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    हदीसें

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    आठवाँ भाग

    351.عِلمٌ بِلا عَمَل كَشَجَر بِلا ثَمَر;

    ज्ञान के अनुरूप कार्यों का न होना, बिना फल के पेड़ के समान है। अर्थात अगर ज्ञान के अनुरूप कार्य न हों तो ज्ञान का कोई लाभ नही है।

    352. عَلِّمُوا صِبيانَكُم الصَّلاةَ وَخُذُوهُم بِها إذا بَلَغُوا الحُلُمَ;

    अपने बच्चों को नमाज़ सिखाओ और जब वह बालिग हो जायें तो उनसे नमाज़ के बारे में पूछ ताछ करो।

    353. عَينُ المُحِبِّ عَمِيَّةٌ عَن مَعايِبِ المَحبُوبِ، وَأُذُنُهُ صَمَاءُ عَن قِبحِ مَساويهِ;

    आशिक की आँखें, माशूक की बुराईयों को नहीं देखतीं और उसके कान उसकी बुराई को नहीं सुनते।

    354. عاص يُقِرُّ بِذَنبِهِ خَيرٌ مِن مُطيع يَفتَخِرُ بِعَمَلِهِ;

    अपने गुनाहों को स्वीकार करने वाला गुनहगार, उस आज्ञाकारी से अच्छा है जो अपने कार्यों पर गर्व करता है।

    355. عامِل سائِرَ النّاسِ بِالإنصافِ وَعامِلِ المُؤمِنينَ بِالإيثارِ;

    समस्त लोगों के साथ न्याय पूर्वक व्यवहार करो और मोमिनों से त्याग के साथ।

    356. غايَةُ الخِيانَةِ خِيانَةُ الخِلِّ الوَدُودِ وَنَقضُ العُهُودِ;

    ग़द्दारी की अन्तिम सीमा, अपने पक्के दोस्त को धोखा देना और प्रतिज्ञा को तोड़ना है।

    357. غَضُّ الطَّرفِ مِن أفضَلِ الوَرَعِ;

    सब से बड़ी पारसाई, स्वयं को बुरी नज़र से रोकना है।

    358. غَيِّرُوا العاداتِ تَسهُل عَلَيكُمُ الطّاعاتُ;

    अपनी आदतों को बदलो ताकि आज्ञा पालन तुम्हारे लिये सरल हो जाये।

    359. غَلَبَةُ الهَزلِ تُبطِلُ عَزيمَةَ الجِدِّ;

    हँसी मज़ाक़ की अधिकता, गंभीरता को खत्म कर देती है।

    360. فِي تَصاريفِ الدُّنيَا اعتِبارٌ;

    दुनिया में होने वाले परिवर्तनों में शिक्षाएं (निहित) हैं।

    361. فِي تَصاريفِ الأحوالِ تُعرَفُ جَواهِرُ الرِّجالِ;

    स्थितियों के बदलने पर मर्दों के जौहर पहचाने जाते हैं।

    362. فِي الضِّيقِ يَتَبَيَّنُ حُسنُ مُواساةِ الرَّفيقِ;

    तंगी के समय, दोस्त की ओर से होने वाली सहायता का पता लगता है।

    363. فِي لُزومِ الحَقِّ تَكونُ السَّعادَةُ;

    हक़ की पाबन्दी से खुशी नसीब होती है।

    364. فِي المَواعِظِ جَلاءُ الصُّدُورِ;

    नसीहत से दिल चमकते हैं।

    365. فازَ مَن أصلَحَ عَمَلَ يَومِهِ وَاستَدرَكَ فَوارِطَ أمسِهِ;

    जिसने अपने आज के कार्यों को सुधार कर, कल की ग़लतियों का बदला चुकाया, वह सफल हो गया।

    366. فازَ مَن تَجَلبَبَ الوَفاءَ وَادَّرَعَ الأمانَةَ;

    जिसने वफ़ादारी का वेश धारण किया और अमानत का कवच पहना, वह सफल हो गया। अर्थात जिसने वफादारी और अमानतदारी को अपनाया वह सफल हो गया।

    367. فَضِيلَةُ السُّلطانِ عِمارَةُ البُلدانِ;

    बादशाह की श्रेष्ठता शहरों को आबाद करने में है।

    368. قَد جَهِلَ مَنِ استَنصَحَ أعداءَهُ;

    जिसने अपने दुशमनों से नसीहत चाही उसने मूर्खता की।

    369. قَد تُورِثُ اللَّجاجَةُ ما لَيسَ لِلمرَءِ إِلَيهِ حاجَةٌ;

    कभी कभी इंसान को ज़िद के नतीजे में वह मिलता है, जिसकी उसे ज़रूरत नही होती।

    370. قَد كَثُرَ القَبيحُ حَتّى قَلَّ الحَياءُ مِنهُ;

    बुराईयाँ इतनी फैल गईं हैं कि अब बुराईयों से शर्म कम हो गई है।

    371. قَليلٌ تَدُومُ عَلَيهِ خَيرٌ مِن كَثير مَملُول;

    निरन्तर चलते रहने वाला कम कार्य, उस अधिक कार्य से अच्छा है, जिससे तुम उकता जाओ।

    372. قَدرُ الرَّجُلِ عَلى قَدرِ هِمَّتِهِ، وَعَمَلُهُ عَلى قَدرِ نِيَّتِهِ;

    आदमी का महत्व उसकी हिम्मत के अनुरूप होता है और उसके कार्यों का महत्व उसकी नीयत के अनुसार होता है।

    373. قَولُ «لا اَعلَمُ» نِصفُ العِلمِ;

    यह कहना कि “मैं नही जानता हूँ।” स्वयं आधा ज्ञान है।

    374. قارِن أهلَ الخَيرِ تَكُن مِنهُم، وَبايِن أهلَ الشَّرِّ تَبِن عَنهُم;

    अच्छे लोगों से मिलो ताकि तुम भी उन्हीं जैसे बन जाओ और बुरे लोगों से दूर रहो ताकि उनसे अलग रह सको।

    375. قِوامُ العَيشِ حُسنُ التَّقديرِ وَمِلاكُهُ حُسنُ التَّدبيرِ;

    जीवन अच्छी योजना से आरामदायक बनता है और उसे अच्छे प्रबंधन से प्राप्त किया जा सकता है।

    376. كُلُّ ذي رُتبَة سَنِيَّة مَحسودٌ;

    हर ऊँचे पद (मान सम्मान) वाले से ईर्ष्या की जाती है।

    377. كُلُّ امرِء يَميلُ إلى مِثلِهِ;

    हर इंसान अपने जैसे इंसान की तरफ़ झुकता है।

    378. كُلُّ داء يُداوى اِلاّ سُوءَ الخُلقِ;

    बद अख़लाक़ी (दुष्टता) के अतिरिक्त हर बीमारी का इलाज है।

    379. كُلُّ شَيء يَنقُصُ عَلَى الإنفاقِ إلاَّ العِلمَ;

    ज्ञान के अलावा हर चीज़ ख़र्च करने से कम होती है।

    380. كُلُّ شَيء لا يُحسُنُ نَشرُهُ أمانَةٌ وَإن لَم يُستَكتَم;

    जिस चीज़ का प्रचार करना सही न हो, वह अमानत है, चाहे उसके छिपाने का आग्रह भी न किया गया हो।

    381. كَم مِن صَعب تَسَهَّلَ بِالرِّفقِ;

    बहुत सी कठिनाईयाँ प्यार मोहब्बत से हल हो जाती हैं।

    382. كَم مِن مُسَوِّف بِالعَمَلِ حَتّى هَجَمَ عَلَيهِ الأجَلُ;

    ऐसे बहुत से लोग हैं जो काम करने में आज कल करते रहते हैं, यहाँ तक कि उन पर मौत हमला कर देती है।

    383. كَيفَ تَصفُو فِكرَةُ مَن يَستَديِمُ الشِّبَعَ؟!;

    उसके विचार किस तरह साफ़ हो सकते हैं, जिसका पेट हमेशा भरा रहता हो?!

    384. كَيفَ يُفرَحُ بِعُمر تَنقُصُهُ السّاعات؟!;

    उस उम्र से किस तरह खुशी मिल सकती है, जिसमें हर पल कमी होती रहती है ?

    385. كَيفَ يَجِدُ لَذَّةَ العِبادَةِ مَن لا يَصُومُ عَنِ الهَوى؟!;

    वह इबादत का मज़ा कैसे चख सकता है जो स्वयं को हवस से न रोक सकता हो ?!

    386. كَيفَ يُصلِحُ غَيرَهُ مَن لا يُصلِحُ نَفسَهُ؟!;

    वह दूसरों को कैसे सुधार सकता है, जिसने स्वयं को न सुधारा हो ?!

    387. كَيفَ يَدَّعِي حُبَّ اللهِ مَن سَكَنَ قَلبَهُ حُبُّ الدُّنيا؟!;

    वह अल्लाह से मोहब्बत का दावा कैसे कर सकता है, जिसके दिल में दुनिया की मोहब्बत बस गई हो?!

    388. كَفى بِالشَّيبِ نَذيِراً;

    डरने के लिए, बालों का सफ़ेद होना काफ़ी है।

    389. كَفى بِالمَرءِ فَضيلَةً أن يُنَقِّصَ نَفسَهُ;

    आदमी की श्रेषठता के लिए यही काफ़ी है कि स्वयं को अपूर्ण माने।

    390. كَفى بِالمرء كَيِّساً أن يَعرِفَ مَعايِبَهُ;

    आदमी की होशिआरी के लिए यही काफ़ी है कि वह अपनी बुराइयों को जानता हो।

    391. كَفى بِالمَرءِ جَهلاً أن يَضحَكَ مِن غَيرِ عَجَب;

    आदमी की मूर्खता के लिए बेमौक़े हँसना काफ़ी है।

    392. كَفى مُخبِراً عَمّا بَقِيَ مِنَ الدُّنيا ما مَضى مِنها

    जो (लोग) दुनिया में बच गये हैं, उनकी जानकारी के लिए वह काफ़ी हैं जो दुनियाँ से चले गये हैं।

    393. كَفى بِالمَرئِ غَفلَةً أن يَصرِفَ هِمَّتَهُ فيما لا يَعنيهِ;

    आदमी की लापरवाही के लिए यही काफ़ी है कि वह अपनी ताक़त को काम में न आने वाली चीज़ों में व्यय कर दे।

    394. كَفاكَ مُؤَدِّباً لِنَفسِكَ تَجَنُّبُ ما كَرِهتَهُ مِن غَيرِكَ; 395. كَثرَةُ المُزاحِ تُسقِطُ الهَيبَةَ;

    अधिक मज़ाक़, रौब को ख़त्म कर देता है।

    396. كَثرَةُ الغَضَبِ تُزرِي بِصاحِبِهِ وَتُبدِي مَعايِبَهُ;

    अधिक क्रोध, क्रोधी को अपमानित करा देता है और उसकी बुराइयों को प्रकट कर देता है।

    397. كُن سَمِحاً وَلا تَكُن مُبَذِّراً;

    दानी बनो, लेकिन व्यर्थ ख़र्च करने वाले न बनो।

    398. كُن مَشغُولاً بِما أنتَ عَنهُ مَسئُولٌ;

    तुम उस काम में व्यस्त रहो जिसके बारे में तुम से पूछ ताछ की जायेगी।

    399. كُن لِلمَظلذومِ عَوناً، وَلِلظّالِمِ خَصماً;

    पीड़ित के सहायक और अत्याचारी के दुश्मन बनो।

    400. كُن بَعيدَ الهِمَمِ إذا طَلَبتَ، كَريمَ الظَّفَرِ إذا غَلَبتَ;

    जब किसी चीज़ को प्राप्त करना चाहो तो उच्च हिम्मत से काम करो और जब किसी चीज़ पर अधिपत्य जमा लो तो अपनी सफला में महानता का परिचय दो।