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    हदीसें

    हदीसें
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    छटवाँ भाग

    251. خُذِ القَصدَ فِي الاُمُورِ، فَمَن اَخَذَ القَصدَ خَفَّت عَلَيهِ المُؤَنَ;

    कामों में बीच का रास्ता अपनाओ, जो बीच का रास्ता अपनाता है, उसका खर्च कम हो जाता है।

    252. خُذِ الحِكمَةَ مِمَّن أتاكَ بِهِا، وَانظُر إلى ما قالَ وَلا تَنظُر إلى مَن قالَ;

    तुम्हें जो कोई भी बुद्घिमत्ता दे, ले लो, यह देखो कि क्या कह रहा है यह न देखो कि कौन कह रहा है।

    253. خَيرُ الاَعمالِ إعتِدالُ الرَّجاءِ وَالخَوفِ;

    सब से अच्छे काम, उम्मीद और डर का बराबर (एहसास) है।

    254. خالِف مَن خالَفَ الحَقَّ اِلى غَيرِهِ، وَدَعهُ وَما رَضِىَ لِنَفسِهِ;

    जो हक़ का विरोध करे उसका विरोध करो और वह जिस पर राज़ी हो, उसे उसी पर छोड़ दो।

    255. خالِطُوا النّاسَ مُخالَطَةُ إن مِتُّم بَكَوا عَلَيكُم وَإن غِبتُم حَنُّوا إلَيكُم;

    लोगों से इस प्रकार व्यवहार करो कि अगर तुम मर जाओ तो वह तुम पर रोयें और अगर तुम ग़ायब हो जाओ तो वह तुम से मिलने की इच्छा करें।

    256. خُلُوُّ الصَّدرِ مِنَ الغِلِّ وَالحَسَدِ مِن سَعادَةِ العَبدِ;

    सीने का ईर्ष्या व कीनेः से खाली होना, बन्दे की भाग्यशालिता है।

    257. خَوافِي الأخلاقِ تَكشِفُهَا المُعاشَرَةُ;

    एक साथ रहने से छुपी हुई आदतें सामने आ जाती है।

    258. دارِ النّاسَ تَأمَن غَوائِلُهُم، وَتَسلَم مِن مَكائِدِهِم;

    लोगों से मोहब्बत करो ताकि उनके उपद्रव से सुरक्षित और उनकी बुराइयों से बचे रहो।

    259. دَع ما لايَعنِيكَ، وَاشتَغِل بِمُهِمِّكَ الَّذي يُنجِيَكَ;

    जो चीज़ तुम्हारे काम न आये, उसे छोड़ दो और जो चीज़ तुम्हें मुक्ति दे उस में व्यस्त हो जाओ।

    260. ذِكرُ اللهِ مَطرَدَةُ الشَّيطانِ;

    अल्लाह की याद, शैतान को दूर करती है।

    261. ذُروَةُ الغاياتِ لا يَنالُها إلاّ ذَوُوا التَّهذيبِ وَالمُجاهَداتِ;

    सदाचारी और कोशिश करने वाले के अतिरिक्त कोई भी अपने उद्देश्य की चोटी को नहीं छू पाता।

    262. ذُو الكَرَمِ جَميلُ الشِّيَمِ مُسد لِلنِّعَمِ وَصُولٌ لِلرَّحِمِ;

    करीम, वह है जिस का अखलाक अच्छा हो, हर नेमत के लिये उचित हो और सिल ए रहम करता हो।

    263.

    ذَوُوا العُيُوبِ يُحِبُّونَ إشاعَةَ مَعايِبِ النّاسِ لِيَتّسِعَ لَهُمُ العُذرُ فِي مَعايِبِهِم;

    बुरे लोग यह चाहते हैं कि लोगों की बुराइयां आम हो जायें ताकि उन्हें अपनी बुराइयों के बारे में और अधिक बहाना मिले।

    264.

    رَحِمَ اللهُ امرَءٌ عَرَفَ قَدرَهُ وَلَم يَتَعَدَّ طَورَهُ;

    अल्लाह रहमत करे उस मर्द पर जो अपने महत्व को पहचाने और अपनी हद से आगे न बढ़े।

    265.

    رَحِمَ اللهُ امرءً أحيا حَقَّاً وَأماتَ باطِلاً وَأدحَضَ الجَورَ وَأقامَ العَدلَ;

    अल्लाह रहमत करे उस इंसान पर जो हक़ (सत्यता) को ज़िन्दा करे और बातिल (असत्य) को मौत के घाट उतार दे, अत्यचार को मिटाये और न्याय को फैलाये।

    266.

    رَأسُ الفَضائِلِ مِلكُ الغَضَبِ وَاِماتَةُ الشَّهوَةِ;

    श्रेष्ठता की जड़ गुस्से पर कंट्रोल करना और हवस को मारना है।

    267. رَأسُ الجَهلِ مُعاداةُ النّاسِ;

    लोगों से दुश्मनी करना, मूर्खता की जड़ है।

    268. رَأسُ السِّياسَةِ استِعمالُ الرِّفقِ;

    मोहब्बत से काम लेना, सियासत की जड़ है।

    269. رُبَّ مُتَوَدِّد مُتَصَنِّع;

    बहुत सी दोस्तियाँ दिखावटी होती है।

    270. رُبَّ كَلِمَة سزلَبَت نِعمَةً;

    बहुत सी बातें, नेमत को रोक देती हैं।

    271. رُبَّ كَلام جَوابُهُ السُّكُوتُ;

    बहुत सी बातों का जवाब, चुप रहना है।

    272. رُبَّ واعِظِ غَيرُ مُرتَدِع;

    बहुत से नसीहत करने वाले ऐसे हैं जो खुद को गुनाहों से नहीं रोकते।

    273. رَغبَتُكَ فِي زاهِد فيِكَ ذُلٌّ;

    जो तुम से दूर रहना चाहता है, उस से मिलना अपमान है।

    274.

    رَدعُ النَّفسِ عَن زَخارِفِ الدُّنيا ثَمَرَةُ العَقلِ;

    अपनी आत्मा को इस दुनिया की शोभाओं से दूर रखना, बुद्धी का परिणाम है।

    275. رَوِّ قَبلَ العَمَلِ تَنجُ مِنَ الزَّلَلِ;

    काम करने से पहले सोचो, ताकि गलतियों से बच सको।

    276. رَضِيَ بِالذُّلِ مَن كَشَفَ ضُرَّهُ لِغَيرِهِ;

    वह इंसान अपमानित होने पर राज़ी हो गया, जिसने अपनी परेशानियों को दूसरों पर प्रकट कर दिया।

    277.

    رَأيُ الرَّجُلِ عَلى قَدرِ تَجرِبَتِهِ;

    हर इंसान की राय उसके अनुभव के अनुसार होती है।

    278. رِضَا المَرءِ عَن نَفسِهِ بُرهانُ سَخافَةِ عَقلِهِ;

    आदमी का स्वयं से राज़ी होना, कम बुद्धी की दलील है।

    279. زَكاةُ الجَمالِ العَفافُ;

    खूब सूरती की ज़कात, पाक दामन रहना है।

    280.

    زِلَّةُ العالِمِ كَانكِسارِ السَّفينَةِ، تَغرَقُ وَتُغَرَّقُ مَعَها غَيرَها;

    ज्ञानी की ग़लती, किश्ती के टूटने के समान है, वह स्वयं भी डूबती है और दूसरों को भी डुबाती है।

    281. زِيادَةُ الشُّحِّ تَشينُ الفُتُوَّةَ وَتُفسِدُ الأُخُوَّةَ;

    अधिक कंजूसी, बहादुरी को ख़त्म और भाई चारे को ख़राब कर देती है।

    282. سَبَبُ الاِئتِلافِ الوَفاءُ;

    वफा, मोहब्बत का कारण बनती है।

    283. سَبَبُ المَحَبَّةِ البِشرُ;

    प्रफुल्लता, मोहब्बत का कारण बनती है।

    284. سِلاحُ المُؤمِنِ الدُّعاءُ;

    दुआ, मोमिन का हथियार है।

    285.

    سُوسُوا أنفُسَكُمِ بِالوَرَعِ وَداوُوا مَرضاكُمِ بِالصَّدَقَةِ;

    पाक दामनी के द्वारा अपनी जान की रक्षा करो और अपने बीमारों का सदक़े से इलाज करो।

    286. سِياسَةُ العَدلِ ثَلاثٌ: لِينٌ في حَزم، وَاستِقصاءٌ في عَدل، وَإفضالٌ في قَصد;

    न्याय पर आधारित सियासत के तीन स्तम्भ हैं, दूर दर्शिता के साथ नर्मी, न्याय को अंतिम सीमा तक पहुंचाना, और मध्य क्रम में लोगों को धन देना अर्थात न बहुत कम न अत्याधित।

    287. سَل عَنِ الجارِ قَبلَ الدّارِ;

    घर (खरीदने) से पहले पड़ोसी के बारे में पूछ ताछ करो।

    288.

    سالِمِ النّاسَ تَسلَم، وَاعمَل لِلآخِرَةِ تَغنَم;

    लोगों के साथ मोहब्बत से रहो ताकि सुरक्षित रहो और आख़ेरत के लिये काम करो ताकि तुम्हें ग़नीमत मिले।

    289. سَلامَةُ العَيشِ فِي المُداراةِ;

    ज़िन्दगी का आराम, प्यार मोहब्बत में है।

    290. سَيِّئَةُ تَسُوؤُكَ خَيرٌ مِن حَسَنَة تُعجِبُكَ;

    जो गुनाह तुम्हें ग़मगीन कर दे, वह उस नेकी से अच्छा है जो तुम में घमंड पैदा कर दे।

    291. سَمعُ الاُذُنِ لايَنفَعُ مَعَ غَفَلَةِ القَلبِ;

    दिल के ग़ाफ़िल होते हुए, कानों से सुनने का कोई फ़ायदा नहीं है।

    292. سِرُّكَ اَسيِرُكَ فَإن اَفشَيتَهُ صِرتَ اَسيرَهُ;

    तुम्हारा राज़, तुम्हारा कैदी है, अगर तुम ने उसे खोला तो तुम उसके कैदी बन जाओगे।

    293. سُوءُ الخُلقِ نَكَدُ العَيشِ وَعَذابُ النَّفسِ;

    बुरा अखलाक ज़िन्दगी के लिए कठिनाई और जान के लिए अज़ाब है।

    294. سَلُوا القُلُوبَ عَنِ المَوَدّاتِ فَإنَّها شَواهِدُ لا تَقبَلُ الرُّشا;

    दोस्ती व मोहब्बत को दिलों से पूछो, क्योंकि दिल ऐसा गवाह हैं जो रिशवत नहीं लेते।

    295. شُكرُ المُؤمِنِ يَظهَرُ فِي عَمَلِهِ;

    मोमिन का शुक्र, उसके कार्यों से प्रकट होता है।

    296. شَرُّ النّاسِ مَن لا يَقبَلُ العُذرَ، وَلا يُقيِلُ الذَّنبَ;

    सब से बुरा इंसान वह हैं जो किसी मजबूरी को क़बूल नही करता और गलतियों को माफ नहीं करता।

    297. شَرُّ العَمَلِ ما أفسَدتَ بِهِ مَعادَكَ;

    सब से बुरा काम वह है, जिस से तुम अपनी आख़ेरत बर्बाद कर लो।

    298. شَرُّ النّاسِ مَن يَرى أَنَّهُ خَيرُهُم;

    सब से बुरा इंसान वह है, जो स्वयं को दूसरों से अच्छा समझे।

    299. شَرُّ النّاسِ مَن لا يُبالِي أن يَراهُ النّاسُ مُسِيئاً;

    सब से बुरा इंसान वह हैं, जो इस बात की परवाह न करें कि लोग उसे गुनाहगार के रूप में देखें।

    300. شَرُّ اَصدِقائِكَ مَن تَتَكَلَّفُ لَهُ;

    तुम्हारा सब से बुरा दोस्त वह है, जिसकी वजह से तुम किसी मुसिबत में फँस जाओ।