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    हदिया (गिफ़्ट)

    हदिया (गिफ़्ट)
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    हिबा, हदिया (गिफ़्ट), बैंक से मिलने वाला इनाम, मेहर और विरासत

    सवाल 848: क्या हिबा और ईद के तोहफ़े (ईदी) पर ख़ुम्स वाजिब है या नहीं?
    जवाब: हिबा और हदिये (गिफ़्ट) पर ख़ुम्स नहीं है लेकिन ऐहतियात ये है कि उन में से जो कुछ सालाना ख़र्च से बच जाये उसका ख़ुम्स निकाला जाये।
    सवाल 849: क्या बैंकों और क़र्ज़-ए-हसना देने वाले इदारों से मिलने वाले इनामात पर ख़ुम्स वाजिब है या नहीं ?
    जवाब: इनामात और हदिये (गिफ़्ट) पर ख़ुम्स वजिब नहीं है।
    सवाल 850: शोहदा के घरानों को जो रक़्म शहीद फ़ाउण्डेशन से मिलती है, अगर वो सालाना ख़र्च से ज़्यादा हो तो उसमें ख़ुम्स वाजिब है या नहीं ?
    जवाब: शोहदा के घरवालों को शहीद फ़ाउण्डेशन की तरफ़ से जो हदिया (गिफ़्ट) मिलता है उसमें ख़ुम्स नहीं है।
    सवाल 851: वो रोज़ी रोटी जो बाप या भाई या क़रीबी रिश्तेदारों की तरफ़ से किसी को दिया जाता है क्या वो हदिया (गिफ़्ट) शुमार होगा या नहीं ? और देने वाला अपने माल का ख़ुम्स न देता हो तो ख़र्च लेने वाले पर उससे ख़ुम्स निकलवाना वाजिब है?
    जवाब: हिबा और हदिया (गिफ़्ट) का उन्वान उसके देने वाले के इरादे पर है और जब तक ख़र्च लेने वाले को ये यकी़न न हो के जो कुछ उसे ख़र्च के लिये दिया गया है उस पर ख़ुम्स वाजिब है, तो उस पर ख़ुम्स का निकालना वाजिब नहीं है।
    सवाल 852: क्या इंसान के लिये जाएज़ है कि वो अपने किसी माल पर साल गुज़रने से पहले उसे अपनी बीवी को हदिये (गिफ़्ट) के तौर पर दे दे जबकि उसे इल्म है कि उसकी बीवी इस माल को मुस्तक़बिल (आने वाले ज़माने) में घर ख़रीदने या ज़रूरी ख़र्च के लिये रख देगी ?
    जवाब: हाँ, ऐसा करना जाएज़ है और जो कुछ उसने अपनी बीवी को दिया है अगर वो उर्फ़-ए-आम में उस जैसे शख़्स की शान के मुताबिक़ हो और ये सिर्फ़ एक ज़ाहिरी बख़शिश और ख़ुम्स को देने से भागने के लिये भी न हो तो उस पर ख़ुम्स नहीं है।
    सवाल 854: मियाँ-बीवी ख़ुम्स से बचने के लिये ख़ुम्स की तारीख़ आने से पहले ही अपने माल की सालाना बचत को हदिये (गिफ़्ट) के तौर पर एक दूसरे को दे देते हैं। मेहरबानी करके उन के ख़ुम्स का हुक्म बयान फ़रमायेँ ?
    जवाब: ऐसी बख़शिश से कि जो सिर्फ़ ज़ाहिरी और ख़ुम्स से भागने के लिये है वाजिब ख़ुम्स साकि़त नहीं होगा।
    सवाल 855: एक शख़्स ने मुस्तहब हज बजा लाने के लिये हज कमेटी के खाते में अपना पैसा जमा करवाया, मगर ख़ाना-ए-ख़ुदा की ज़ियारत के लिये जाने से पहले ही मर गया तो उस जमा की गई रक़्म का क्या हुक्म है? क्या उस रक़्म को मरने वाले की नियाबत में हज करवाने पर ख़र्च करना वाजिब है? और क्या उस रक़्म से ख़ुम्स निकालना वाजिब है?
    जवाब: जो रसीद उसको हज कमेटी के खाते में जमा की गई रक़्म के बदले मिली है उसे मौजूदा क़ीमत के साथ मरने वाले के छोड़े हुऐ माल में शुमार किया जायेगा और अगर मरने वाले के ज़िम्मे हज वाजिब नहीं है और ना ही उसने हज की वसीयत की है तो उससे उसकी नियाबत में हज कराने पर ख़र्च करना वाजिब नहीं है और अगर उसका ख़ुम्स अदा नहीं किया गया तो सवाल की रौशनी उसका ख़ुम्स अदा करना वाजिब है।
    सवाल 856: बाप का बाग़ बेटे को हदिया या मीरास में मिला और जिस वक़्त वो बेटे को मिला था उस वक़्त उसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा न थी लेकिन उसे बेचते वक़्त उस बाग़ की क़ीमत पिछली क़ीमत से ज़्यादा है तो क्या क़ीमत बढ़ जाने की वजह से जो इज़ाफ़ा माल हासिल हुआ है उसमें ख़ुम्स वाजिब है?
    जवाब:  वोह हिबा और बेचने के नतीजे में उन दोनों से हासिल होने वाली क़ीमत में ख़ुम्स वाजिब नहीं है चाहे उन की क़ीमत बढ़ ही क्यों न गई हो मगर जब उसे तिजारत (बिजनेस) और क़ीमत ज़्यादा होने के इरादा से अपने पास रखे।
    सवाल 857: इन्श्योरेंस कम्पनी इलाज के ख़र्च के सिलसिले में मेरी क़र्ज़दार है और तय हुआ है कि आजकल में वो मेरा क़र्ज़ अदा करेगी तो क्या इन्श्योरेंस कम्पनी से मिलने वाली रक़्म में ख़ुम्स वाजिब है या नहीं ?
    जवाब: ख़ुम्स नहीं है।
    सवाल 858: क्या उस रक़्म पर ख़ुम्स वाजिब है जिसे में अपनी माहाना तन्ख़्वाह में से इस लिये बचाकर रखता  हूँ के बाद में उससे शादी के इनतेज़ाम कर सकूँ ?
    जवाब: अगर ख़ुद वही पैसा आपने बचा रखा है जो आपको तन्ख़्वाह के तौर पर मिलता है तो आप पर वाजिब है कि साल पूरा होते ही उसका ख़ुम्स अदा करें, मगर ये कि आप अनक़रीब एक दो महीने में इस रक़्म को शादी के लिये ख़र्च करना चाहें और ख़ुम्स अदा करने से बाक़ी बचे हुऐ ज़रूरी काम पूरे न कर सकें तो ख़ुम्स वाजिब नहीं है।
    सवाल 859: किताब ‘‘तहरीरूलवसीला’’ में बयान किया गया है कि औरत को दिये जाने वाले मेहर पर ख़ुम्स नहीं है? मगर फ़ौरन अदा किये जाने वाले और मुद्दत वाले मेहर के दर्मियान फ़र्क़ नहीं किया गया है। उम्मीद है इस मसअले की वज़ाहत फ़रमायेंगे ?
    जवाब: मेहर में ख़ुम्स के वाजिब न होने की सूरत में फ़ौरन और मुद्दत वाले मेहर के दर्मियान कोई फ़र्क़ नहीं और नक़द रक़्म या समान में भी कोई फ़र्क़ नहीं है।
    सवाल 860: हुकूमत अपने मुलाजि़मों को ईद के दिनों में ईदी के नाम से कुछ चीज़े देती है जिसमें से कभी-कभी साल गुज़र जाने के बाद कुछ बच जाता है। इस बात को नज़र में रखते हुए कि मुलाज़ेमीन की ईदी पर ख़ुम्स नहीं है लेकिन चूँकि हम लोग इन चीज़ों के मुक़ाबले में कुछ रक़्म अदा करते हैं, इस लिये इसे पूरी तरह से हदिया (गिफ़्ट) नहीं कहा जा सकता बल्कि ये कम क़ीमत पर दिया जाता है तो क्या जिस माल के मुक़ाबले में रक़्म अदा की गई है उसका ख़ुम्स देना वजिब है या उस चीज़ की आम बाज़ार में जो क़ीमत है उसका ख़ुम्स देना वाजिब है या ये कि चूँकि वो ईदी है लिहाज़ा उसमें ख़ुम्स वाजिब है ही नहीं ?
    जवाब: चूँकि ज़िक्र किये गये सवाल में दर हक़ीक़त कुछ माल हुकूमत की तरफ़ से मुफ़्त दिया जाता है और कुछ के मुक़ाबले में रक़्म अदा की जाती है, लिहाज़ा बाकी़ बच जाने वाली चीज़ों में जिस मिक़दार के बदले में क़ीमत अदा की है उसकी निसबत ख़ुम्स वाजिब है। या ख़ुद उस चीज़ में से ख़ुम्स अदा करे या उसकी मौजूदा क़ीमत का ख़ुम्स अदा करे।
    सवाल 861: एक शख़्स मर गया उसने अपनी ज़िन्दगी में अपने ज़िम्मे ख़ुम्स को अपनी डॉयरी में लिख रखा था और उसके अदा करने का इरादा कर रखा था, मगर उसकी वफ़ात के बाद उसकी एक बेटी के सिवा तमाम वारिस ख़ुम्स की अदाएगी के लिये तैयार नहीं हैं और मय्यत के छोड़े हुऐ माल को अपने लिये, मय्यत के लिये और उसके अलावा दूसरे कामों में ख़र्च कर रहे हैं, लिहाज़ा नीचे दिये गये मसअलों में आप अपनी राय बयान फ़रमायें:
    1-मय्यत के नक़्ल किये गये या नक़्ल न किये गये माल में उसके दामाद या किसी दूसरे वारिस के लिये ख़र्च करने का क्या हुक़्म है?
    2-मरहूम के घर में उसके दामाद या किसी दूसरे वारिस के खाना खाने का क्या हुक्म है?
    3-ज़िक्र किये गये लोगों की तरफ़ से मय्यत के माल में किये गये पिछले ख़र्च और मरहूम के घर उनके खाना खाने का क्या हुक्म है?
    जवाब: अगर मरने वाले ने वसीयत की थी कि उसके बचे हुऐ माल से कुछ माल ख़ुम्स के तौर पर अदा किया जाये या ख़ुद वारिस को यक़ीन हो कि मरने वाला कुछ मिक़दार ख़ुम्स का क़र्ज़दार है तो उस वक़्त तक उनको बचे हुऐ माल में ख़र्च करने का हक़ नहीं है जब तक मय्यत की वसीयत के मुताबिक़ या जो मिक़दार उसके ज़िम्मे ख़ुम्स बनता है, उसको बचे हुऐ माल में से अदा न कर दें और वसीयत या क़र्ज़ की मिक़दार यहां उन (विरसा) के तमाम  वो ख़र्च जो उसकी वसीयत को पूरा करने या क़र्ज़ को अदा करने से पहले हुऐ ग़स्ब (हड़पने) (के हुक्म में हैं और वो (विरसा), अपने पिछले ख़र्च के सिलसिले में भी ज़ामिन होंगे।