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    हातिम का बेटा

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    तुलू ए इस्लाम और इस्लामी हुकूमत की तशकील पाने से पहले अरबों में कबीले की सरदारी की रस्म जारी थी। अरब वाले अपने सरदारों की इताअत और फ़र्माबरदारी करते थे और कभी-कभी उनको टैक्स वग़ैरा भी देते थे। अरब कबीलों के मुख़्तलिफ सरदारों में एक सरदार हातिम भी था और जो अपनी सखा़वत की वजह से बहुत मशहूर था और कबील ए तय की सरबराही के उनवान से याद किया जाता था। हातिम के बाद उसका बेटा अदी उस कबीले का जानशीन हुआ। कबील ए तय वालों ने उसकी इताअत कुबूल की। अदी सालाना हर शख़्स की आमदनी का एक चौथाई हिस्सा बतौरे टैक्स लेता था। अदी की हुकूमत व रिसालत हज़रत रसूले खुदा सलल्ललाहो अलैहि व आलेहि वसल्लम के मबऊस होने तक और इस्लाम के फ़ैलने तक रही। कबील ए तय बुत परस्त था लेकिन अदी नसरानी मज़हब होने के बावजूद उसे उसको लागों से छिपाता था।

    अरब वाले जो मुसलमान हो जाते थे वो इस्लाम की आज़ादाना वाकिफ़ियत हासिल करके सरदारों की जबरी इताअत से आज़ाद होते जा रहे थे। यही सबब था कि दूसरे अरब सरदारों की तरह अदी ने भी इस्लाम को एक बडा़ ख़तरा समझा और नतीजे में रसूले खुदा (स.) से दुश्मनी बरती। लेकिन वो रसूले खुदा (स.) और इस्लाम का कुछ नहीं कर सकता था। क्योंकि लोग जूक़ दर जूक़ आशिकाना तौर पर इस्लाम में दाख़िल होने लगे थे और इस्लाम व मुसलमानों की ताकत व अज़मत बढ़ने लगी थी। अदी अच्छी तरह समझता था कि एक दिन मेरी जुस्तुजू में भी आएंगे और मेरे तख्त व हुकूमत को उलट देंगे। इसीलिए एक ख़ास ख़िदमत गुज़ार (जो एक गुलाम था) को हुक्म दिया कि तेज़ रफ़्तार ऊँट पर हर वक्त तैयार रहना चाहिए और जिस दिन भी इत्तेला मिले इस्लामी फ़ौज नज़दीक आ गई है फौरन आगाह करे।

    एक दिन गुलाम आया और कहा, जो कुछ करना हो करो, इस्लामी फ़ौज करीब आ गई। अदी के हुक्म के मुताबिक ऊँट लाए गए। उस पर घर वाले सवार हुए और जो सामान ले जाने के काबिल था  सब ऊँटों पर लाद कर शाम की जानिब अपने हम ख़्याल व हम मज़हब अफ़राद से जा मिला लेकिन जल्दी में अपनी बहन सफ़ाना को भुल गया और वहीं छोड़ गया।

    इस्लामी फ़ौज जिस वक्त पहुची अदी भाग चुका था। उसकी बहन सफाना को असीरों के साथ मदीना ले गए और अदी के भागने की ख़बर रसूल (स) को दी। शहरे मदीना के बाहर एक अहाता था, जिसकी चारदीवारी छोटी थी। उसी में असीरों को रखा गया था। एक दिन रसुल (स) मस्जिद जाने के लिए वहाँ से गुज़र रहे थे। सफाना जो एक समझदार और चरब ज़बान औरत थी, अपनी जगह से उठी और कहा, मेरे बाप का साया सर से उठ गया है, मेरा सरपरस्त भी मालूम नहीं कहाँ है, खुदारा मुझ पर रहम कीजिए, खुदा आप पर एहसान करेगा। हज़रत रसूले खुदा (स) ने उससे पूछा, तेरा सरपरस्त कौन है उसने जवाब दिया, अदी बिन हातिम। हज़रत रसूले खुदा (स) ने फरमाया, वही जो खुदा और उसके रसूल से भागा है।                                                                                                         हज़रत रसूले खुदा (स.) ने फ़रमाया और रवाना हो गए। दूसरे दिन आँ हज़रत (स) फ़िर उसी तरफ से गुज़रे। सफ़ाना अपनी जगह से उठी और फ़िर वही जुमले दोहराए। रसूले खुदा (स.) ने फिर पहले दिन जैसा जवाब दिया और रवाना हो गए। सफ़ाना की उम्मीद पूरी न हुई। 

    तीसरे दिन पैग़म्बेर इस्लाम (स) फ़िर उसी जगह से गुज़र रहे थे लेकिन सफ़ाना को अपनी दरख़्वास्त के पूरा होने की उम्मीद नहीं थी इसीलिए उसने इरादा किया की अब वो कुछ न कहेगी। लेकिन आँ हज़रत (स.) के साथ-साथ एक जवान चल रहा था। उसने इशारे से सफ़ीना को समझाया कि आगे बढ़कर अपनी हाजत बयान करो। सफ़ाना आगे बढ़ी और पहले दिनों की तरह फ़िर कहा, मेरे बाप का साया मेरे सर से उठ गया है मेरा सरपरस्त भी मालूम नही कहाँ है, खुदारा आप मुझ पर एहसान कीजिए खुदा आप पर एहसान करेगा।

    हज़रत रसूले खुदा (स.) ने फ़रमाया, बहुत अच्छा, मैं इस इन्तिज़ार मे हूं कि कोई मोतबर आदमी मिल जाए तो तुझे उसके हमराह तेरे क़बीले भेज दूंगा, अगर तुझे ही किसी मोतबर आदमी की ख़बर लगे तो मुझे मुत्तला करना। जो लोग वहाँ मौजूद थे उनसे सफ़ाना ने दरयाफ़्त किया कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पीछे-पीछे, साथ-साथ कौन जवान चल रहा था जिसने मुझे अपनी हाजत बयान करने का इशारा किया। सबने कहा वो जवान अली इब्ने अबी तालिब (अ.) थे। 

    कुछ दिनों बाद सफ़ाने ने हज़रत रसूल खुदा (स.) को अपने क़बीले के क़ाबीले ऐतेमाद गिरोह के मदीना आने की ख़बर दी और कहा मुझे उन लोगों के साथ भेज दें। आँ हज़रत (स) ने उसे नए कपड़े सफ़र का ख़र्च और सवारी दी। सफ़ाना उस गिरोह के साथ रवाना हो गई और शाम में अपने भाई से जा मिली। जैसे ही सफ़ाना ने अपने भाई को देख़ा बुरा भला कहना शुरू कर दिया और कहा, तू अपनी बीवी बच्चों को तो ले आया और अपने बाप की निशानी यानी मुझे छोड़ आया। अदी ने सफ़ाना से माँफ़ी मांगी। चूंकि सफ़ाना एक समझदार औरत थी, इसलिए अदी ने उससे अपने कामों में मशवरा किया और पूछा:

    अब जबकि तुने मुहम्मद (स.) को बहुत करीब से देख़ा है मेरे बारे में तुम्हारी क्या राय है और मेरे लिए क्या मुनासिब है? आया मैं उनके पास जाऊँ और उनसे मुलहक हो जाऊँ या इसी तरह किनारा कशी इख़्तियार करता रहूं।

    सफ़ाना ने कहा, मेरे ख़्याल से बेहतर यही है कि तुम उनसे मिल जाओ अगर वो हकीकत में पैग़म्बरे खुदा हैं तो तुम्हारे लिए नेकबख़्ती और भलाई है और अगर वो पैग़म्बरे ख़ुदा नहीं हैं और हुकूमत के ख़्वाहां हैं, फिर भी यमन तुझसे ज़्यादा दूर नही है और वहाँ के लोगो के दरमियान जो इज़्ज़त व ऐहतिराम तुझे है इस लिहाज़ बे यार व मददगार नहीं रहोगे और अपने इज़्ज़त व ऐहतिराम को भी हाथ से नहीं दोगे। अदी ने इस नज़रिये को पसन्द किया और मदीना जाने का कस्द किया ताकि रसूले इस्लाम (स) के मिशन की तहकीक़ करे, और ये देखे कि क्या वो वाकई रसूल हैं ताकि एक उम्मीद की तरह उनकी पैरवी करे या अगर वो दुनिया तलब और हुकूमत के ख़्वाहां हैं तो फिर अपने फ़ायदे के लिहाज़ से उनका साथ दे। रसूले खुदा (स.) मस्जिदे मदीना में थे। उस वक्त अदी वहाँ पहुंचा और रसूल खुदा (स.) को सलाम किया रसूल खुदा ने पूछा, तू कौन है? उसने कहा, अदी बिन हातिमताई।

    हज़रत रसूले खुदा (स) ने उसका एहतिराम किया और उसे अपने घर ले गए। रास्ते में जबकि रसूले खुदा (स.) और अदी जा रहे थे, उस वक़्त एक ज़ईफ़ा आँ हज़रत के सामने आई और सवाल व जवाब करने लगी और कुछ देर तक आप उसके सवालात का हौसले और मेहरबानी के साथ जवाब देते रहे।

    अदी ने अपने दिल में सोंचा कि इस शख़्स का ये हुस्ने अख़लाक उसकी पैग़म्बरी की अलामत है। क्योंकि दुनिया परस्त लोगों में इस तरह के अख़लाक़ व मेहरबानी का बर्ताव नहीं पाया जाता कि वो एक ज़ईफ़ व नादार के साथ मेहरबानी और हुस्ने अख़्लाक से पेश आएं। जिस वक़्त अदी रसूले खुदा (स.) के घर में दाख़िल हुआ, रसूले खूदा (स.) की ज़िन्दगी के मामूली साज़ व सामान को देख़ा। घर में सिर्फ़ एक तोशक थी जिस पर रसूले खुदा बैठते थे। उसी को अदी के लिए बिछा दिया। अदी ने बहुत इसरार किया कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) खुद उस पर बैठें लेकिन रसुले खुदा (स.) ने कुबूल नहीं किया मजबूर होकर अदी तोशक पर बैठ गया और रसूले खुदा (स.) ज़मीन पर बैठ गए। अदी ने अपने दिल में सोंचा कि ये दूसरी अलामत है जो सिर्फ़ पैग़म्बर (स.) के  साथ मख़्सूस है न कि बादशाहों के लिए। पैग़म्बर (स.) ने अदी की तरफ़ रुख़ करके फ़रमाया, क्या तुम्हारा मज़हब नसरानी नहीं था?  क्यों नही।  

    फ़िर किस लिये और किस बुनियाद पर लोगों की आमदनी का एक चौथाई हिस्सा लेता था? तुम्हारे मज़हब में तो ये काम जाइज़ नहीं है।

    अदी ने अपने मज़हब को, सबसे यहाँ तक कि करीब से करीब तर अपने लोगों से भी पोशीदा रख़ा था, लेकिन रसूले इस्लाम (स) के कलाम से हैरत ज़दा हो गया और ये सोचा कि ये तीसरी अलामत है कि ये शख़्स पैग़म्बर है। उसके बाद रसूले इस्लाम ने अदी से फ़रमाया, तुम आज मुसलमानों के फक्र व फाक़े और बदहाली को देख रहे हो और तमाम लोगों में मुसलमानों को फ़कीर ख़्याल कर रहे हो। दूसरे ये कि आज दुश्मनों ने मुसलमानों का घिराव कर रख़ा है यहाँ तक कि उनकी जान व माल भी महफूज़ नहीं है, और ये भी देख़ रहे हो कि हुकूमतो इक़्तिदार दूसरों के हाथों में है। खुदा की कसम जल्द ही मुसलमानों को माल व ज़र इस कद्र मिलेगा कि कोई फ़कीर न रहेगा और खुदा की क़सम दुश्मन इतना मग़लूब हो जाएगा और ऐसा अम्न व अमान कायम होगा कि एक ख़ातून तन्हा ईराक से हिजाज़ तक बैख़ौफ़ व हिरास सफ़र कर सकेगी, कोई उससे छेड़ छाड़ न कर सकेगा। 

    खुदा की कसम जल्द ही बाबुल के सफ़ेद महल मुसलमानों के कब्ज़े में हो जाएंगे। अदी इंन्तेहाई खुलूस व कामिल अकीदे के साथ इस्लाम लाया और आख़िरी उम्र तक इस्लाम का वफ़ादार रहा। रसूले खुदा (स.) के बाद वो काफ़ी अर्से तक ज़िन्दा रहा और रसूले ख़ुदा की वो बातें जो पहली मुलाकात में और वो पेशिनगोइयाँ जो मुसलमानों के बारे में फ़रमाई थीं उनको हमेशा याद रख़ा और कभी न भुलाया। वो कहता था कि मैने अपनी ज़िन्दगी में देख़ लिया कि सरज़मीन बाबुल मुसलमानों के कब्ज़े में आ गई है और अम्न व अमान ऐसा था कि एक औरत ईराक से हिजाज़ तक तन्हा सफ़र कर सकती थी और कोई ख़तरा नहीं था। खुदा की कसम मुझे यकीन है कि अनकरीब ऐसा ज़माना आएगा कि कोई फ़कीर मुसलमानों में दिख़ाई न देगा।।