान मैने उनके भीतर ईश्वरीय भय, परोपकार, वीरता, पुरूषार्थ, आत्मसम्मान और ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहने जैसी विशेषताओं को ही देखा। इस महापुरूष ने पूरे साहस के साथ असत्य तथा अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष किया और ईश्वर ने भी उनका साथ दिया। वे अपने पूर्वज हज़रत अली इब्ने अबी तालिब की भांति थे और किसी से नहीं डरते थे।स्वर्गीय इमामा ख़ुमैनी के मतानुसार हज़रत अली अलैहिस्सलाम विशेष व्यक्तित्व के स्वामी थे। यही कारण है कि हज़रत अली (अ) की विशेषताएं गिनवाने में वे स्वयं को अक्षम बताते हुए कहते हैं कि हज़रत अली की तारीफ़ नहीं हो सकती। उनके संबन्ध में कवियों, साहित्यकारों, तत्वदर्शियों, दर्शनशास्त्रियों और अन्य लोगों ने जो कुछ भी कहा है वह उसका लेशमात्र है जो वह हैं अतः हमें उनके शुभ अस्तित्व के समक्ष क्षमा मांगनी चाहिए कि आपकी विशेषताओं का उल्लेख करने में अक्षम हैं और आपकी परिपूर्णता की व्याख्या हमसे नहीं हो सकती।