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    हमारी यादों को तू दिलों से मिटा नहीं सकता।

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    आशूर के दिन अर्थात दस मुहर्रम सन ६१ हिजरी क़मरी को संध्या के समय जब करबला के अंतिम शहीद और संसार के अत्यंत सम्मानीय व्यक्ति इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भूखा और प्यासा करबला में शहीद कर दिया गया और उसके पश्चात उनके परिजनों के ख़ेमों को आग के हवाले कर दिया गय तो शत्रु यह सोच रहा था कि अब तो सबकुछ समाप्त हो चुका है। इतिहास की इस अति निर्मम घटना के पश्चात शत्रु ने खुशियां मनाईं। उसके पश्चात यज़ीदी सैनिक, इमाम हुसैन के पवित्र परिजनों को बंदी बनाकर शाम ले गए। उस समय कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि केवल ४० दिन व्यतीत होने के साथ ही वास्तविकता खुलकर सार्वजनिक रूप से सामने आ जाएगी। चेहलुम अर्थात सफ़र महीने की बीस तारीख़ को इमाम हुसैन के पवित्र परिजनों को अत्याचारी यज़ीद के बंदीगृह से स्वतंत्रता मिली और उनका कारवां, करबला पहुंचा।

    करबला की घटना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महान महिला हज़र ज़ैनब, इमाम हुसैन के सुपुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन तथा अन्य बंदियों ने अपने विभिन्न भाषणों में विशेषकर यज़ीद की सभा में उसकी विजय को क्षणिक व अस्थाई बताया। हज़रत ज़ैनब ने अपने भाषण में शत्रु के अत्याचारों और उसकी क्रूरता को सार्वजनिक करते हुए कहा कि हे यज़ीद! क्या तू यह सोचता है कि क्योंकि तूने हमारे लिए समस्याएं उत्पन्न करके और हमें यातनाएं देकर बंदी बना लिया है अतः हम ईश्वर के निकट अपमानित हैं और तू सम्मानित है? हे दुष्ट यज़ीद! यद्यपि समय ने हमारे साथ एसा किया है कि मैं तुझ जैसे व्यक्ति से बात करने पर विवश हूं किंतु मैं तुझको बहुत ही तुच्छ समझती हूं। मैं तेरी और तेरे कार्यों की कड़ी आलोचना करती हूं। इस समय आंखें रो रही हैं और हृदय दुखी हैं। तू जो जी चाहे चाल चल और तेरा जो दिल चाहे वह कर। ईश्वर की सौगंध, हमारी यादों को तू दिलों से कभी भी मिटा नहीं सकता और हमारा संदेश समाप्त होने वाला नहीं है। तू कभी भी हमारे उच्च स्थान तक नहीं पहुंच सकता और कलंक के इस टीके को तू कभी भी अपने माथे से मिटा नहीं सकता।

    वैसे तो केवल करबला की घटना ही बनी उमय्या के वंशजो के विरूद्ध तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करने और लोगों की संवेदना को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ओर मोड़ने के लिए पर्याप्त थी किंतु उन परिस्थितियों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आन्दोलन के लिए जो सबसे बड़ा एवं गभीर ख़तरा था वह, उमवी शासकों की प्रोपेगडा मशीनरी थी और इस आन्दोलन को उसके मुख्य मार्ग से दिगभ्रमित करने के उनके प्रयास थे। दूसरे शब्दों में करबला की त्रासदी, यदि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के साथ ही समाप्त हो जाती तो बनी उमय्या यह दुषप्रचार करते कि यज़ीद विजयी हो गया है और इस प्रकार उस महान आन्दोलन के उद्देश्यों की पहचान की संभावना तक समाप्त हो जाती किंतु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सुपुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम और इमाम हुसैन की बहन हज़रत ज़ैनब ने अपनी दूरदर्शिता से इमाम हुसैन के आन्दोलन के संदेश को, उसके उसी आकर्षण एवं उत्साह के साथ अन्य राष्ट्रों तक पहुंचाने का निर्णय किया। उन्होंने यह कार्य बंदी बनाए जाने के तुरंत बाद आरंभ कर दिया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की वास्तविकता को स्पष्ट करने के साथ ही साथ उन्होंने उमवी शासन की भ्रष्ट प्रवृत्ति का भी रहस्योद्घाटन किया। इस प्रकार इन महान हस्तियों ने समाज में जागरूकता की किरण जगाई और यज़ीद के विरुद्ध आन्दोलन की चिंगारी सुलगाई।

    इस आधार पर अरबईन अर्थात इमाम हुसैन के चेहलुम को उनके तर्क के फलने-फूलने का दिन कहा जाता है जो सम्मानीय जीवन पर केन्द्रित है।

    अपने बंदीकाल के दौरान हज़रत ज़ैनब और इमाम सज्जाद ने जागरूकता इतनी अधिक बढ़ा दी थी कि यज़ीद जैसे भ्रष्ट शासक ने करबला की त्रासदी की ज़िम्मेदारी से स्वयं को अलग करने के लिए इस घटना का दायित्व कूफ़े के राज्यपाल इब्ने ज़ियाद पर डालते हुए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों के प्रति सहानुभूति प्रकट करना आरंभ कर दी। इस संबन्ध में चौथी हिजरी क़मरी के महान धर्मगुरू शेख मुफ़ीद अपनी पुस्तक “इरशाद” में लिखते हैं कि यज़ीद ने जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को स्वतंत्र करने का निर्णय लिया तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन को बुलाकर एकांत में उनसे कहा, ईश्वर की धिक्कार हो तुझपर इब्ने ज़ियाद। फिर यज़ीद ने कहा कि यदि तुम्हारे पिता से मेरी भेंट हुई होती तो वे मुझसे जो कहते उसे मैं पूरा करता और अपने पूरे सामर्थ्य के साथ मैं उनको मृत्यु से बचाने के प्रयास करता लेकिन क्या करूं, ईश्वर ने एसा ही निर्धारित किया था जो तुमने देखा। यज़ीद ने इमाम सज्जाद से कहा कि आप जैसे ही मदीने पहुंचे तो वहां से मुझे पत्र लिखिए और आपको जिस चीज़ की भी आवश्यकता हो उसका उल्लेख पत्र में कीजिए। मैं आपकी हर मांग पूरी करूंगा। यज़ीद ने यह बात एसी स्थिति में कही कि जब यह सर्वविदित था कि यज़ीद ने ही इमाम हुसैन से अपनी बैअत अर्थात अपने आज्ञापालन का वचन लेने का आदेश दिया था और उसने इब्ने ज़ियाद से कहा था कि अगर हुसैन बैअत न करें तो तुम उनकी हत्या करके उनका सिर मेरे पास भेज देना।

    करबला की घटना को घटे अभी ४० दिन का समय ही गुज़रा था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को शाम के बंदीगृह से स्वतंत्र करके सम्मान के साथ मदीने भेजने का निर्णय लिया गया। उन लोगों ने सर्वप्रथम करबला के शहीदों की ज़ियारत की इच्छा व्यक्त की ताकि उनके कटे हुए सिरों को वापस करबला ले जाएं। इस कारवां में इमाम ज़ैनुल आबेदीन और हज़रत ज़ैनब अग्रणी थे। इमाम हुसैन के परिजन शाम से स्वतंत्र होकर सीधे करबला पहुंचे। उनके लिए करबला की घटना की याद बहुत ही कष्टदायक एवं हृदय विदारक थी। इमाम हुसैन के परिजनों के लिए करबला में किये गए साहसिक कार्यों की याद पीड़ादायक तो थी किंतु यह उनके हृदयों में जोश और उत्साह उत्पन्न करती थी। एक कथन के अनुसार चेहलुम में दिन इमाम हुसैन की क़ब्र के प्रथम दर्शनार्थी, पैग़म्बरे इस्लाम के एक साथी जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी थे। जब वे इमाम के मज़ार पर पहुंचे तो उन्होंने तीन बार अल्लाहो अकबर कहा। यह कहकर वे मूर्छित हो गए और जब होश में आए तो उन्होंने अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा के साथ इमाम हुसैन के मज़ार के दर्शन किये।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम विश्व के समस्त सुधारकों के आदर्श हैं। उन्होंने इस्लामी समाज को भ्रष्टाचार और पतन से बचाने के उद्देश्य से इस समाज में अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम (स) के सुधार कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। इमाम हुसैन ने इस्लामी जगत मे दूरदर्शिता उत्पन्न करते हुए उसमें प्रचलित बुराइयों एवं कुरीतियों को स्पष्ट किया और लोगों के लिए सफलता एवं कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सच और झूठ के बीच मानदंड थे।

    इमाम हुसैन ने जब यह देखा कि लोगों के भीतर मायामोह में ग्रस्त होने के पश्चात अत्याचार और भ्रष्टाचार की ओर झुकाव उत्पन्न हो चुका है और उनमें अच्छाई और बुराई के बीच अंतर को समझने की क्षमता ही नहीं रह गई है तो उन्होंने अपने क्रांतिकारी आन्दोलन से समाज के गहरे घावों के उपचार के लिए क़दम उठाया। उन्होंने अपने और अपने सच्चे साथियों के पवित्र रक्त से निश्चेतता में पड़े इस्लामी समाज के शरीर में नई जान डालने का प्रयास किया। यही कारण है कि करबला की घटना को किसी एक समयसीमा से विशेष नहीं किया जा सकता बल्कि यह निरंतर जारी रहने वाला एसा आन्दोलन है जो बहुत से आन्दोलनों का जन्मदाता रहा है। इमाम हुसैन का ख़ून पूरे इतिहास में मौजूद है और यह राष्ट्रों को पथभ्रष्टता, अत्याचार तथा बुराइयों से निकलकर स्थिर सुधार और न्याय की स्थापना का आहृवान करता है। यह विषय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहाद के आरंभिक काल से ही लोगों के बीच स्पष्ट हो चुका था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शहीद हो जाने के पश्चात कुछ लोग नींद से जागे और यह सोचकर पश्चाताप करने लगे कि इमाम की शहादत के समय वे क्यों करबला में उनके साथ नहीं थे और उन्होंने क्यों इमाम हुसैन की उस समय सहायता नहीं की जबकि पैग़म्बरे इस्लाम उन्हें स्वर्ग के युवाओं का सरदार कहा करते थे? यद्यपि वे इमाम हुसैन की शहादत के समय किये जाने वाले गहरे षडयंत्र को समझ नहीं सके किंतु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ख़ून तथा उनके परिजनों के अथक प्रयासों ने इन लोगों पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ा और वे उमवियों के विरुद्ध उठ खड़े हुए।

    दूसरी ओर इमाम के अनुयाइयों ने भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मार्गदर्शन से लाभ उठाते हुए उनको वचन दिया कि वे हुसैनी लक्ष्य के अन्तर्गत क़दम बढ़ाएंगे और अपमान तथा तिरस्कार से दूर रहेंगे। कहा जा सकता है कि मुहर्रम और सफ़र के महीनों में इमाम हुसैन की याद तथा आशूर और चेहलुम के दिन उनकी याद में सभाएं आयोजित करने एवं जुलूस निकालने के कारण इमाम हुसैन के आन्दोलन के उद्देश्य, इतिहास में बाक़ी रहे हैं और उनकी क्रांति की प्रकाशमई किरणें समस्त कालों और स्थानों पर फैलती जा रही हैं और इस प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सुपुत्र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, समस्त कालों के लिए मार्गदर्शन का दीप और मुक्तिदाता नाव के समान हैं।

    वर्तमान समय में मुसलमानों के सम्मान और उनकी पहचान एवं वर्चस्ववादी शक्तियों को परास्त करने के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का चेहलुम, एक सामाजिक और राजनैतिक पूंजी के रूप में मौजूद है। आज के दिन लाखों लोग सत्यप्रेम के नारों को विश्वव्यापी करते हैं और इमाम हुसैन के चेहलुम के अवसर पर हुसैनी मूल्यों की गूढ़ता को स्पष्ट करते हैं। और इस मार्ग में वे स्वयं को महासागर की तुलना में एक बूंद समझते हैं और स्वयं को सत्य के मार्ग पर न्योछावर करने की भावना का प्रदर्शन करते हैं। करबला एक एसा स्थान है जहां पर एकत्रित होकर अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई जाती है। पूरे विश्व से बड़ी संख्या में लोग आज के दिन इमाम हुसैन के मज़ार के दर्शन के उद्देश्य से इराक़ के पवित्र नगर करबला जाते हैं।