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    हदीसें

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    सातवाँ भाग

    301. شَرُّ الاَوطانِ مالَم يَأمَن فيهِ القُطّانُ;

    सब से बुरा वतन वह है, जिसमें रहने वाले लोग सुरक्षित न हों।

    302. شَرُّ النّاسِ مَن لا يُرجى خَيرُهُ وَلا يُؤمَنُ شَرُّهُ; सब से बुरे लोग वह है जिन से किसी भलाई की उम्मीद न हो और उनकी बुराई से न बचा जा सकता हो।

    303. شَرُّ الاَصحابِ السَّريعُ الاِنقِلابِ; सब से बुरे साथी वह हैं जो जल्दी ही रंग बदल दें।

    304. شاوِر قَبلَ أن تَعزِمُ، وَفَكِّر اَن تُقدِمَ; इरादा करने से पहले मशवरा करो और काम शुरु करने से पहले सोचो।

    305. شَيئانِ لاَيعرِفُ فَضلَهُما اِلاَّ مَن فَقَدَهُما; الشَّبابُ وَالعافِيَةُ; दो चीज़ें ऐसी हैं जिनके महत्व को केवल वही जानता है, जिसके पास से वह चली जाती है : जवानी और स्वास्थ।

    306. شَيئانِ لا يُوزَنُ ثَوابُهُما; اَلعَفوُ وَالعَدلُ; दो चीज़ें ऐसी हैं जिनके सवाब (पुणय) का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है : क्षमा और न्याय।

    307. شارِكُوا الَّذِي قَد أقبَلَ الرِّزقُ فَإنَّهُ أجدَرُ بِالحَظِّ وَأخلَقُ بِالغِنى; जिसकी ओर धन बढ़ जाये, उसके साझीदार बन जाओ, क्योंकि वह लाभान्वित होने के लिए योग्य व मालदारी के लिए उपयुक्त है।

    308. صَلاحُ العَمَلِ بِصَلاحِ النِّيَّةِ; कार्यों का सही होना, नीयत के सही होने पर आधारित है।

    309. صَلاحُ العِبادَةِ التَّوَكُّلُ; तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा), इबादत को सवांरता है।

    310. صَلاحُ الاِنسانِ فِي حَبسِ اللِّسانِ وَبَذلِ الإحسانِ;

    इन्सान की भलाई, ज़बान को काबू में रखने और नेकी करने में है।

    311. صِحَّةُ الاَجسامِ مِن أهنَإ الأقسامِ;

    तन्दरुस्ती, सब से बड़ी नेमत है।

    312. صِيانَةُ المَرأةِ أنعَمُ لِحالِها وَأدوَمُ لِجَمالِها;

    औरत का पर्दा, उसके लिये लाभदायक है और उसकी सुन्दरता को हमेशा बाकी रखता है।

    313. صاحِبُ السَّوءِ قِطعَةٌ مِنَ النّارِ;

    बुरा साथी दोज़ख की आग का एक अंगारा होता है।

    314. صِلَةُ الأرحامِ تُثمِرُ الأموالَ وَتُنسِىءُ فِي الآجالِ;

    सिला ए रहम (रिश्तेदारों के साथ मिलने जुलने) से माल बढ़ता है और मौत टलती है।

    315. صَدَقَةُ السِّرِّ تُكَفِّرُ الخَطيئَةَ، وَصَدَقَةُ العَلانِيَةِ مَثراةٌ فِي المالِ;

    छिपा कर दिया जाने वाला सदक़ा, गुनाहों को छिपाता है और खुले आम दिये जाने वाले सदक़े से माल बढ़ाता है।

    316. صُن دينَكَ بِدُنياكَ تَربَحهُما وَلا تَصُن دُنياكَ بِدِينِكَ فَتَخسَرَهُما;

    अपने दीन की दुनिया के द्वारा रक्षा करो ताकि दोनों से फ़ायदा उठाओ और अपनी दुनिया को दीन के द्वारा न बचाओ वरन दोनों का नुक़्सान होगा।

    317. صُمتٌ يُعقِبُكَ السَّلامَةَ خيرٌ مِن نُطق يُعقِبُكَ المَلامَةَ;

    जिस खामोशी के परिणाम में तुम्हारी सुरक्षा हो, वह उस बोलने से अच्छी है जिसके नतीजे में तुम्हें बुरा कहा जाये।

    318. صِيامُ القَلب عَنِ الفِكرِ فِي الآثامِ أفضَلُ مِن صِيامِ البَطنِ عَنِ الطَّعامِ;

    दिल का रोज़ा, पेट के रोज़े से अच्छा है (अर्थात पेट को खाने से रोकने से अच्छा यह है कि दिल को गुनाह की फिक़्र से रोका जाये।

    319. صَدرُ العاقِلِ صُندُوقُ سِرِّهِ;

    बुद्धिमान का सीना, उसके रहस्यों का सन्दूक होता है।

    320. ضَرُوراتُ الاَحوالِ تُذِلُّ رِقابَ الرِّجالِ;

    आवश्यक्तायें, मर्दों की गर्दनों को झुका देती हैं।

    321. ضادُّوا التَّوانِي بِالعَزمِ;

    आलस्य को दृढ़ संकल्प से खत्म करो।

    322. طُوبى لِلمُنكَسِرَةِ قُلوبُهُم مِن أجلِ اللهِ; खुशी है उनके लिये जिनके दिल अल्लाह के लिये टूटे हैं।

    323. طُوبى لِمَن خَلا مِنَ الغِلِّ صَدرُهُ وَسَلِمَ مِنَ الغِشِّ قَلبُهُ;

    खुशी है उनके लिये जिनके सीने किनः (ईर्ष्या) से ख़ाली और दिल धोखे बाज़ी से साफ़ हैं।

    324. طُوبى لِمَنَ قَصَّرَ أمَلَهُ وَاغتَنَمَ مَهَلَهُ;

    खुशी है उनके लिये जो अपनी इच्छाओं को कम करते हैं और मोहलत (उम्र) को ग़नीमत मानते हैं।

    325. طَلَبُ الجَنَّةِ بِلا عَمِل حُمقٌ;

    (अच्छे) कार्य किये बिना, जन्नत की चाहत मूर्खता है।

    326. طَلَبُ الجَمعِ بَينَ الدُّنيا وَالآخِرَةِ مِن خِداعِ النَّفسِ; दुनिया और आख़ेरत दोनों को इकठ्ठा करने की चाहत आत्मा का एक धोखा है।

    327. طَلَبُ المَراتِبِ وَالدَّرَجاتِ بِغَيرِ عَمَل جَهلٌ;

    (उचित) कार्यों के बिना ऊँचे स्थान की इच्छा, मूर्खता है।

    328. طَريقَتُنا القَصدُ، وَسُنَّتُنا الرُّشدُ;

    हम अहले बैत का तरीक़ा मध्य क्रम को अपना और हमारी सुन्नत विकास करना है।

    329. طَعنُ اللِّسانِ أمَضٌ مِن طَعنِ السِّنانِ;

    ज़बान का ज़ख्म, भाले के जख्म से अधिक दर्द दायक होता है।

    330. طَهِّرُوا أنفُسَكُم مِن دَنَسِ الشَّهَواتِ تُدرِكُوا رَفيعَ الدَّرَجاتِ;

    अपनी आत्मा को हवस की गंदगी से पाक करो, ऊँचे दर्जे पाओ।

    331. ظُلمُ الضَّعيفِ أفحَشُ الظُّلمِ; कमज़ोर पर ज़ुल्म करना, सब से बुरा ज़ुल्म है।

    332. ظَلَمَ المَعروفَ مَن وَضَعَهُ فِي غَيرِ أهلِهِ;

    किसी अयोग्य के साथ भलाई करना, भलाई पर ज़ुल्म है।

    333. ظُلمُ اليَتامى وَالاَيامى يُنزِلُ النِّقَمَ وَيَسلُبُ النِّعَمَ أهلَها; यतीमों और बेवा औरतों पर ज़ुल्म करने से विपत्तियाँ आती है और नेमत वालों से नेमतें छीन ली जाती हैं।

    334. عَلَيكَ بِالاخِرَةِ تَأتِكَ الدُّنيا صاغِرَةً;

    आख़ेरत के लिये काम करो, ताकि दुनिया ज़लील हो कर तुम्हारे पास आये।

    335. عَلَيكَ بِالسَّكينَةِ فَإنَّها أفضَلُ زينَة;

    गंभीरता के साथ रहो क्यों कि गंभीरता सब से अच्छी शोभा है।

    336. عَلَيكَ بِالشُّكرِ فِي السَّرّاءِ وَالضَّرّاءِ;

    सुख दुख में अल्लाह का शुक्र करते रहो।

    337. عَلَيكَ بِالبَشاشَةِ فَإنَّها حِبالَةُ المَوَدَّةِ;

    हँस मुख रहो, क्योंकि हँस मुखी दोस्ती का जाल है।

    338. عَلَيكَ بِإخوانِ الصَّفاءِ فَإنَّهُم زينَةٌ فِي الرَّخاءِ وَعَونٌ فِي البَلاءِ;

    (बुराईयों से) पाक साफ़ भाईयों (दोस्तों) के साथ रहो, क्योंकि वह खुशियों में शोभा और विपत्तियों में सहायक होते हैं।

    339. عَلى قَدرِ المَؤُنَةِ تَكُونُ مِنَ اللهِ المَعُونَةُ;

    जितना खर्च होता है, अल्लाह की तरफ़ से उतनी ही मदद मिलती है।

    340. عَلَى التَّواخِي فِي اللهِ تَخلُصُ المَحَبَّةُ;

    अल्लाह के लिये भाई चारे का संबंध स्थापित करने से, निस्वार्थ मोहब्बत होती है।

    341. عَلَى المُشيرِ الاِجتِهادُ فِي الرَّأيِ وَلَيسَ عَلَيهِ ضَمانُ النُّجحِ;

    मशवरा देने वाले का काम सही राय देने की कोशिश करना है, उस पर सफ़लता की ज़िम्मेदारी नहीं है।

    342. عِندَ تَعاقُبِ الشّدائِدِ تَظهَرُ فَضائِلُ الإنسانِ;

    एक के बाद एक कठिनाई पड़ने की स्थिति में इन्सान के गुण व श्रेष्ठता प्रकट होती हैं।

    343. عِندَ نُزُولِ الشَّدائِدِ يُجَرَّبُ حِفاظُ الإخوانِ; दोस्ती व भाई चारे की लाज रखने वालों की परख कठिनाई के समय होती है।

    344. عِندَ بَديهَةِ المَقالِ تُختَبَرُ عُقُولُ الرِّجالِ;

    तुरंत बात कहने के समय मर्दों की बुद्धियों को परखा जाता है।

    345. عِندَ حُضُورِ الشَّهَواتِ وَاللَّذّاتِ يَتَبَيَّنُ وَرَعُ الأتقِياءِ;

    पारसाओं की पारसाई, हवस और मज़े के समय प्रकट होती है।

    346. عَوِّد نَفسَكَ السَّماحَ وَتَجَنُّبَ الإلحاحِ يَلزَمكَ الصَّلاحُ;

    अपने अन्दर दूसरों को चीज़ देने और ज़िद न करने की आदत डालो, तुम्हारे ऊपर सुधार व इस्लाह वाजिब है।

    347. عادَةُ اللِّئامِ المُكافاةُ بِالقَبيحِ عَنِ الإحسانِ;

    नीच लोगों की आदत, अच्छाई का जवाब बुराई से देना है।

    348. عَجِبتُ لِمَن يَرى أنَّهُ يَنقُصُ كُلَّ يَوم فِي نَفسِهِ وَعُمُرِهِ وَهُوَ لا يَتَأَهَّبُ لِلمَوتِ;

    मुझे आश्चर्य है उन लोगों पर जो देखते हैं कि हर दिन उनकी उम्र व जान कम हो रही है, परन्तु वह फिर भी मरने के लिये तैयार नहीं होते।

    349. عَجِبتُ لِمَن يَحتَمِي الطَّعامَ لاِذيَّتِهِ كَيفَ لا يَحتَمِي الذَّنبَ لاِليمِ عُقُوبَتِهِ;

    मुझे आश्चर्य है उन लोगों पर जो बीमारी के डर से (अनुचित चीज़ें) खाने पीने से बचते हैं, परन्तु दर्द दायक अज़ाब के डर से गुनाह से नहीं बचते !।

    350. عَجِبتُ لِمَن يَرجُو فَضلَ مَن فَوقَهُ كَيفَ يَحرِمُ مَن دُونَهُ;

    मुझे आश्चर्य है उन लोगों पर जो अपने से ऊपर वाले लोगों से भलाई की अम्मीद रखते हैं, वह अपने से नीचे वालों को किस तरह वंचित करते हैं।