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    हदीसें

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    नवाँ भाग

    401. كُن بِأسرارِكَ بَخيلاً، وَلا تُذِع سِرّاً اُودِعتَهُ فَإنَّ الإذاعَةَ خِيانَةٌ;

    अपने रहस्यों के बारे में कँजूस बन जाओ (अर्थात किसी को न बताओ) और अगर कोई तुम्हें अपना राज़ बता दे तो उसके राज़ को न खोलो, क्योंकि किसी के राज़ को खोलना, ग़द्दारी है।

    402. كُلَّما كَثُرَ خُزّانُ الأسرارِ كَثُرَ ضِياعُها;

    जितने राज़दार बढ़ते जायेंगे, उतने ही राज़ खुलते जायेंगे।

    404. كَما تَزرَعُ تَحصُدُ;

    जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।

    405. كُفرانُ النِّعَمِ يُزِلُّ القَدَمَ وَيَسلُبُ النِّعَمَ;

    नेमत की नाशुक्री पैरों को लड़ खड़ा देती है और नेमत को रोक देती है।

    406. لِكُلِّ ضَيق مَخرَجٌ;

    हर तंग जगह से बाहर निकलने का रास्ता है।

    407. لِكُلِّ مَقامِ مَقالٌ;

    हर जगह के लिए एक बात है।

    408. لِكُلِّ شَيء زَكاةٌ وَزَكاةُ العَقلِ احتِمالُ الجُهّالِ;

    हर चीज़ के लिए एक ज़कात है और बुद्धी की ज़कात मूर्ख लोगों को बर्दाश्त करना है।

    409. لِطالِبِ العِلمِ عِزُّ الدُّنيا وَفَوزُ الآخِرَةِ;

    तालिबे इल्म (शिक्षार्थी) के लिए दुनिया में सम्मान और आख़ेरत में सफलता है।

    410. لِلمُؤمِنِ ثَلاثُ ساعات: ساعَةٌ يُناجي فيها رَبَّهُ وَساعَةٌ يُحاسِبُ فِيها نَفسَهُ، وَساعَةٌ يُخَلِّي بَينَ نَفسِهِ وَلَذَّتِها فِيما يَحِلُّ وَيَجمُلُ;

    मोमिन के लिए तीन वक़्त हैं : एक वक़्त वह जिसमें अल्लाह की इबादत करता है, दूसरा वक़्त वह जिसमें (अपने कार्यों का) हिसाब करता है, तीसरा वक़्त वह जिसमें वह हलाल व अच्छी लज़्ज़तो का आनंनद लेता है।

    411. لِيَكُن أبغَضُ النّاسِ إلَيكَ وَأبعَدُهُم مِنكَ أطلَبَهُم لِمَعايِبِ النّاسِ;

    तुम्हें सबसे ज़्यादा क्रोध उस इंसान पर करना चाहिए, और सबसे ज़्यादा दूर उस इंसान से रहना चाहिए, जो लोगों की बुराईयों की तलाश में अधिक रहता हो।

    412. لَن يَفُوزَ بِالجَنَّةِ إلاَّ السّاعِي لَها;

    जन्नत में उन लोगों के अलावा कोई नही जायेगा जो उसमें जाने के लिए कोशिश करते हैं।

    413. لَن يُجدِيَ القَولُ حَتّى يَتَّصِلَ بِالفِعلِ;

    किसी भी बात का उस समय तक फ़ायदा नही है, जब तक उसके अनुसार कार्य न किया जाये।

    414. لَن تُدرِكَ الكَمالَ حَتّى تَرقى عَنِ النَّقصِ;

    तुम उस समय तक कमाल पर नही पहुँच सकते, जब तक (अपनी) कमियों को दूर न कर लो।

    415. لَيسَ مَعَ قَطيعَةِ الرَّحِمِ نَماءٌ;

    क़त- ए- रहम (संबंधियों से नाता तोड़ना) के साथ विकास नही है।

    416. لَيسَ لاِنفُسِكُم ثَمَنٌ إلاَّ الجَنَّةُ فَلا تَبيعُوها إلاّ بِها;

    तुम्हारी जान की क़ीमत जन्नत के अलावा कुछ नही है, इस लिए तुम उसे जन्नत के अलावा किसी चीज़ के बदले में न बेंचो।

    417. لَيسَ مِنَ العَدلِ القَضاءُ عَلَى الثِّقَةِ بِالظَّنِّ;

    अमानतदार, इंसान के बारे में किसी आशंका के आधार पर कोई फैसला करना न्यायपूर्वक नही है।

    418. لَيسَ لَكَ بِأخ مَنِ احتَجتَ إلى مُداراتِهِ;

    वह तुम्हारा भाई नही है, जिसके प्रेम पूर्वक व्यवहार की तुम्हें ज़रूरत हो।

    419. لَيسَ لَكَ بِأخ مَن أحوَجَكَ إلى حاكِم بَينَكَ وَبَينَهُ;

    वह तुम्हारा भाई नही है जो तुम्हें अपने व तुम्हारे बीच फ़ैसले के लिए (किसी तीसरे फ़ैसला करने वाले का) मोहताज बना दे।

    420. لَيسَ لِلعاقِلِ أن يَكُونَ شاخِصاً إلاّ فِي ثَلاث: خُطوَة في مَعاد، أو مَرَمَّةِ لِمَعاش أو لَذَّة في غَيرِ مُحَرَّم;

    बुद्धिमान के लिए शौभनीय नही है कि वह निम्न- लिखित तीन कामों के अतिरिक्त कोई अन्य काम करे : क़ियामत के लिए काम करना, जीविका कमाना और हलाल तरीक़े से मज़ा लेना।

    421. لَم يَعقِل مَواعِظَ الزَّمانِ مَن سَكَنَ إلى حُسنِ الظَّنِّ بِالأيّامِ;

    जो समय के बारे में ख़ुश गुमान रहता है उस आदमी को ज़माने की शक्षाएं व नसीहतें बुद्धिमान नही बना सकती हैं।

    422. لَم يَعقِل مَن وَلِهَ بِاللَّعِبِ وَاستُهتِرَ بِاللَّهوِ وَالطَّرَبِ;

    जो खेल कूद, नाच गाने और व्यर्थ बातों का आशिक़ बन जाये, वह बुद्धिमान नही है

    423. لَوِ اعتَبَرتَ بِما أضَعتَ مِن ماضِي عُمرِكَ لَحَفِظتَ ما بَقِيَ;

    अगर तुम अपनी व्यर्थ बीती हुई उम्र से शिक्षा लो तो शेष उम्र की रक्षा करो।

    424. لَو يَعلَمُ المُصَلّي ما يَغشاهُ مِنَ الرَّحمَةِ لَما رَفَعَ رَأسَهُ مِنَ السُّجُودِ;

    अगर नमाज़ पढ़ने वाला यह जान जाये कि उसे कौनसी रहमत (अनुकम्पा) घेरे हुए है तो वह सजदे से सर न उठाये।

    425. لَو بَقِيَتِ الدُّنيا عَلى أحَدِكُم لَم تَصِل إلى مَن هِيَ فِي يَدَيهِ;

    अगर दुनिया तुम में से किसी एक के पास बाक़ी रहती तो जिसके पास आज है, उसके पास कभी न पहुँचती।

    426. لِيَكُن مَركَبُكَ القَصدَ وَمَطلَبُكَ الرُّشدَ;

    मध्य चाल के घोड़े पर सवार होकर अपने विकास की ओर बढ़ो। अर्थात अपने ख़र्च को सीमित करो न अधिक ख़र्च करो और न बहुत कम।

    427. لِن لِمَن غالَظَكَ فَإنَّهُ يُوشِكُ اَن يَلينَ لَكَ;

    जो तुम्हारे साथ सख़्ती करे, तुम उसके साथ नर्मी करो, वह भी तुम्हारे लिए नर्म हो जायेगा।

    428. لِقاءُ أهلِ المَعرِفَةِ عِمارَةُ القُلُوبِ وَمُستَفادُ الحِكمَةِ;

    अहले मारेफ़त (आध्यात्मिक लोग) से मिलने जुलने पर दिल खुश होता है और हिकमत (बुद्धी) बढ़ती है।

    429. لَذَّةُ الكِرامِ فِي الإطعامِ، وَلَذَّةُ اللِّئامِ فِي الطَّعامِ;

    करीम (श्रेष्ठ) लोगों को खिलाने में मज़ा आता है और नीच लोगों को खाने में मज़ा आता है।

    430. مَن أنصَفَ أُنصِفَ;

    जो इंसाफ़ करता है, उसके साथ इंसाफ़ होता है।

    431. مَن أحسَنَ المَسأَلَةَ أُسعِفَ;

    जो अच्छे ढंग से माँगता है, उसे मिलता है।

    432. مَن مَدَحَكَ فَقَد ذَبَحَكَ;

    जिसने तुम्हारी प्रशंसा की, उसने तुम्हें क़त्ल कर दिया

    433. مَن دَخَلَ مَداخِلَ السُّوءِ اتُّهِمَ;

    जो बुरी जगह जाता है, उस पर आरोप लगते हैं।

    434. مَن نَسِيَ اللهَ أنساهُ نَفسَهُ;

    जो अल्लाह को भूल जाता है, अल्लाह उसे ख़ुद उससे भुला देता है।

    435. مَن أساءَ خُلقَهُ عَذَّبَ نَفسَهُ;

    जो स्वयं को दुष्ट बना लेता है, वह कठिनाईयाँ झेलता है।

    436. مَن عَجِلَ كَثُرَ عِثارُهُ;

    जो जल्दी करता है, उसकी ग़लतियाँ अधिक होती हैं।

    437. مَن أحَبَّ شَيئاً لِهِجَ بِذِكرِهِ;

    जो जिस चीज़ से मोहब्बत करता, उसकी ज़बान पर उसका नाम रहता है।

    438. مَن قَبَضَ يَدَهُ مَخافَةَ الفَقرِ فَقَد تَعَجَّلَ الفَقرَ;

    जो निर्धनता के डर से अपने हाथ को (दान देने से) रोक ले, समझो वह तेज़ी के साथ निर्धनता की ओर बढ़ रहा है।

    439. مَن نَظَرَ فِي العَواقِبِ سَلِمَ;

    जो (किसी काम के) परिणाम पर विचार करता है, वह सुरक्षित रहता है।

    440. مَن جَهِلَ مَوضِعَ قَدَمِهِ زَلَّ;

    जो अपने रास्ते को न जानता हो, वह भटक जाता है।

    441. مَن وَعَظَكَ أحسَنَ إلَيكَ;

    जिसने तुम्हें नसीहत की, उसने तुम्हारे साथ भलाई की।

    442. مَن وافَقَ هَواهُ خالَفَ رُشدَهُ;

    जिसने अपनी इच्छाओं का समर्थन किया, उसने अपने विकास को अवरुद्ध किया।

    443. مَن أحسَنَ إلى جِيرانِهِ كَثُرَ خَدَمُهُ;

    जो अपने पड़ौसियों के साथ भलाई करता है, उसके सेवक ज़्यादा हो जाते हैं।

    444. مَن أظهَرَ عَزمَهُ بَطَلَ حَزمُهُ;

    जो अपने इरादे को प्रकट कर देता है, उसकी दूरदर्शिता समाप्त हो जाती है।

    445. مَن غَشَّ نَفسَهُ لَم يَنصَح غَيرَهُ;

    जो स्वयं को धोखा देता है, वह दूसरों को नसीहत नही कर सकता।

    446. مَن عُرِفَ بِالكِذبِ لَم يُقبَل صِدقُهُ;

    जो झूठा मशहूर हो जाता है, उसकी सच्ची बात भी स्वीकार नही की जाती।

    447. مَن أعمَلَ اجتِهادَهُ بَلَغَ مُرادَهُ;

    जो कोशिश व मेहनत करता है, वह अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है।

    448. مَن ظَنَّ بِكَ خَيراً فَصَدِّق ظَنَّهُ;

    जो तुम्हारे बारे में अच्छा विचार रखता है, (तुम अपने व्यवहार से) उसके विचार को सत्य कर दिखाओ।

    449. مَن رَجاكَ فَلا تُخَيِّب أمَلَهُ;

    जो तुम से कोई उम्मीद रखता हो, उसे ना उम्मीद न करो।

    450. مَن عَلِمَ أنَّهُ مُؤاخَذٌ بِقَولِهِ فَليُقَصِّر فِي المَقالِ;

    जिसे यह पता हो कि उससे उसकी बात चीत के बारे में पूछ ताछ की जायेगी, उसे कम बोलना चाहिए।