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    हज के दिनों में इमाम हुसैन अ. का मक्का छोड़ना

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    सवाल-4-  इमाम ह़ुसैन (अ.स) ह़ज के दिनों में अपना ह़ज अधूरा छोड़ कर मक्के से क्यों रवाना हो गए?

    इस सवाल की इतिहासिक निगाह से समीक्षा करने से पहले इस नुकते की ओर ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि फ़िक़्ही दृष्टिकोण से यह मशहूर बात कि इमाम ह़ुसैन (अ स) ने अपना ह़ज अधूरा छोड़ दिया सह़ी नहीं है

    , इस लिए कि इमाम ह़ुसैन अलैहिस्सलाम रोज़े तरविया यानी 8 ज़िलह़िज्जा को मक्के से बाहर निकले। (वक़अतुत तफ़, पेज 147) ) जबकि ह़ज के आमाल (जिसका आरम्भ मक्के में एह़राम बाँधने और अरफ़ात में वुक़ूफ़ करने से होता है) 9 ज़िलह़िज्जा की रात से शुरू होते हैं इसलिए मौलिक रूप से इमाम ह़ुसैन (अ स) ने ह़ज के आमाल को शुरू भी नहीं किया था कि उसे अधूरा छोड़ते, हाँ इतना ज़रूर है कि मक्का पहुंचने पर आपने उमरए मुफ़रेदा अंजाम दिया और सम्भव है मक्के में कुछ महीने रूकने के दौरान विभिन्न समयों में आपने उमरए मुफ़रेदा अंजाम दिया हो लेकिन उमरए मुफ़रेदा के आमाल अंजाम देने का मतलब यह नहीं है कि आपने आमाले ह़ज शुरू कर दिये, कुछ रिवायतों में इमाम के केवल उमरए मुफ़रेदा बजा लाने का उल्लेख हुआ है। (वसाएलुश्शिया किताबे ह़ज, बाब 7, अबवाबुल उमरा, जिल्द 2.3) इतिहासिक एतेबार से फ़िर भी यह सवाल बाक़ी रह जाता है कि बावजूद इसके कि जब मक्के के चयन का एक सबब अपने दृष्टिकोण के प्रचार के लिए उचित अवसर का हाथ आना था तो क्यों (उन ख़ास ह़ालात में जबकि इस्लामी दुनिया के विभिन्न शहरों से, मक्का, अरफ़ात और मिना के ह़ाजियों से भरने का ज़माना था तथा आपके लिए प्रचार का बहुत अच्छा अवसर हाथ आया) आपने अचानक मक्के को छोड़ दिया?
    हम इस अचानक लिए गए फ़ैसले के कारकों को संक्षिप्त रूप से कुछ इस तरह़ बयान कर सकते हैं।
    1. जान के लिए ख़तरे की सम्भावना
    इमाम ह़ुसैन अ. के कुछ कथनों से (जो आपने विभिन्न हस्तियों के प्रस्तावों के मुक़ाबले में इरशाद फ़रामाये जो मक्के से आपके जाने और कूफ़ा की ओर रवाना होने के मुखालिफ़ थे।) यह अंदाज़ा होता है कि आप मक्के में और ज़्यादा रहने को अपनी जान को ख़तरे में डालने के बराबर समझते थे, जैसा कि इब्ने अब्बास से फ़रमाते हैं कि किसी और जगह यह क़त्ल होना मुझे मक्के में क़त्ल होने से ज़्यादा पसंद होगा। (अलबिदाया वननिहाया, जिल्द 8, पेज 159)
    अबदुल्लाह बिन ज़ुबैर के जवाब में भी आपने फ़रमाया कि ख़ुदा की क़सम अगर मैं मक्के से एक बालिश बाहर क़्त्ल किया जाऊं तो मुझे मक्के में एक बालिश अन्दर क़त्ल होने से ज़्यादा प्रिय होगा, ख़ुदा की क़सम अगर मैं किसी जानवर के सुराख़ में पनाह ह़ासिल करुँ तब भी यह लोग मुझे वहाँ से बाहर खींच लायेंगे और जो कुछ मेरे बारे में इरादा रखते हैं उसे अंजाम दे कर रहेंगे। इमाम ने अपने भाई मुह़म्मद ह़नफ़िया से मुलाक़ात के बीच, अल्लाह द्वारा शांति का प्रतीक बताए गये हरम की सीमाओं में यज़ीद की तरफ़ से अपने क़त्ल किये जाने की बात साफ़ और स्पष्ट शब्दों में कही। (वक़अतुत्तफ़ पेज 152)
    जैसा कि कुछ रिवायतों में साफ़ साफ़ यह बात आई है कि यज़ीद ने कुछ लोगों को (सय्यद इब्ने ताऊस लुहूफ़ पेज 83) हथियारों से लैस करके इमाम ह़ुसैन (अ.स) के क़त्ल के लिए मक्के में भेज रखा था (पिछला रिफ़रेन्स इस किताब में उमर बिन सअद अबी वक़्क़ास को उनका अगुवा बताया गया है लेकिन दूसरी किताबों में उमर बिन सईद बिन आसिम का नाम आया है और यही सही है।)
    3. अल्लाह के ह़रम का अपमान न हो।
    उपरोक्त कथन के आगे के हिस्से में इमाम ने इस बात को याद दिलाया है कि हम नहीं चाहते कि हमारे ख़ून से अल्लाह के ह़रम का अपमान हो, अगरचे ऐसा होने पर बनी उमैय्या के ही क़ातिलों और अत्याचारियो की तरफ़ से बड़ा गुनाह अंजाम पायेगा।
    आपने यह बात अबदुल्लाह बिन ज़ुबैर की मुलाक़ात में जिसमें एक तरह़ से ख़ुद उनकी तरफ़ भी इशारा था। (कि बाद में वह मक्के में ख़ास रणनीति अपनायेंगे और यज़ीद की फ़ौज, ह़रम के सम्मान को मिट्टी में मिला देगी।)
    आप साफ़ साफ़ इबने ज़ुबैर के जवाब मे फ़रमाते हैः ”ان ابی حدثنی ان لھا کبشا بہ تستحل حرقتھا فما احب ان اکون ذلک الکبش” अलकामिल फ़ित्तारीख़, जिल्द 2, पेज 546)
    मेरे बाप इमाम अली (अ.स) ने मुझ से बयान किया कि मक्के में एक मेँढ़ा होगा जो कारण बनेगा कि उस शहर का अपमान किया जाए मगर मैं नहीं चाहता कि वह मेंढ़ा बनूँ।