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    हज़रत ख़दीजा (स.) की जीवन की एक झलक

    हज़रत ख़दीजा (स.) की जीवन की एक झलक
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    हज़रत खदीजा (स) की सीरत को उनको उन चंद सफ़हात में नही समेटा जा सकता, आपकी सीरते मुबारका के एक पहलू को पैग़म्बरे अकरम (स) की ज़बानी, पहले हमने यहाँ बयान किया है अब हम आपकी ज़िन्दगी के क़ीमती सफ़हात में कुछ की तरफ़ इशारा कर रहे हैं। जब अक़ील ए क़ुरैश और अमीने क़ुरैश की मुशतरक ज़िन्दगी का आग़ाज़ हुआ तो हज़रत अबू तालिब (स) अपने भतीजे की सर नविश्त से परेशान नज़र आ रहे थे। लिहाज़ा जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) हज़रत ख़दीजा (स) के घर की जानिब तशरीफ़ ले जा रहे थे तो हज़रत अबू तालिब (अ ने एक कनीज़ को भेजा ता कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) और हज़रत खदीजा (स) की मुशतरका ज़िन्दगी का मुशाहिदा करे।
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    उस कनीज़ का नाम नबआ था वह जब हज़रत अबू तालिब (अ) की ख़िदमत में आई तो यूँ अर्ज़ किया: जब मुहम्मद अमीन (स) घर की चौखट पर पहुचे तो हज़रत ख़दीजा (स) आप के इस्तिक़बाल के लिये चौखट पर तशरीफ़ लायीं। पैग़म्बर (स) का हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रखा और अर्ज़ करने लगीं: मेरे माँ बाप आप पर क़ुरबान जायें। मैंने यह अमल इस लिये अंजाम दिया है कि उम्मीद रखती हूँ कि आप वही पैग़म्बरे मौऊद हैं जो इस सर ज़मीन के लिये इंतेख़ाब होगा, बस अगर ऐसा ही हुआ तो मेरे तवाज़ो और ख़ुलूस की बेना पर मेरे हक़ में दुआ ए ख़ैर कीजियेगा। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने भी जवाब में फ़रमाया: अगर ऐसा हुआ तो तुम्हारा यह अमल हरगिज़ बर्बाद न होगा और मैं उसे हरगिज़ न भूलूँगा।
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    हज़रत खदीजा (स) ज़िन्दगी के तमाम तल्ख़ व शीरीं हवादिस में बेसत के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स) की शरीके ग़म रहीं, हमेशा आपकी सलामती की ख़्वाहाँ थी, अपने ग़ुलामों व ख़िदमतगारों को पैग़म्बरे इस्लाम (स) की तलाश में भेजा करती थीं। यहाँ तक कि बाज़ मवारिद में ख़ुद पैग़म्बर (स) की तलाश में निकल पड़ती थीं और कभी कभी ग़ारे हिरा तक पैग़म्बर (स) के हमराह रहा करती थीं। एक मर्तब आप गज़ा की शक्ल में ज़ादे सफ़र लिये हुए जबलुन नूर के मुश्किल रास्ते तय करती हुईं पहाड़ की चोटी पर ग़ारे हिरा में पैग़म्बर (स) की ख़िदमत में शरफ़याब हुईं, पैग़म्बरे इस्लाम (स) को सही सालिम पाकर बहुत ख़ुश हुईं और अपनी थकावट को भूल गई, क़ासिदे वही नाज़िल हुआ और आपकी ज़हमात का शुक्रिया अदा करते हुए गोया हुआ: ऐ अल्लाह के रसूल, ख़ुदावंदे आलम और मुझ जिबरईल का सलाम हज़रत ख़दीजा (स) की ख़िदमत में पहुचाईये और उन्हे जन्नत में मोतियों के महल की बशारत दीजिये। जिस में किसी क़िस्म का रन्ज व अंदोह न होगा।
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    एक मरतबा जब कुछ अरसे तक क़ासिदे वही पैग़म्बरे इस्लाम (स) पर नाज़िल न हुआ हो तो आप का क़ल्बे मुबारक परेशान हो रहा था कि हज़रत खदीजा (स) ने पैग़म्बर (स) को तसल्ली दी और कहने लगीं: ख़ुदा की क़सम, ख़ुदावंदे आलम हरगिज़ आपको ख़्वार न करेगा, आप सिल ए रहम के पाबंद हैं, आप लोगों की मुश्किलात को बर तरफ़ किया है, बेकसों और लाचारों की मदद की है लोगों के ग़मख़्वार रहे हैं, गुफ़तार में सच्चे और किरदार में पाक रहे हैं। अबू लहब और उस की ज़ौजा उम्मे जंगल से काँटे उठा कर पैग़म्बर (स) के रास्ते में डाल देते थे, हज़रत ख़दीजा (स) अपने ग़ुलामों को हुक्म देती थीं कि रास्ते से काँटों को हटा कर दूर फेका जाये। शेअबे अबी तालिब में तीन साल तक माली व इक़्तेसादी मुहासरे में ज़िन्दगी बसर हो रही है जिसमें किसी को रफ़्त व आमद की इजाज़त न थी। अगर हज़रत ख़दीजा (स) का माल व दौलत न होता तो शायद सब के सब भूखे मर गये होते।
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    आप खाने पीने का सामान अपने भतीजे हकीम बिन हेज़ाम के ज़रिये कई गुना क़ीमत पर मुहय्या करती थीं और ज़हमात बर्दाश्त करके शेबे में पहुचाती थीं ताकि भूख व प्यास दूर की जा सके।[24] हज़रत ख़दीजा (स) पूरे 25 साल रिसालत के घर का चमकता हुआ सितारा रहीं। आप की दिलकश और निशात बख़्श निगाहें पैग़म्बरे रहमत (स) के लिये घर में तसल्ली बख़्श थीं लेकिन सद अफ़सोस कि आप की रेहलत से रंज व ग़म के दरिया अपनी मौजें लिये हुए पैग़म्बर (स) के दिल पर टूट पड़े। यह जान लेवा वाक़ेया हिजरत से तीन साल पहले बेसत के दसवें साल दस रमज़ान को पेश आया।