islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की अहादीस

    हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की अहादीस

    Rate this post

    हज़रत इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम की अहादीस (प्रवचन)

    अपने प्रियः अध्ययन कर्ताओं के लिए यहाँ पर    हज़रत इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम  के चालीस  मार्ग दर्शक कथन प्रस्तुत किये जारहे है।

    1- विश्वास

     हज़रत इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि दुखित करने वाली विपत्तियों मे प्रसन्न रहना प्रथम श्रेणी का विश्वास है।

    2- आत्मा की महानता

     हज़रत  इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो व्यक्ति महान आत्मा रखता है वह संसार को निम्ण समझता है।

    3- संसार महत्ता का तत्व नही है

     हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि  महत्वपूर्ण व्यक्ति वह है जो संसार को अपनी महत्ता का तत्व न समझे

    4- असत्य से दूरी

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि झूट से बचो चाहे वह छोटा हो या बड़ा चाहे वह मज़ाक़ (मनोविनोद) मे कहा गया हो या वास्तव मे बोला गया हो।क्योकि जो छोटा झूट बोलता है उसको बड़ा झूट बोलने का भी मनो बल प्राप्त होता है।

    5- आत्म रक्षा

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि समस्त भलाई इसमे है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व की रक्षा करे।

    6- बुरी संगत

     हज़रत इमाम   सज्जाद  अलैहिस्सलाम ने कहा कि—-

    1-कभी झूट बोलने वालों के पास न बैठो क्योंकि वह मरीचिका के समान है।वह क़रीब(समीप) को आप से दूर व दूर को आपसे क़रीब करता है।

    2- कभी फ़ासिक़ (अल्लाह के आदेशों की खुले आम अवहेलना करने वाला) के पास न बैठो क्योंकि वह आपको एक लुक़्मे या इससे भी कम पर बेंच देगा।

    3-कभी कंजूस के पास न बैठो क्योकि वह तुम्हे तुम्हारी अवश्यकता के समय छोड़ देगा।

    4- कभी मूर्ख के पास न बैठो क्योंकि वह आपको लाभ पहुचाना चाहेगा परन्तु आपको हानि होगी।

    5- कभी भी उसके पास मत बैठो जिसने अपने रक्त सम्बन्धियों से नाता तोड़ लिया हो क्योंकि कुऑन ने ऐसे व्यक्ति को मलऊन कहा है। मलऊन अर्थात अल्लाह की दया व कृपा से दूर।

    7- व्यर्थ बोलने से दूरी

     हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने  कहा कि मुसलमान के अध्यात्म की विशेषता यह है कि वह न व्यर्थ बोलता है न व्यर्थ बहस करता है। वह धैर्यवान,संतोषी व सदाचारी होता है।

    8- कार्यों का अंकन

     हज़रत इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ आदम की संतानों अगर तुम अपनी आत्मा को नसीहत करते रहो, अपने कार्यों का अंकन करते रहो व अल्लाह के भय को अपने ऊपर व पारसाई को अपने अन्दर स्थान दो तो कभी भी ख़ैर (भलाई) से दूर नही हो सकते हो।

    9- दुआ का परिणाम

     हज़रत इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि मोमिन अपनी दुआ से तीन परिणाम प्राप्त करता है। या उसकी दुआ दुनिया मे पूरी हो जाती है। या उसके लिए परलोक मे जमा हो जाती है। या उससे विपत्तियाँ दूर हो जाती है।

    10- विवाहित की नमाज़

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि विवाहित व्यक्ति की दो रकत नमाज़ अविवाहित की सत्तर रकत नमाज़ से श्रेष्ठ है।

    11- मुक्ति के उपाय

      हज़रत इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि तीन वस्तुऐं मोमिन की मुक्ति का कारण हैं ।

    1-लोगों की चुग़ली न करना।

    2-अपने आपको उन कार्यों मे वयस्त रखना जो उसे संसार व परलोक मे लाभ पहुँचाए।

    3-अपने पापों पर रोना। (परायश्चित करना)

    12- स्वर्ग का अभीलाषी

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो स्वर्ग का अभिलाषी है उसे चाहिए कि अच्छाईयों की ओर बढे व बुराईयों से दूर रहे। जो नरक से भय खाता है उसे चाहिए कि अपने पापों की अल्लाह से माफ़ी माँगे और हराम की हुई चीज़ो से दूर रहे।

    13- मोमिन को देखना

     हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि एक मोमिन का दूसरे मोमिन के चेहरे को प्रेम पूर्वक  देखना इबादत है।

    14- पारसाई

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह को इससे प्रियः कोई बात नही लगती कि कोई उसको पहचान ने के बाद अपने आपको पारसा बना ले।

    अल्लाह इस बात को भी प्रियः रखता है कि उससे प्रत्येक वस्तु माँगी जाये।

    15- क्षमा

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि अगर एक व्यक्ति आपकी दाहनी ओर खड़ा होकर आपको अपशब्द कहे और बाँयी ओर आकर क्षमा माँगले तो उसको क्षमा कर दो।

    16- अल्लाह का बन्दो पर अधिकार

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि अल्लाह का अधिकार यह है कि उसकी इबादत की जाये तथा किसी दूसरे को उसका सम्मिलित न किया जाये। अगर निस्वार्थ रूप से ऐसा किया जाये तो अल्लाह की ज़िम्मेदारी है कि वह तुम्हारे संसारिक व परलोकीय कार्यों को सुधारे तथा जो तुम  उससे चाहे तुम्हे दे।

    17- पिता का पुत्र पर अधिकार

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि अपने पिता के अधिकार को जानो क्योंकि वह तुम्हारी जड़ है तथा तुम उसकी शाख़ा हो । जानलो कि अगर वह न होता तो तुम भी न होते। जिस समय भी अपने अन्दर कोई ऐसी चीज़ देखो जिससे तुम्हे प्रसन्नता हो तो जानलो कि वह तुमको तुम्हारे पिता से मिली है। क्योंकि तुम्हारी प्रसन्नता व नेअमत का आधार तुम्हारे पिता है। तुम्हे चाहिए कि अल्लाह का धन्यवाद करो।

    18- अल्लाह की अज्ञा पालन

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि अल्लाह तथा उन लोगों की अज्ञा पालन को जिनकी अज्ञा पालन को अल्लाह ने अनिवार्य किया है प्राथमिकता दो ।

    19- माता का संतान पर अधिकार

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि तुम्हारे ऊपर तुम्हारी माता का अधिकार यह है कि  तुम यह जान लो  कि उसने तुमको वहां उठाया जहाँ कोई किसी को उठा नही सकता। उसने इस प्रकार अपना दूध तुमको पिलाया कि कोई दूसरा नही पिला सकता। वह माता ही है जिसने प्रसन्नता पूर्वक अपने हाथों पैरों आँखों कानों व बालों को तुम्हारी देख रेख के लिए ढाल( कवच) बना दिया। समस्त दुख दर्द को तुम्हारे जन्म के समय तक सहन किया। वह तुम्हारा पेट भरकर व स्वंय भूकी रहकर तथा तुम्हे ढक कर व स्वंय खुली रहकर तुम्हे पानी पिलाकर व स्वंय प्यासी रहकर तुम्हे साये मे रख कर व स्वंय धूप मे रहकर खुद संकट मे रहकर व तुम्हे सुखः प्रदान करके  खुद जाग कर व तुम्हे सुला कर के भी प्रसन्न रहती थी। उसका पेट तुम्हारे अस्तित्व का ठिकाना तथा उसकी गोद तुम्हारे आराम की जगह  व उसके स्तन तुम्हारे जलपान का केन्द्र थे तथा उसकी जान सदैव तुम पर निछावर थी। उसने संसार के समस्त कष्टों को तुम्हारे कारण सहन किया इस सब को दृष्टि मे रख कर अपनी माता के स्थान को पहचानो व तुम इतनी सामर्थ्य नही रखते हो  कि ऐसा कर सको परन्तु अल्लाह की सहायता से।

    20- ज्ञान

    हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि अगर मनुष्य यह जान ले कि ज्ञान मे कितना लाभ है तो उसको अपने दिल का खून बहाकर व भँवर मे फसकर भी प्राप्त करे।

    21- पवित्र व्यक्तियों की संगत मे बैठने की महत्ता

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि पवित्र लोगों की संगत पवित्रता की ओर बुलाती है व ज्ञानीयों की संगत बुद्धि को बढाती है।

    22- वह पाप जो दुआ की स्वीकृति के मार्ग मे बाधक हैं

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि बद नियती, आन्तरिक अपवित्रता, अपने भाईयों के साथ विशवासघात, दुआ के स्वीकृत होने मे आस्था न रखना, अपनी वाजिब नमाज़ों को देर से पढ़ना, दान व सहायता के त्याग के कारण अल्लाह से दूर हो जाना तथा अपशब्द बोलना ऐसे पाप हैं जिनके कारण दुआ स्वीकृत नही होती।

    23- अमरता को त्यागने वाले

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि आश्चर्य है ऐसे लोगों पर जो नशवरीय संसार के लिए तो कार्य करते हैं, परन्तु अमर रहने वाले परलोक के लिए कार्य नही करते।

    24- दोष लगाने का फल

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो लोगों पर उस चीज़ का दोष लगाता जो उनमे पायी जाती है। तो वह उस पर उन चीज़ों का दोष लगायेंगे जो उसमे नही पायी जाती हैं।

    25- संसार मार्ग है लक्ष्य नही है

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि अल्लाह के नेक बन्दे संसास मे संसार प्राप्ति के लिए कार्य नही करते बल्कि वह संसार मे परलोक के लिए कार्य करते हैं।

    26- अल्लाह की शरण

     हज़रत इमाम  सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि ऐ अल्लाह मैं हिर्स, क्रोध की तीव्रता, ईर्ष्या व बुरा संरक्षण करने से बचने के लिए तेरी शरण चाहता हूँ।

    27- पापीयों के पास बैठने से मना

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि पापीयों के पास बैठने, अत्याचारीयों की सहायता करने व अल्लाह के आदेशों की अवहेलना करने वालों से बचो उनके उपद्रव से चौकस रहो तथा उनसे दूर रहो।

    28- अल्लाह के दूतों के विरोध का फल

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि यह जानलो कि जो अल्लाह के नुमाइन्दों( दूतों) का विरोध करे व अल्लाह के धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म का अनुसरण करे व अल्लाह के दूतों को छोड़ कर अपनी राय को मनवाने के लिए बल दे तो ऐसे व्यक्ति को नरक की आग मे डाला जायेगा।

    29- अल्लाह की शक्ति व उसका समीपय

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह से डरो क्योंकि व तुम से शक्तिशाली है। अल्लाह से लज्जा व शर्म करो क्योंकि वह आपसे बहुत क़रीब(समीप) है।

    30- मित्रता व शत्रुता

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि किसी से भी  शत्रुता न करो चाहे आप यह भी सोचते हों कि वह आपको कोई हानि नही पहुँचा सकता। व इसी प्रकार किसी से मित्रता समाप्त न करो चाहे आप यह सोचते हो कि वह आपको कोई लाभ नही पहुचा सकता।

    31- कान का  फल

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि प्रत्येक वस्तु के लिए एक फल है तथा कान का फल  पवित्र कथन है।

    32- आत्मा का आदर

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा को आदरनीय समझेगा उसकी दृष्टि मे संसार की कोई महत्ता न होगी।

    33- सत्यता व वफ़ादारी

     हज़रत इमाम    सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि समस्त कार्यों की अच्छाई सत्यता मे है तथा समस्त कार्यों का अच्छा अन्त वफ़ादारी मे है।

    34- चुग़ली

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि चुग़ली करने से बचो क्योंकि यह नरकीय कुत्तों का भोजन है।

    35- दानि व कंजूस

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि सख़ी( दानि)  अपनी दानशीलता से प्रसन्न होता है। व कंजूस  अपने माल पर फ़ख्र (गर्व) करता है।

    36- स्वर्ग का लिबास(परिधान)

     हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि अगर कोई किसी मोमिन को पहनने के लिए वस्त्र देगा तो अल्लाह उसको स्वर्ग मे हरे रंग का परिधान देगा।

    37- मोमिन का व्यवहार

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि मोमिन का व्यवहार यह है कि वह तंगी के समय मे भी दान करता है। तथा जब उसके पास धन की अधिकता होती है तो वह उस अधिकता के अनुसार दान करता है। वह मनुष्यों के मध्य न्याय स्थापित करता है व दूसरों को  सलाम करने मे प्राथमिकता करता है।

    38- सुख मय जीवन

     हज़रत इमाम   सज्जाद  अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं किसी के लिए भी यह पसंद नही करता कि वह संसार मे केवल सुखमय जीवन व्यतीत करे और कोई कष्ट न झेले।

    39- शीघ्र मिलने वाले दण्ड व पुरूस्कार

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि दूसरों के साथ की गई भलाई का फल अन्य पुण्यों की अपेक्षा शीघ्र प्रदान किया जायेगा। तथा अत्याचार का दण्ड अन्य पापों की अपेक्षा शीघ्र दिया जायेगा।

    40- दुआ व विपत्तियाँ

     हज़रत इमाम   सज्जाद अलैहिस्सलाम  ने कहा कि दुआ विपत्तियों को टालती है यहां तक कि अनिवार्य रूप से आने वाली विपत्तियों को भी टाल देती है। दुआ आई हुई व आने वाली समस्त  विपत्तियों को टाल देती है।