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    हदीसें

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    दसवाँ भाग

    451. مَن خَلا بِالعِلمِ لَم تُوحِشهُ خَلوَةٌ;

    जो ज्ञान के साथ रहता है, उसे कोई तन्हाई नही डरा सकती।

    452. مَن تَسَلَّى بِالكُتُبِ لَم تَفُتهُ سَلَوةٌ;

    जिसे किताबों से आराम मिलता है, समझो उसने आराम का कोई साधन नही खोया है

    453. مَن أُعطِىَ الدُّعاءَ لَم يُحرَمِ الإجِابَةَ;

    जिसे दुआ की तौफ़ीक़ दी जाती है, उसे दुआ के क़बूल होने से महरूम (वंचित) नही रखा जाता।

    454. مَن جانَبَ الإخوانَ عَلى كُلِّ ذَنبِ قَلَّ أصدِقاؤُهُ;

    जो अपने दोस्तों से, उनकी ग़लतियों की वजह से अलग हो जाता है, उसके दोस्त कम हो जाते हैं।

    455. مَن أبانَ لَكَ عَيبَكَ فَهُوَ وَدُودُكَ;

    जो तुम्हें, तुम्हारी बुराइयों के बारे में बताये, वह तुम्हारा दोस्त है।

    456. مَن عَرَفَ النّاسَ لَم يَعتَمِد عَلَيهِم;

    जो लोगों को जान जाता है, उन पर भरोसा नहीं करता।

    457. مَن سَألَ فِي صِغَرِهِ أجابَ فِي كِبَرِهِ;

    जो बचपन में पूछता है, वह बड़े होकर जवाब देता है। अर्थात जो बचपन में ज्ञान प्राप्त करता है, वह बड़ा होने पर लोगों के प्रश्नों के उत्तर देता है।

    458. مَن قَرَعَ بابَ اللهِ فُتِحَ لَهُ;

    जो अल्लाह के दरवाज़े को खटखटाता है, उसके लिए दरवाज़ा खुल जाता है।

    459. مَن شَرُفَت هِمَّتُهُ عَظُمَت قِيمَتُهُ;

    जिसमें जितनी अधिक हिम्मत होती है, उसका उतना ही अधिक महत्व होता है।

    460. مَن أطاعَ هَواهُ باعَ آخِرَتَهُ بِدُنياهُ;

    जिसने अपनी हवस व इच्छाओं का अनुसरण किया, उसने अपनी आख़ेरत को दुनिया के बदले बेंच दिया।

    461. مَن حُسُنَت عِشرَتُهُ كَثُرَ إخوانُهُ;

    जिसका व्यवहार अच्छा होता है, उसके भाई (दोस्त) अधिक होते हैं।

    462. مَنِ اتَّجَرَ بِغَيرِ عِلم فَقَدِ ارتَطَمَ فِي الرِّبا;

    जो ज्ञान (फ़िक़्ह) को जाने बिना व्यापार करता है, वह सूद में डूब जाता है।

    463. مَن قالَ مالا يَنبَغي سَمِعَ مالا يَشتَهِي;

    जो अनुचित बात कहता है, वह बुरी भली सुनता है।

    464. مَن كَظَّتهُ البِطنَةُ حَجَبَتهُ عَنِ الفِطنَةِ;

    जो अधिक खाने के दुख में घिर जाता है, वह बुद्धिमत्ता से दूर रह जाता है।

    465. مَن دارَى النّاسَ أمِنَ مَكرَهُم;

    जो लोगों का मान सम्मान करता है, वह उनकी धोखे धड़ी से सुरक्षित रहता है।

    466. مَن أحَبَّنا فَليَعمَل بِعَمَلِنا وَليَتَجَلبَبِ الوَرَعَ;

    जो हम (अहलेबैत) से मोहब्बत करता है, उसे चाहिए कि वह हमारी तरह व्यवहार करे और मुत्तक़ी बन जाये।

    467. مَن طَلَبَ شَيئاً نالَهُ أو بَعضَهُ;

    जो किसी चीज़ को चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से या उसके कुछ हिस्से को प्राप्त कर लेता है।

    468. مَن يَطلُبِ الهِدايَةَ مِن غَيرِ أهلِها يَضِلُّ;

    जो किसी अयोग्य व्यक्ति से मार्गदर्शन चाहता है, वह भटक जाता है।

    469. مَن جالَسَ الجُهّالَ فَليَستَعِدَّ لِلقيلِ وَالقالِ;

    मूर्खों के साथ उठने बैठने लाले को, व्यर्थ की बातें सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।

    470. مَن رَقى دَرَجاتِ الهِمَمِ عَظَّمَتهُ الأُمَمُ;

    जो हिम्मत के द्वारा उन्नति करता है, लोग उसे बड़ा मानते हैं।

    471. مَن كَشَفَ ضُرَّهُ لِلنّاسِ عَذَّبَ نَفسَهُ;

    जिसने अपनी कठिनाई को लोगों पर प्रकट कर दिया, उसने स्वयं को अज़ाब में डाल लिया।

    472. مَن أظهَرَ فَقرَهُ أذَلَّ قَدرَهُ;

    जिसने अपनी निर्धनता को दूसरों के सामने प्रकट कर दिया, उसने अपना महत्व घटा लिया।

    473. مَن كَثُرَ فِكرُهُ فِي المَعاصِيَ دَعَتهُ إلَيها;

    जो गुनाहों के बारे में अधिक विचार करता है, उसे गुनाह अपनी तरफ़ खीँच लेते हैं।

    474. مَنِ استَنكَفَ مِن أبَوَيهِ فَقَد خالَفَ الرُّشدَ;

    जिसने घमंड के कारण अपने माँ बाप की अवज्ञा की, उसने अपने विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।

    475. مَن بَخِلَ عَلى نَفسِهِ كانَ عَلى غَيرِهِ أبخَلَ;

    जो स्वयं अपने बारे में कंजूसी करता है, वह दूसरों के बारे में अधिक कंजूसी करता है।

    476. مَن ظَلَمَ العِبادَ كانَ اللهُ خَصمَهُ;

    जो अल्लाह के बंदों पर अत्याचार करता है, अल्लाह उसका दुश्मन है।

    477. مَن أسرَعَ فِي الجَوابِ لَم يُدرِكِ الصَّوابَ;

    जो जवाब देने में जल्दी करता है, वह सही जवाब नही दे पाता।

    478. مَن عَمِلَ بِالحَقِّ مالَ إلَيهِ الخَلقُ;

    जो हक़ (सच्चाई) के साथ काम करता है, लोग उसकी तरफ़ झुकते हैं।

    479. مَن مَدَحَكَ بِما لَيسَ فيكَ فَهُوَ خَليقٌ أن يَذُمَّكَ بِما لَيسَ فِيكَ;

    जो तुम्हारी उस बारे में प्रशंसा करे जो बात तुम्हारे अन्दर नहीं पाई जाती है, उसे अधिकार है कि वह तुम्हारी उस बारे में बुराई भी करे जो तुम्हारे अन्दर नही पाई जाती है।

    480. مَن كافَأَ الإحسانَ بِالإساءَةِ فَقَد بَرِيءَ مِنَ المُرُوَّةِ;

    जो भलाई का बदला बुराई से देता है, उसमें मर्दानगी नही पाई जाती।

    481. مَن كَرُمَت عَلَيهِ نَفسُهُ لَم يُهِنها بِالمَعصِيَةِ;

    जो इज़्ज़तदार होता है, वह स्वयं को गुनाहों के द्वारा अपमानित नही करता।

    482. مَن ضَعُفَ عَن سِرِّهِ فَهُوَ عَن سِرِّ غَيرِهِ أضعَفُ;

    जो अपने राज़ छिपाने में कमज़ोर होता है, वह दूसरों के राज़ को छिपाने में अधिक कमज़ोर होता है।

    483. مَن أسهَرَ عَينَ فِكرَتِهِ بَلَغَ كُنهَ هِمَّتِهِ;

    जो अपने विचार की आँखों को खुला रखता है, वह अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लेता है।

    484. مَن تَطَلَّعَ عَلى أسرارِ جارِهِ انهَتَكَت أستارُهُ;

    जो अपने पड़ोसी के रहस्यों को जानने की कोशिश करता है, उसका पर्दा फट जाता है, अर्थात उसके स्वयं के राज़ खुल जाते हैं।

    485. مَن كَثُرَ في لَيلِهِ نَومُهُ فاتَهُ مِنَ العَمَلِ مالا يَستَدرِكُهُ في يَومِهِ;

    जो रात में अधिक सोता है, उसके कुछ ऐसे काम छुट जाते हैं, जिन्हें वह दिन में पूरा नही कर सकता।

    486. مَن كانَت هِمَّتُهُ ما يَدخُلُ بَطنَهُ كانَت قيمَتُهُ ما يَخرُجُ مِنهُ;

    जिस इंसान की पूरी ताक़त उस चीज़ में ख़र्च होती है, जो उसके पेट में जाती है, उसका महत्व उस चीज़ के बराबर है जो पेट से बाहर निकलती है।

    487. مَن أصلَحَ أمرَ آخِرَتِهِ أصلَحَ اللهُ لَهُ أمرَ دُنياهُ;

    जो अपने आख़ेरत के कामों को सुधारता है, अल्लाह उसके दुनिया के कामों को सुधार देता है।

    488. مَن يَكتَسِب مالاً مِن غَيرِ حِلِّهِ يَصرِفهُ في غَيرِ حَقَّهِ;

    जो हराम तरीक़े से माल कमाता है, वह उसे ग़लत कामों में ख़र्च करता है।

    489. مَنِ استَعانَ بِذَوِي الألبابِ سَلَكَ سَبيلَ الرَّشادِ;

    जो बुद्धिमान लोगों से सहायता माँगता है, वह उन्नती के मार्ग पर चलता है।

    490. مَن لَم يَتَعَلَّم فِي الصِّغَرِ لَم يَتَقَدَّم فِي الكِبَرِ;

    जो बचपन में नही पढ़ता, वह बड़ा होने पर आगे नही बढ़ता।

    491. مَن لَم تَسكُنِ الرَّحمَةُ قَلبَهُ قَلَّ لِقاؤُها لَهُ عِندَ حاجَتِهِ;

    जिसके दिल में मुहब्बत नही होती, उसके पास ज़रूरत के वक़्त कम लोग आते हैं।

    492. مَن طَلَبَ رِضَى اللهِ بِسَخَطِ النّاسِ رَدَّ اللهُ ذامَّهُ مِنَ النّاسِ حامِداً;

    जो लोगों की नाराज़गी के साथ भी अल्लाह की खुशी चाहता है, अल्लाह बुराई करने वाले लोगों को भी उसका प्रशंसक बना देता है।

    493. مَنِ اقتَصَدَ فِي الغِنى وَالفَقرِ فَقَدِ استَعَدَّ لِنَوائِبِ الدَّهرِ;

    जो मालदारी व ग़रीबी दोनों में मध्य मार्ग को अपनाता है, वह सांसारिक कठिनाईयों का सामना करने के लिए तैयार रहता है।

    494. مَنِ افتَخَرَ بِالتَّبذيرِ احتُقِرَ بِالإفلاسِ;

    जो व्यर्थ ख़र्च पर गर्व करता है, वह निर्धनता के हाथों अपमानित होता है।

    495. مَن دَنَت هِمَّتُهُ فَلا تَصحَبهُ;

    कम हिम्मत लोगों के साथी न बनों।

    496. مَن هانَت عَلَيهِ نَفسُهُ فَلا تَرجُ خَيرَهُ;

    जो स्वयं को ज़लील समझता हो, उससे किसी भलाई की उम्मीद न रखो।

    497. مَن نَقَلَ إلَيكَ نَقَلَ عَنكَ;

    जो दूसरों की बातें तुम्हें बताता है, वह तुम्हारी बातें दूसरों को बताता है।

    498. مَن بَرَّ والِدَيهِ بَرَّهُ وَلَدُهُ;

    जो अपने माँ बाप के साथ भलाई करता है, उसकी संतान उसके साथ भलाई करती है।

    499. مَن لَم يَتَغافَل وَلا يَغُضَّ عَن كَثير مِنَ الأُمُورِ تَنَغَّصَت عِيشَتُهُ;

    जो बहुत से कार्यों से अचेत न बने और बहुत से कार्यों को अनदेखा न करे उसकी ज़िन्दगी अंधेरी हो जाती है।

    500. مَن شَبَّ نارَ الفِتنَةِ كانَ وَقُوداً لَها;

    जो उपद्रव की आग भड़काता है, वह स्वयं उसका ईंधन बनता है।