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    हदीसें

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    बारवाँ भाग

    551. لا تُؤيِسِ الضُّعَفاءَ مِن عَدلِكَ;

    कमज़ोर लोगों को अपने न्याय से नाउम्मीद न करो।

    552. لا تَعمَل شَيئاً مِنَ الخَيرِ رِياءُ وَلا تَترُكهُ حَياءً;

    किसी भी नेक काम को दिखावे के लिए न करो और न शर्म की वजह से उसे छोड़ो।

    553. لا تَثِقِ بِالصَّديقِ قَبلَ الخُبرَةِ;

    परखे बिना दोस्त पर भरोसा न करो।

    554. لا تَستَحيِ مِن إعطاءِ القَليلِ; فَإنَّ الحِرمانَ أقَلُّ مِنهُ;

    कम (दान) देने में शर्म न करो, क्योंकि उससे वंचित रखना तो उससे भी कम है।

    555. لا تَظلِمَنَّ مَن لا يَجِدُ ناصِراً إلاَّ اللهَ;

    जिसका अल्लाह के अलावा कोई सहायक न हो उस पर अत्याचार न करो।

    556. لا يَشغَلَنَّكَ عَنِ العَمَلِ لِلآخِرَةِ شُغلٌ; فَإنَّ المُدَّةَ قَصيرَةٌ;

    (याद रखो) आख़ेरत के कामों से (रोकने के लिए) कोई काम तुम्हें स्वयं में व्यस्त न कर ले, क्योंकि समय बहुत कम है।

    557. لا تَفرِحَنَّ بِسَقطَةِ غَيرِكَ لا تَدري ما يُحدِثُ بِكَ الزَّمانُ;

    किसी के हारने या गिरने से खुश न हो, क्योंकि तुम्हें नही पता कि आने वाले समय में तुम्हारे साथ क्या घटित होने वाला है।

    558. لا تَجعَل عِرضَكَ غَرَضاً لِقَولِ كُلِّ قائِلِ;

    अपनी इज़्ज़त को हर बोलने वाले के तीर का निशाना न बनने दो।

    559. لا تَستَبِدَّ بِرَأيِكَ، فَمَنِ استَبَدَّ بِرَأيِهِ هَلَكَ;

    स्वेच्छाचारी न बनों, क्योंकि स्वेच्छाचारी मौत के घाट उतर जाता है।

    560. لا تُسِيءِ الخِطابَ فَيَسُوءَكَ نَكيرُ الجَوابِ;

    किसी को बुरी बात न कहो कि बुरा जवाब सुनने को मिले।

    561. لا تَستَبطِيء اِجابَةَ دُعائِكَ وَقد سَدَدتَ طَريقَهُ بِالذُّنُوبِ;

    अपनी दुआ के देर से क़बूल होने की (उम्मीद में न रहो) जब गुनाहों के द्वारा उसके क़बूल होने के रास्ते को बंद कर दिया हो।

    562. لا تُدخِلَنَّ في مَشوَرَتِكَ بِخيلاً فَيَعدِلَ بِكَ عَنِ القصدِ، وَيَعِدَكَ الفَقرَ;

    कभी भी कंजूस से मशवरा न करो, क्योंकि वह तुम्हें मध्य मार्ग से दूर कर देगा और निर्धनता से डरायेगा।

    563. لا تُشرِكَنَّ في رَأيِكَ جَباناً يُضَعِّفُكَ عَنِ الأمرِ وَيُعَظِّمُ عَلَيكَ ما لَيسَ بِعَظيمِ;

    किसी भी डरपोक से मशवरा न करना, क्योंकि वह तुम्हारी काम करने की शक्ति को कमज़ोर बना देगा और जो काम बड़ा नही है उसे तुम्हारे सामने बड़ा बनाकर पेश करेगा।

    564. لا تَستَشِرِ الكَذّابَ; فَإنَّهُ كَالسَّرابِ يُقَرِّبُ عَلَيكَ البَعيدَ; وَيُبَعِّدُ عَلَيكَ القَريبَ;

    झूठे से मशवरा न करना, वह सराब (मरीचिका) के समान होता है, वह दूर को तुम्हारे लिए समीप व समीप को दूर कर देगा।

    565. لا تُشرِكَنَّ في مَشوَرَتِكَ حَريصاً يُهَوِّنُ عَلَيكَ الشَّرَّ وَيُزَيِّنُ لَكَ الشَّرَهَ;

    किसी भी लालची से मशवरा न करना, वह तुम्हारे सामने बुराई को आसान और लालच को सुसज्जित कर के पेश करेगा।

    566. لا تُؤَخِّر إنالَةَ المُحتاجِ إلى غَد; فَإنَّكَ لا تَدري ما يَعرِضُ لَكَ وَلَهُ في غَد;

    निर्धन की आवश्क्ताओं की पूर्ति को कल पर मत टालो, क्योंकि तुम्हें नही पता कि आने वाले कल में तुम्हारे या उसके साथ क्या होने वाला है।

    567. لا تَنقُضَنَّ سُنَّةً صالِحَةٌ عُمِلَ بِها وَاجتَمَعَتِ الأُلفَةُ لَها وَصَلَحَتِ الرَّعِيَّةُ عَلَيها;

    उस अच्छी सुन्नत को न मिटाओ जिसे लोग अपनाये हुए हों और जिसके द्वारा आपस में एक दूसरे से मिलते हों और जिसमें उनके लिए भलाई हो।

    568. لا تَصحَب مَن يَحفَظُ مَساوِيَكَ، وَيَنسى فَضائِلَكَ وَمَعالِيَكَ;

    जो तुम्हारी बुराईयों को याद रखे और तुम्हारी विशेषताओं व उच्चताओं को भुला दे, उसे दोस्त न बनाओ।

    569. لا تَقُل مالا تَعلَمُ فَتُتَّهَمَ بِإِخبِارِكَ بِما تَعلَمُ;

    तुम जिस चीज़ के बारे में नही जानते हो, उसके बारे में कुछ न कहो, ताकि तुम्हारी उन बातों के बारे में शक न हो जिनके बारे में तुम अच्छी तरह जानते हो।

    570. لا فِطنَةَ مَعَ بِطنَةِ;

    भरा हुआ पेट व बुद्धिमत्ता एक साथ इकठ्ठा नही होते है।

    571. لا جِهادَ كَجِهادِ النَّفسِ;

    कोई जिहाद, नफ़्स से जिहाद करने के समान नही है, अर्थात अपनी इच्छाओं से लड़ी जाने वाली जंग जैसी कोई जंग नही है।

    572. لا يَجِتَمِعُ الباطِلُ وَالحَقُّ;

    हक़ व बातिल, झूठ व सच एक साथ इकठ्ठा नही होते है।

    573. لا لِباسَ أجمَلُ مِنَ السَّلامَةِ;

    स्वास्थ से सुन्दर कोई वेश नही है।

    574. لا دِينَ لِمُسَوِّف بِتَوبَتِهِ;

    जो तौबा करने में आज कल करता है, वह दीनदार नही है।

    575. لا عَيشَ لِمَن فارَقَ أحِبَّتَهُ;

    जो अपने दोस्तों से अलग हो जाये उसके लिए आराम नही है।

    576. لا يُدرَكُ العِلمُ بِراحَةِ الجِسمِ;

    शारीरिक आराम के साथ ज्ञान प्राप्त नही होता।

    577. لا يَشبَعُ المُؤمِنُ وَأخُوهُ جائِعٌ;

    मोमिन खाना नही खाता, (अगर) उसका भाई भूखा हो।

    578. لا يَستَغنِي العاقِلُ عَنِ المُشاوَرَةِ;

    बुद्धिमान यह नही सोचता कि उसे परामर्श व मशवरे की ज़रूरत नही है।

    579. لا خَيرَ في لَذَّة لا تَبقى;

    जो मज़ा बाक़ी रहने वाला न हो, उसमें भलाई नही है।

    580. لا عَيشَ أهنَأُ مِنَ العافِيَةِ;

    सेहत व स्वस्थता से अच्छा कोई आनंद नही है।

    581. لا خَيرَ فيمَن يَهجُرُ أخاهُ مِن غَيرِ جُرمِ;

    उसके लिए भलाई नही है जो अपने दोस्तों से उनकी किसी ग़लती के बिना ही अलग हो जाये।

    582. لا تَكمُلُ المَكارِمُ إلاّ بِالعَفافِ وَالإيثارِ;

    पारसाई व त्याग के बिना अख़लाक़ पूरा नही होता

    583. لا عَدُوَّ أعدى عَلَى المَرءِ مِن نَفسِهِ;

    आदमी का उसके नफ़्स से बड़ा कोई दुश्मन नही है।

    584. لا يُغتَبَطُ بِمَوَدَّةِ مَن لا دينَ لَهُ;

    बेदीन से दोस्ती पर ख़ुश नही होते।

    585. لا يَرضَى الحَسُودُ عَمَّن يَحسُدُهُ إلاّ بِالمَوتِ أو بِزَوالِ النِّعمَةِ;

    ईर्ष्यालु उस समय तक खुश नही होता जब तक जिससे वह ईर्ष्या करता है वह मर न जाये या उसका धन दौलत न छिन जाये।

    586. لا يَكُونُ الصَّديقُ صَديقاً حَتَّى يَحفَظَ أخاهُ في غَيبَتِهِ وَنَكبَتِهِ وَوَفاتِهِ;

    दोस्त उस समय तक दोस्त (कहलाने के योग्य) नही है, जब तक अपने दोस्त की उनुपस्थिति में, उसकी परेशानी में और उसकी मौत पर दोस्ती का हक़ अदा न करे।

    587. لا طاعَةَ لِمَخلوق في مَعصِيَةِ الخالِقِ;

    पैदा करने वाले की अवज्ञा करने के लिए किसी की भी आज्ञा का पालन आवश्यक नही है।

    588. لا يَفوزُ بِالجَنَّةِ اِلاّ مَن حَسُنَت سَريرَتُهُ وَخَلُصَت نِيَّتُهُ;

    जिनकी आत्मा अन्दर से पाक व नीयत साफ़ है उनके अतिरिक्त कोई जन्नत में नही जा सकता।

    589. لا خَيرَ في قَوم لَيسُوا بِناصِحينَ وَلا يُحِبُّونَ النّاصِحينَ;

    जो क़ौम नसीहत करने वाली न हो और जो नसीहत करने वालों से मोहब्बत न करती हो, उसके लिए भलाई नही है।

    590. لا خَيرَ في أخ لا يُوجِبُ لَكَ مِثلَ الَّذي يُوجِبُ لِنَفسِهِ;

    उस भाई व दोस्त से कोई फ़ायदा नही है, जो जिस चीज़ को अपने लिए ज़रूरी समझता है, उसे तुम्हारे लिए ज़रूरी न समझे।

    591. لا نِعمَةَ أهنَأُ مِنَ الأمنِ;

    शांति से बढ़कर कोई भी नेमत सुख देने वाली नही है।

    592. لا خَيرَ في قَلب لا يَخشَعُ، وَعَين لا تَدمَعُ، وَعِلم لا يَنفَعُ;

    जो दिल अल्लाह से न डरता हो, जो आँख न रोती हो और जो ज्ञान फ़ायदा न पहुँचाता हो, उसमें कोई भलाई नही है।

    593. يُستَدَلُّ عَلى عَقلِ كُلِّ امرِء بِما يَجرِي عَلى لِسانِهِ;

    164. जो बात इंसान की ज़बान पर आती है, वह उसकी बुद्धी पर तर्क बनती है।

    594. يُستَدَلُّ عَلى كَرَمِ الرَّجُلِ بِحُسنِ بِشرِهِ، وَبَذلِ بِرِّهِ;

    मर्द का सदव्यवहार और उसकी भलाई व नेकी, उसकी श्रेष्ठता का तर्क है।

    595. يَسيرُ الرِّياءُ شِركٌ;

    लोगों को दिखाने के लिए किया जाने वाला थोड़ा काम भी शिर्क है।

    596. يَسيرُ العَطاءِ خَيرٌ مِنَ التَّعَلُّلِ بِالاِعتِذارِ;

    थोड़ा दान दे देना, बहाना बनाने व माफ़ी माँगने से अच्छा है।

    597. يَبلُغُ الصّادِقُ بِصِدقِهِ مالا يَبلُغُهُ الكاذِبُ بِاحتِيالِهِ;

    सच बोलने वाला, अपनी सच्चाई से उस चीज़ तक पहुँच जाता है, जिस तक झूठ बोलने वाला धोखे बाज़ी के द्वारा नही पहुँच पाता।

    598. يُمتَحَنُ الرَّجُلُ بِفِعلِهِ لا بِقَولِهِ;

    मर्दों को उनके कामों से परखो, उनकी बातों से नही।

    599. يَومُ المَظلومِ عَلَى الظّالِمِ أشَدُّ مِن يَومِ الظّالِمِ عَلَى المَظلومِ;

    ज़ालिम पर मज़लूम का दिन, मज़लूम पर ज़ालिम के दिन से कठिन है। अर्थात अत्याचारी के लिए अत्याचार की सज़ा पाने का दिन, अत्याचार करने के दिन से कठिन है।

    600. يَكتَسِبُ الصّادِقُ بِصِدقِهِ ثَلاثاً: حُسنَ الثِّقَةِ بِهِ، وَالمَحَبَّةَ لَهُ، وَالمَهابَةَ عَنهُ;

    सच बोलने वाले को अपने सच से तीन फ़ायदे होते हैं : (लोग) उस पर भरोसा करते हैं, उसके लिए दिलों में मोहब्बत पैदा होती है और उसको बड़ा मानते हुए उससे डरते हैं।