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    हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने कर्बला को अमर बना दिया

    हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने कर्बला को अमर बना दिया
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    अबनाः हज़रत ज़ैनब इस्लामी इतिहास में एक महान महिला का नाम है जो आसमान पर जगमगा रहा है कि जिसका व्यक्तित्व उच्चतम नैतिक गुणों का संपूर्ण आदर्श है। ऐसी महिला जिसने अपने नर्म, दयालु व मेहरबानी दिल के साथ मुसीबतों के पहाड़ों को सहन किया।
    लेकिन इस महान हस्ती की प्रतिबद्धता, हक़ व सच्चाई की रक्षा के रास्ते में तनिक भी न डगमगाया। जी हां बात सानी-ए-ज़हरा (स) हज़रत ज़ैनबे कुबरा सलामुल्लाह अलैहा के संबंध में हो रही है जिन्होंने अपनी क़ीमती ज़िंदगी, इस्लाम और उसके वास्तविक मूल्यों की रक्षा में गुज़ार दी। अल्लाह का दुरूद व सलाम हो उस महान महिला पर जिसने अपने ख़ुत्बों से अपने दौर में अन्याय के आधार को तबाह करके रख दिया।
    सानी-ए-ज़हरा (स) हज़रत ज़ैनबे कुबरा (स) के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की जा सकती है। वास्तव में पैगंबर मोहम्मद (स.), हज़रत अली (अ) और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) जैसी इलाही व आसमानी हस्तियों के दामन में प्रशिक्षण पाने वाली हस्ती निश्चित रूप से महान और बेमिसाल विशेषताओं से मालामाल होगी। आप जानते हैं कि हज़रत ज़ैनब (स) की ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण अध्याय कर्बला का अमर आंदोलन और आशूरा की घटना से कनेक्टेड है। अमवी शासकों के खुल्लम खुल्ला गुनाहों, अत्याचारों और अन्याय व भ्रष्टाचार के विरुद्ध इमाम हुसैन अ. के आंदोलन के सभी चरणों में हज़रत ज़ैनब (स) अपने भाई इमाम हुसैन (अ) के साथ कंधे से कंधा मिला कर रहीं। अपनी भाई इमाम हुसैन (अ) से हज़रत ज़ैनब (स ) के प्यार और दिली लगाव का उदाहरण इतिहास पेश नहीं कर सका।
    किताबों में मिलता है कि जब तक आप अपने भाई का दर्शन नहीं कर लेती थीं आपको सुकून नहीं मिलता था लेकिन अल्लाह तआला से हज़रत ज़ैनब (स) का लगाव को बयान करना हमारे बस से बाहर है।
    अल्लाह की ऐसी मुहब्बत जिसने आपको अल्लाह के आदेशों के पालन और उस पर अमल के लिए वक़्फ़ कर दिया था, इसीलिए हज़रत ज़ैनब (स) ने अच्छी जिंदगी और राहत व आराम को ठुकराते हुए अपने बच्चों के साथ अत्याचार और जेहालत के विरुद्ध संघर्ष की राह में पेश आने वाले दुखों व कष्टों को स्वीकार कर लिया और उसे आराम पर प्राधमिकता दी। इसी लिये कर्बला में अंसार व असहाब की शहादत के बाद हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने अपने प्रियजनों के बलिदान और बच्चों को राहे ख़ुदा में क़ुर्बान कर देने जैसी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी अल्लाह का शुक्र अदा किया और कहीं भी निराशा नहीं दिखाई। आपने पूरे घर की शहादत के बाद भी पूरी रात अल्लाह की इबादत में गुज़ार दी। यही कारण है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपनी बहन ज़ैनब स. के अल्लाह से लगाव और इबादत पर इस हद तक यकीन रखते थे कि आशूर को आख़री विदा के लिए जब बहन के पास आये तो फ़रमाया मेरी बहन ज़ैनब नमाज़े शब में मुझे भूलना नहीं।
    हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की पूरी ज़िंदगी सब्र व बहादुरी से भरी हुई है। हज़रत ज़ैनब (स) ने कर्बला के मैदान में अपने भाई भतीजों, बच्चों और रिश्तेदारों की शहादत के बाद सब्र का सहारा लिया लेकिन यह अपने संतोष के लिए नहीं बल्कि सब्र का सहारा इस लिए लिये कि अपने पवित्र लक्ष्यों को अमली बना सकें। उनके सब्र व संयम का उद्देश्य था इमाम हुसैन की क़ुरबानी को आम करना। इसीलिए तीरों र तलवारो से लैस दुश्मन का रोब व दबदबा मिट्टी में मिल गया। हज़रत ज़ैनब (स) के भाषण का एक एक वाक्य लोगों के दिलों में उतर जाता था। आप घर में, मस्जिद और जहां भी संभव होता लोगों के बीच स्पीच देतीं ताकि इमाम हुसैन (अ) के मिशन को भुलाया न जा सके और उनके आंदोलन को हमेशा हमेशा के लिए अमर कर दिया जाए। बंदी बनाये जाने के बाद जब हज़रत ज़ैनब (स) रसूले इस्लाम स.अ के परिवार के दूसरे बंदियों के साथ यज़ीद के दरबार में लाई गईं तो आपने अपने बेमिसाल ख़ुत्बे से जिससे आपकी बहादुरी और सासह का भरपूर अनुमान हो रहा था सब को हैरान करके रख दिया। आपने अपने ख़ुत्बे में फ़रमाया ऐ यज़ीद अगरचे आज तुमने इस मोड़ पर ला खड़ा किया है और मुझे बंदी बनाया गया है लेकिन जान ले मेरी निगाह में तेरी ताक़त कुछ भी नहीं है अल्लाह की क़सम, अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरती हूँ और उसके सिवा किसी और से शिकवा व शिकायत भी नहीं करूंगी। ऐ यज़ीद मक्कारी व हीले द्वारा तू हम लोगों से जितनी दुश्मनी सकता है कर ले।
    हम जो रसूले इस्लाम स.अ के अहलेबैत हैं उनसे दुश्मनी के लिए तू जितनी भी साज़िशें रच सकता है रच ले लेकिन खुदा की कसम तू हमारे नाम को लोगों के दिलों से नहीं मिटा सकता है। वही के चेराग़ को नहीं बुझा सकता, तू हमारी ज़िंदगी को ख़त्म नहीं कर सकता और न ही हमारे गर्व को मिटा सकता है और इसी तरह तू अपने दामन पर लगे कलंक को भी कभी नहीं धो सकता है, अल्लाह का धिक्कार व अभिशाप हो ज़ालिमों और अत्याचारियों पर।
    हज़रत ज़ैनब (स) कर्बला की घटना के बाद ज़्यादा दिन तक ज़िंदा नहीं रहीं लेकिन इसी कम से समय में कोशिश की कि लोगों के मन पर पड़े अज्ञानता और गुमराही के पर्दे को हटा दें और उन्हें लापरवाही से नेजात दिला दें और इसी तरह समाज में पैग़म्बर स. के अहलेबैत अ. की मौलिक भूमिका को उजागर करें। आप (स) लोगों को पैग़म्बर (स।) की शिक्षाओं के संदर्भ में उनकी जिम्मेदारियों से अवगत कराती रहीं।
    हज़रत ज़ैनब (स) एक महान प्रचारक के रूप में अपनी ठोस और गंभीर उपायों द्वारा इमाम हुसैन (अ) की शहादत के बाद की घटनाओं और हालात को इस तरह से संभाला कि पूरे दुनिया के लिए इमाम हुसैन (अ) और उनके मिशन की सच्चाई स्पष्ट कर दी। हज़रत ज़ैनब (स) अपने भाई इमाम हुसैन (अ) की शहादत के लगभग डेढ़ साल बाद 15 रजब सन 62 हिजरी को शहादत पाई।

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