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    हद्दे तरख्खु़स क्या है?

    हद्दे तरख्खु़स क्या है?
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    (हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की नज़र में)

    सवाल 672:  जर्मनी और यूरोप के कुछ शहरों का दर्मियानी फ़ासला (यानी एक शहर से निकलने और दूसरे शहर में दाख़िल हो जाने के साइन बोर्ड की दूरी) एक सौ मीटर से ज़्यादा नहीं है तो दूसरे शहरों की कुछ जगाहें और रास्ते तो एक दूसरे से मिले होते हैं, ऐसे मसअलों में तरख्खु़स की हद कहाँ से शुरू होती है?

    जवाब:  जहाँ दो शहर एक दूसरे से इस तरह मिले हों जैसा कि सवाल में ज़िक्र है तो ऐसे दो शहर, एक शहर के दो मौहल्लों के हुक्म में हैं यानी एक शहर से निकलने और दूसरे शहर में दाख़िल होने को सफ़र शुमार नहीं किया जायेगा, जिसके लिये हद्दे तरख़्ख़ुस मोअइयन की जाये।
    सवाल 673: हदे तरख़्ख़ुस का मेयार शहर की अज़ान सुनना और शहर की दीवारों को देखना है, क्या (हद्दे तरख़्ख़ुस में) इन दोनों का एक साथ होना ज़रूरी है या दोनों में से एक काफ़ी है?
    जवाब: ऐहतियात ये है कि दोनों अलामतों की रिआयत की जाये चाहे हद्दे तरख़्ख़ुस मोअईयन करने के लिये अज़ान का न सुनाई देना ही काफ़ी हो।
    सवाल 674: हद्दे तरख़्ख़ुस में शहर के शुरुआती घरों की जहाँ से मुसाफ़िर शहर से निकलता है या उस में दाख़िल होता है अज़ान का सुनाई देना मेयार है या शहर के बीच की अज़ान का सुनाई देना मेयार रखता है।?
    जवाब: शहर के उस आख़री हिस्से की अज़ान सुनना मेयार है कि जहाँ से मुसाफ़िर शहर से निकला है या उस में दाख़िल होता है।
    सवाल 675: हमारे यहाँ एक इलाक़े के लोगों के दर्मियान शरई हुदूद के बारे में इख़तेलाफ़ है, कुछ कहते है शहर के आख़री घरों की वो दीवारें मेयार हैं जो एक दूसरे से मिली हैं और कुछ कहते हैं कि शहर के घरों से बाहर जो कारख़ाने और पराकन्दा आबादियां हैं उनसे दूरी का हिसाब करना चाहिये। सवाल ये है कि शहर के आख़री हिस्सा कौन सा है?
    जवाब: शहर की आख़री हद का तय करना उर्फे़ आम पर मौकूफ़ है अगर उर्फे़ आम में कारख़ानों और दूसरी आबादियों को शहर का हिस्सा शुमार किया जाये तो फ़ासले का हिसाब शहर के आख़री घरों से किया जायेगा।