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    हुसैनी आंदोलन-1

    हुसैनी आंदोलन-1
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    दसवीं मोहर्रम की घटना, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन, उनका चेहलुम और अन्य धार्मिक अवसर इस्लामी इतिहास का वह महत्वपूर्ण मोड़ हैं जहां सत्य और असत्य का अंतर खुलकर सामने आ जाता है। इमाम हुसैन के बलिदान से इस्लाम धर्म को नया जीवन मिला और तथा इस ईश्वरीय धर्म के प्रकाशमान दीप को बुझा देने पर आतुर यज़ीदियत को निर्णायक पराजय मिली। इस घटना में अनगिनत सीख और पाठ निहित हैं। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने विभिन्न अवसरों पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन से मिलने वाली और नसीहतों पर प्रकाश डाला है। कार्यक्रम मार्गदर्शन के अंतर्गत हम हुसैनी आंदोलन से मिलने वाली सीख और नसीहतों को पेश करेंगे।

    आपको याद दिलाते चलें कि कार्यक्रम मार्गदर्शन इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई के भाषणों से चयनित खंडों पर आधारित है।

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    इमाम हुसैन के चेहलुम से हमें यह सीख मिलती है कि दुशमनों के विषैले प्रचारों के तूफ़ान के सामने सत्य और शहादत की याद को जीवित रखा जाना चाहिए। आप देखिए! ईरान की क्रान्ति से आज तक इमाम ख़ुमैनी, इस्लामी क्रान्ति, इस्लाम और ईरानी राष्ट्र के विरुद्ध कितने व्यापक स्तर पर प्रौपगंडे होते रहे हैं। शत्रुओं ने हमारे शहीदों के विरुद्ध प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रेडियो, टीवी, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से सीधे सादे लोगों के मन मस्तिष्क में कैसी कैसी बातें भर दीं? यहां तक कि हमारे देश के भीतर भी कुछ नादान लोग युद्ध के उन हंगामों के दौरान एसी बात कह देते थे जो ज़मीनी स्थिति से अनभिज्ञता का परिणाम होती थी। अब यदि इन प्रोपैगंडों के मुक़ाबले में सच्चाई को बयान न किया जाए, सत्य को सामने न लाया जाए और यदि ईरान जनता, हमारे वक्ता तथा बुद्धिजीवी और कलाकार सत्य के प्रचार प्रसार के लिए स्वयं को समर्पित न कर देंगे तो शत्रु प्रोपैगंडे के मैदान में सफल हो जाएगा। प्रोपगंडे का मैदान बहुत बड़ा और ख़तरनाक है। हमारी जनता की बड़ी संख्या क्रान्ति से मिलने वाली चेतना के कारण शत्रुओं के विषैले प्रचारों से सुरक्षित है। शत्रु ने इतने झूठ बोले और आंखों के सामने मौजूद तथ्यों के बारे में एसी ग़लत बातें कहीं कि जनता में विश्व प्रचारिक तंत्र से विश्वास ख़त्म हो गया।

    अत्याचारी यज़ीदी मशीनरी अपने प्रोपैगंडों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को दोषी ठहराती थी और यह ज़ाहिर करती थी कि अली के सुपुत्र हुसैन वह थे जिन्होंने सांसारिक लोभ के लिए न्याय पर आधारित इस्लामी सरकार के विरुद्ध विद्रोह किया था और कुछ लोगों को इस प्रोपैगंडे पर विश्वास भी हो गया था। इसके बाद जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला के मैदान में मज़लूमियत के साथ शहीद कर दिए गए तो इसे यज़ीद की विजय की संज्ञा दी गई किंतु हुसैनी आंदोलन के सही प्रचार के कारण यह सारे प्रोपैगंडे विफल हो गए।

    कर्बला हमारे लिए एक अमर आदर्श है। इसका संदेश है शत्रु की शक्ति के सामने इंसान अपने क़दमों में लड़खड़ाहट न पैदा होने दे। यह आज़माया हुआ नुसख़ा है। यह बात सही है कि इस्लाम के आरंभिक काल में इमाम हुसैन अपने बहत्तर साथियों के साथ शहीद कर दिए गए किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि जो भी इमाम हुसैन के रास्ते पर चले या जो भी संघर्ष करे उसे शहीद हो जाना चाहिए। नहीं, ईरानी जनता ईश्वर की कृपा से इमाम हुसैन के मार्ग को आज़मा चुकी है और गौरव एवं वैभव के साथ विश्व के राष्ट्रों के बीच मौजूद है। इस्लामी क्रान्ति की सफलता से पहले जो कारनामा आपने अंजाम दिया वह इमाम हुसैन का रास्ता था। इमाम हुसैन के मार्ग पर चलने का अर्थ है दुशमन से न डरना और शक्तिशाली शत्रु के सामने भी डट जाना। आठ वर्षीय युद्ध के दौरान भी एसा ही था। हमारी जनता समझती थी कि उसके मुक़ाबले में पूरब व पश्चिम की शक्तियां तथा पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था आ खड़ी हुई है किंतु ईरानी जनता भयभीत नहीं हुई। हमारे प्यारे शहीद हुए, कुछ लोग घायल होकर विकलांग हो गए, कुछ लोगों को वर्षों का समय शत्रु की जेल में गुज़ारना पड़ा किंतु देश इन बलिदानों की बदौलत वैभव एवं गौरव की चोटी पर  पहुंच गया। इस्लाम की पताका और ऊंची हुई। यह सब कुछ संघर्ष का प्रतिफल है।

    मोहर्रम और सफ़र महीने के दिनों में हमारी जनता को अपने भीतर संघर्ष, आशूरा, शत्रु के सामने निर्भीकता, ईश्वर पर आस्था व विश्वास तथा ईश्वर के मार्ग में बलिदान की भावना को और प्रबल बनाने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए इमाम हुसैन से सहायता मांगनी चाहिए। मजलिसों या शोक सभाओं का आयोजन इसलिए है कि हमारे दिल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके लक्ष्यों के निकट आएं। कुछ टेढ़ी सोच और संकीर्ण विचार के लोग यह न कहें कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हार गए अतः उनके मार्ग पर चलने वाली ईरानी जनता को चाहिए कि अपनी जान की बलि दे दे। कौन नादान इस प्रकार की बातें कर सकता है? विश्व के राष्ट्रों को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से पाठ लेना चाहिए, आत्म विश्वास का पाठ लेना चाहिए, ईश्वर पर भरोसा रखने की सीख लेनी चाहिए और यह समझना चाहिए कि यदि शत्रु शक्तिशाली है तो उसकी यह शक्ति अधिक दिनों तक बाक़ी रहने वाली नहीं है। उसे यह जानना चाहिए कि यदि शत्रु का मोर्चा विदित रूप से बहुत बड़ा और व्यापक है तो वास्तव में उसकी शक्ति बहुत कम है। क्या आप देख नहीं रहे हैं कि कई साल से दुशमन इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास कर रहा है किंतु उसे सफलता नहीं मिल पाई है। यह उसकी कमज़ोरी और हमारी मज़बूती के अलावा और क्या है। हम शक्तिशाली हैं, हम इस्लाम की बरकत से मज़बूत हैं। हम अपने महान ईश्वर पर भरोसा और आस्था रखते हैं अर्थात हमारे साथ ईश्वरी शक्ति है और विश्व इस शक्ति के सामने टिक नहीं सकता।

    यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है, यह एक सीख है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस्लामी इतिहास के अति संवेदनशील मोड़ पर विभिन्न महान ज़िम्मेदारियों के बीच अपने सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य का की पहचान और उसे पूरा करने में सफल हुए। उन्होंने उस बिंदु को परखा जिसकी उस काल में आवश्यकता थी और फिर बिना किसी हिचकिचाहट के अपने कर्तव्य को पूरा किया। हर युग में मुसलमानों की यह कमज़ोरी हो सकती है कि वह अपने असली कर्तव्य की पहचान में ग़लती कर बैठें और उन्हें यह पता न हो कि किस काम को प्राथमिकता प्राप्त है और उसे आवश्य करना है तथा समय आने पर दूसरे कार्यों की उस प्राथमिका काम की ख़ातिर उपेक्षा कर देनी है, उन्हें यह न पता हो कि कौन सा काम अधिक महत्वपूर्ण है और कौन सा काम दूसरे दर्जे का है, किस काम के  लिए कितना प्रयास करना चाहिए?

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन के समय भी बहुत से एसे लोग थे कि यदि उनसे कहा जाता कि अब आंदोलन का समय आ गया है किंतु यदि उन्हें यह अंदाज़ा हो जाता कि इस आंदोलन में बहुत सी कठिनाइयां हैं तो वह दूसरे दर्जे के अपने कामों में व्यस्त रहते जैसा कि हम देखते हैं कि कुछ लोगों ने यही किया भी। (http://hindi.irib.ir/)