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    हदीसें

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    गयारवाँ भाग

    501. مَنِ ادَّعى مِنَ العِلمِ غايَتَهُ فَقَد أظهَرَ مِن جَهلِهِ نِهايَتَهُ;

    जिसने यह दावा किया कि मैं ज्ञान की अंतिम सीमा तक पहुंच गया हूँ, उसने अपनी मूर्खता की अंतिम सीमा को प्रकट कर दिया।

    502. مِن شَرائِطِ الإيمانِ حُسنُ مُصاحَبَةِ الإخوانِ;

    ईमान की शर्तों में से एक शर्त भईयों के साथ सद्व्यवहार भी है।

    503. مِن أحسَنِ الفَضلِ قَبُولُ عُذرِ الجانِي; उच्च श्रेष्ठताओं में से एक श्रेष्ठता ग़लती करने वाले की मजबूरी को स्वीकार करना भी है।

    504. مِن أشرَفِ أفعالِ الكَريمِ تَغافُلُهُ عَمّا يَعلَمُ;

    करीम इंसान के श्रेष्ठ कार्यों में से एक काम किसी बात को जानते हुए उसे अनदेखा करना है।

    505. مِن أماراتِ الخَيرِ الكَفُّ عَنِ الأذى;

    (लोगों को) पीड़ा पहुँचाने से दूर रहना, नेकी व भलाई की एक निशानी है।

    506. مِن أماراتِ الدَّولَةِ اليَقَظَةُ لِحِراسَةِ الأُمُورِ;

    हुकूमत की (मज़बूती) की एक निशानी, कामों की देख रेख के लिए जागना है।

    507. مِن كَمالِ السَّعادَةِ السَّعِيُ في إصلاحِ الجُمهُورِ;

    साधारण जनता के सुधार की कोशिश करना सबसे बड़ी भाग्यशालिता है।

    508. مِن أعظَمِ الشَّقاوَةِ القَساوَةُ;

    हृदय की कठोरता सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

    509. مِنَ الاِقتِصادِ سَخاءٌ بَغَيرِ سَرَفِ، وَمُرُوَّةٌ مِن غَيرِ تَلَف;

    व्यर्थ खर्च किये बिना दान देना और तोड़ फोड़ के बिना मर्दानगी दिखाना, मध्यक्रम की निशानी है।

    510. مِن كَمالِ الإنسان وَوُفُورِ فَضلِهِ استِشعارُهُ بِنَفسِهِ النُقصانَ;

    अपने नफ़्स के नुक़्सान के बारे में जानकारी लेना, इंसान के कमाल व अत्याधिक श्रेष्ठ होने की निशानी है।

    511. ما عَزَّ مَن ذَلَّ جيرانَهُ;

    अपने पड़ोसी को ज़लील करने वाला, इज़्ज़त नही पा सकता।

    512. ما تَزَيَّنَ مُتَزَيِّنٌ بِمِثلِ طاعَةِ اللهِ;

    कोई भी श्रृंगार करने वाला, अल्लाह की आज्ञा का पालन करने वाले के समान सुशौभित नही है।

    513. ما أكثَرَ العِبَرَ وَأقَلَّ الاِعتِبارَ;

    नसीहतें कितनी अधिक हैं और नसीहत लेना कितना कम !।

    514. مَا اتَّقى أحَدٌ إلاّ سَهَّلَ اللهُ مَخرَجَهُ;

    कोई मुत्तक़ी ऐसा नही है, जिसके कठिनाईयों से बाहर निकलने के रास्ते को अल्लाह ने आसान न बनाया हो।

    515. ما حُفِظَتِ الأُخُوَّةُ بِمِثلِ المُواساةِ;

    जिस प्रकार जान व माल के द्वारा सहायता, दोस्ती व भाईचारे को रक्षा करती है, उस तरह कोई भी चीज़ दोस्ती को बाक़ी नही रखती।

    516. مَا اختَلَفَت دَعوَتانِ إلاّ كانَت إحداهُما ضَلالَةً;

    दो निमन्त्रण परसपर विरोधी नही हो सकते, जब तक उनमें से एक भ्रमित करने वाला न हो।

    517. لا يَنبَغي أن تَفعَلَهُ فِي الجَهرِ فَلا تَفعَلهُ فِي السِّرِّ;

    जिस काम को तुम खुले आम नही कर सकते हो, उसे छुपकर करना भी उचित नही है।

    518. ما أكثَرَ الإخوانَ عِندَ الجِفانِ، وَأقَلَّهُم عِندَ حادِثاتِ الزَّمانِ; जब इंसान के पास प्याला (भरा) होता है अर्थात उसके पास दुनिया का माल होता है तो उसके दोस्त अत्याधिक होते हैं और जब वह कठिनाईयों में घिरता हैं तो दोस्त बहुत कम दिखाई देते हैं !!

    519. ما تَزَيَّنَ الإنسانُ بِزينَةِ أجمَلَ مِنَ الفُتُوَّةِ;

    इंसान बहादुरी से ज़्यादा किसी भी आभूषण से सुसज्जित नही हुआ है।

    520. ما لُمتُ أحَداً عَلى إذاعَةِ سِرِّي اِذ كُنتُ بِهِ أضيَقَ مِنهُ;

    जिसने मेरा राज़ खोला, मैंने उसे बुरा भला नही कहा, क्योंकि उसे छिपा कर रखने में मैं उससे भी अधिक तंग था।

    521. مِلاكُ الأُمُورِ حُسنُ الخَواتِمِ;

    कार्यों की अच्छाई का आधार, उनके अच्छे समापन पर है।

    522. مُذيعُ الفاحِشَةِ كَفاعِلِها;

    बुरी बातों को फैलाने वाला, बुरे काम करने वाले के समान है।

    523. مَرارَةُ اليَأسِ خَيرٌ مِنَ التَّضَرُّعِ إلَى النّاسِ;

    नाउम्मीदी की कड़वाहट को (बर्दाश्त करना) लोगों के सामने रोने से अच्छा है।

    524. مَجالِسُ اللَّهوِ تُفسِدُ الإيمانَ; व्यर्थ सभायें ईमान को ख़राब करती हैं।

    525. مَثَلُ الدُّنيا كَظِلِّكَ إن وَقَفتَ وَقَفَ وَإن طَلَبتَهُ بَعُدَ;

    दुनिया की मिसाल तुम्हारी स्वयं की परछाई जैसी है, जब तुम खड़े होते हो तो वह रुक जाती है और जब तुम उसके पीछे चलते हो तो वह तुम से दूर हो जाती है।

    526. نِعمَ زادُ المَعادِ الإحسانُ إلَى العِبادِ;

    लोगों के साथ भलाई करना, क़ियामत के लिए कितना अच्छा तौशा है।( इंसान किसी यात्रा पर जाते समय जो आवश्यक चीज़े अपने साथ ले जाता है उन्हें तौशा कहते हैं।)

    527. نِعمَ عَونُ الدُّعاءِ الخُشُوعُ;

    ख़ुशू-उ, (स्वयं को बहुत छोटा समझना व रोना) दुआ के लिए कितना अच्छा मददगार है। !

    528. نَفَسُ المَرءِ خُطاهُ إلى أجَلِهِ;

    इंसान की साँस, उसके मौत की तरफ़ बढ़ते हुए क़दम हैं।

    529. نِعمَةٌ لا تُشكَرُ كَسَيِّئَةِ لا تُغفَرُ;

    नेमत पर शुक्र न करना, माफ़ न होने वाले गुनाह जैसा है।

    530. نُصحُكَ بَينَ المَلاَِ تَقريعٌ;

    लोगों के बीच (किसी को) नसीहत करना, उसकी निंदा है।

    531. نِظامُ الدِّينِ خَصلَتانِ: إنصافُكَ مِن نَفسِكَ، وَمُواساةُ إخوانِكَ;

    धार्मिक व्यवस्था की दो विशेषताएं हैं, स्वयं अपने साथ इंसाफ़ करना और अपने भाईयों की जान व माल से सहायता करना।

    532. نَزِّل نَفسَكَ دُونَ مَنزِلَتِها تُنَزِّلكَ النّاسُ فَوقَ مَنزِلَتِكَ;

    अपने मान सम्मान से नीची जगह पर बैठो ताकि लोग तुम्हें तुम्हारे मान सम्मान से भी ऊँची जगह पर बैठायें।

    533. نِفاقُ المَرءِ مِن ذُلٍّ يَجِدُهُ في نَفسِهِ;

    इंसान का निफ़ाक़ (द्विवादिता) एक ऐसी नीचता है, जिसे वह अपने अन्दर पाता है।

    534. هُدِيَى مَن تَجَلبَبَ جِلبابَ الدّينِ;

    जिसने दीन की पोशाक पहन ली, वह हिदायत पा गया। अर्थात जिसने दीन को अपना लिया वह सफल हो गया।

    535. هَلَكَ مَن لَم يَعرِف قَدرَهُ; जिसने अपने महत्व को न समझा, वह बर्बाद हो गया।

    536. وَلَدُ السُّوءِ يَهدِمُ الشَّرَفَ، وَيَشينُ السَّلَفَ;

    बुरी संतान, प्रतिष्ठा को मिटा देती है और बुज़ुर्गों के अपमान का कारण बनती है।

    537. وَقِّروا كِبارَكُم يُوَقِّركُم صِغارُكُم;

    तुम अपने से बड़ों का आदर करो ताकि तुम से छोटे तुम्हारा आदर करें।

    538. وَيلٌ لِمَن غَلَبَت عَلَيهِ الغَفلَةُ فَنَسِيَ الرِّحلَةَ وَلَم يَستَعِدَّ;

    धिक्कार है उस पर जो इतना लापरवाह हो जाये कि अपने कूच (प्रस्थान) को भूल जाये और तैयार न हो।

    539. وَحدَةُ المَرءِ خَيرٌ لَهُ مِن قَرينِ السُّوءِ;

    बुरे इंसान के पास बैठने से, आदमी का तन्हा रहना अच्छा है।

    540. لا تَأسَ عَلى ما فاتَ;

    जो खो दिया, उस पर अफ़सोस न करो।

    541. لا تَطمَع فِيما لا تَستَحِقُّ;

    जिसके तुम हक़दार नही हो, उसका लालच न करो।

    542. لا تَثِقَنَّ بِعَهدِ مَن لا دينَ لَهُ;

    किसी बेदीन के साथ किये हुए समझौते पर भरोसा न करो।

    543. لا تُحَدِّث بِما تَخافُ تَكذيبَهُ;

    जिस बात के झुठलाये जाने का डर हो, उसे न कहो।

    544. لا تَعِد بِما تَعجِزُ عَنِ الوَفاءِ بِهِ;

    तुम में जिस बात को पूरा करने की ताक़त न हो, उसके बारे में वादा न करो।

    545. لا تَعزِم عَلى ما لَم تَستبِنِ الرَّشدَ فيهِ;

    उस काम को करने का संकल्प न करो, जिसकी उन्नति व विकास के बारे में तुम्हें जानकारी न हो।

    546. لا تُمسِك عَن إظهارِ الحَقِّ اِذا وَجَدتَ لَهُ أهلاً;

    हक़ बात कहने से न रुको, जब तुम्हें कोई हक़ बात सुनने योग्य मिल जाये।

    547. لا تُمارِيَنَّ اللَّجُوجَ في مَحفِل;

    झगड़ालु स्वभव वाले आदमी से भरी सभा में न उलझो।

    548. لا تُعاتِبِ الجاهِلَ فَيَمقُتَكَ، وَعاتِبِ العاقِلَ يُحبِبِكَ;

    मूर्ख की निंदा न करो क्योंकि वह तुम्हारा दुश्मन बन जायेगा और बुद्धिमान की निंदा करो वह तुम से मोहब्बत करेगा।

    549. لا تَستَصغِرَنَّ عَدُوّاً وَاِن ضَعُفَ;

    किसी भी दुश्मन को छोटा न समझो चाहे वह कमज़ोर ही क्यों न हो।

    550. لا تُلاحِ الدَّنِيَّ فَيَجتَرِىءَ عَلَيكَ;

    नीच इंसान से मत झगड़ो, वह तुम्हारे साथ दुष्टता करेगा।